ताज़ा खबर
 

कोरोना का रोना

कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। बाजार और दुकानें एक बार फिर से बंद हो रही हैं और आम आदमी को फिर से घरों में कैद होना पड़ रहा है।

Author नई दिल्‍ली | April 19, 2021 8:40 AM

कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। बाजार और दुकानें एक बार फिर से बंद हो रही हैं और आम आदमी को फिर से घरों में कैद होना पड़ रहा है। लेकिन इन हालातों में भी नेता चुनावी मैदान में डटे हुए हैं। दिल्ली में इसको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।

एक तो राजधानी में कोरोना बढ़ने पर आॅक्सीजन, दवा और बिस्तरों का संकट ऊपर से दिल्ली में जमे देश भर के नेताओं को इससे कोई मतलब ही नहीं। राज्यों में चुनाव प्रचार कर रहे नेता और उनकी रैलियों में कोरोना को लेकर कोई डर ही नहीं दिख रहा। लेकिन आम आदमी के लिए ही यह कोरोना सबसे खतरनाक है। बेदिल ने लोगों को बात करते सुना कि कोरोना के चलते बंद का पासा चुनाव निपटने के बाद ही फेंका जा सकता है।

गजब बेइज्जती है!

दिल्ली में कोरोना संक्रमण की तैयारियों की पोल खुद सरकारी तंत्र खोल रहा है और आम आदमी सोशल मीडिया के सहारे सरकार की बखिया उधेड़ रहे हैं। पिछले दिनों सरकारी अस्पतालों में हालात का ऐसा ही वीडियो सामने आया, यह आम लोगों के माध्यम से सोशल मीडिया पर साझा किया गया था।

इसमें आॅक्सीजन की कमी होने पर डॉक्टरों से जब सवाल पूछा गया तो उन्हें अपना चेहरा छिपाकर भागना पड़ा। वहीं, दिल्ली में राजनीतिक पार्टी के नेता भी खूब बयान जारी कर रहे हैं। लेकिन जमीन पर उतरकर लोगों का दुख बांटने की हिम्मत शायद ही हो। स्थानीय नेताओं को लोग ऐसे शर्मिंदा कर रहे हैं कि उनको वहां से खिसकना पड़ रहा है।

झोलाछाप इलाज

कोरोना आया तो आम मरीजों के लिए शहर के सारे अस्पताल बंद हो गए और झोलाछाप डॉक्टरों की मौज हो गई। अब ऐसे हालात में पेटदर्द, सिरदर्द जैसे रोगों की दवा के लिए लोग झोलाछाप डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं। डॉक्टर न केवल मन माफिक दवा दे रहे हैं बल्कि अच्छा पैसा भी वसूल रहे हैं। अब ऐसा भी नहीं है कि ऐसे हकीमों का इलाज और संज्ञान जिला प्रशासन को नहीं है लेकिन अब महामारी के इस समय में इनसे उलझे कौन। न तो समय है और न ही कर्मचारी। तो झोलाछाप डॉक्टर भी खूब मजे में हैं।

ये कैसे विधायक!

कोरोना काल में मरीजों को अस्पताल में बिस्तर नहीं मिल रहा और लोग इलाज के लिए भटक रहे हैं। ऐसे में किसी भी जनप्रतिनिधि को फोन करो तो वे भी या तो हाथ खड़े कर रहे हैं या फिर फोन ही नहीं उठाते। अब दिल्ली में विपक्ष के एक नेता की व्यथा बेदिल को पता चली। बताया कि एक कोरोना मरीज को सरकारी अस्पताल में बिस्तर दिलवाने के लिए प्रदेश के एक विधायक को फोन कर रहे थे, लेकिन विधायक जी ने फोन ही नहीं उठाया।

उनकी हैसियत भी प्रदेश पार्टी पदाधिकारियों की सूची में नंबर दो की है। जब नेताजी का फोन विधायक जी ने नहीं उठाया तो यह चर्चा का विषय बन गया। अब नेताजी कहते फिर रहे हैं कि आम आदमी की बात करने वाली पार्टी के विधायक जब विपक्षी नेताओं के फोन नहीं उठा रहे तो दिल्ली की आम जनता के शिकायतों को कितना सुनते होंगे। थक हार के नेता ने एक अन्य विधायक को फोन लगाया। उन्होंने फोन जरूर उठाया, लेकिन मरीज को आश्वासन ही मिला। अस्तपाल में बिस्तर नहीं मिली। बेचारा मरीज निजी अस्पताल की ओर मुड़ गया।

पुलिसवालों का डर

पुलिसवालों में भी कोरोना की दूसरी लहर का डर साफ दिख रहा है। आला अधिकारियों ने मातहत को साफ तौर पर निर्देश दिया है कि पहले खुद की सुरक्षा करें तब दूसरे लोगों को एहतियात बरतते हुए कोरोना से बचाव का रास्ता बताएं। बेदिल की एक आला अधिकारी से बात हो रही थी तो उन्होंने कहा कि डरने वाली बात इसलिए है कि इस बार प्रतिदिन पुलिस बलों में औसतन इतने मामले पॉजीटिव आ रहे हैं कि बचाव के निर्देश देना मुनासिब और जायज हो गया है। अब पुलिस वाले भी ड्यूटी के साथ सावधानी बरत रहे हैं।

आंकड़ों पर राजनीति

कोरोना की वजह से पिछले साल मरने वालों की संख्या को लेकर दिल्ली में काफी हाहाकार मचा था। राजनीतिक पार्टियों ने एक दूसरे पर आंकड़ों को छिपाने का आरोप लगाया था। अब निगम और प्रदेश की सत्ता में अलग-अलग दलों का होना राजनीति करने का कोई मौका छोड़ने नहीं देता है। इसलिए इस साल भी दोनों के आंकड़ों में भिन्नता आनी शुरू हो गई है।

हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि दिल्ली के तीनों नगर निगम में कोरोना से हुई मौत के बाद निगम के श्मशान घाटों पर दाह संस्कार के बाद की सूची जारी की जाने लगी है। भाजपा ने दिल्ली सरकार पर मौत का आंकड़ा छुपाने का आरोप लगाया है तो आप पार्षदों ने भी जवाब देकर राजनीति बंद करने की नसीहत दी है।

बचते-बचाते

हमारी कश्ती भी वहीं डूबी, जहां पानी कम था! इन दिनों दिल्ली परिवहन निगम की बसें यानी डीटीसी और दिल्ली मेट्रो में यह चर्चा सुनी जा सकती है। चर्चा के केंद्र में है आरटीवी और बैटरी से चलने वाली ई-रिक्शा की सवारी। दरअसल, आरटीवी और बैटरी रिक्शा सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में कोरोना दिशा निर्देशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

कमाई के चक्कर में कोरोना के सारे प्रोटोकॉल को मानो ठेंगा दिखा रहे हंै। बस और मेट्रो में लोग यह कहते सुना जा सकते हैं कि सारा दिन सामाजिक दूरी का पालन करते हुए जब देर शाम घर लौटते हैं तो ई-रिक्शा या आरटीवी पर बैठते ही सब पर पानी फिर जा रहा है। क्योंकि कोरोना संक्रमण रोकने के सरकार की ओर से उठाए गए तमाम एहतियात भरे कदमों को वे मान नहीं रहे। अब इनसे कौन लड़े भला।
-बेदिल

Next Stories
1 कोरोना के खतरे से आंख मूंद लेना ठीक नहीं- बोले India TV के रजत शर्मा; लोगों ने कहा- न सुनी जाएगी, ये चुनावी दीवाने हैं
यह पढ़ा क्या?
X