ताज़ा खबर
 

आभासी पोस्टमार्टम को एम्स ने बनाया हकीकत, एशिया में इस तरह की पहली सुविधा

दिल्ली के शवगृह में एक डिजिटल रेडियोलॉजिकल इकाई स्थापित की गई है।

Author नई दिल्ली | Published on: November 28, 2016 3:36 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

देश में पहली बार आभासी ढंग से पोस्टमार्टम करना संभव हो गया है। इसके लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के दिल्ली के शवगृह में एक डिजिटल रेडियोलॉजिकल इकाई स्थापित की गई है। इसमें कंप्यूटर स्क्रीन पर देखते हुए उसी प्रभावित जगह क ी सूचना ली जाएगी जहां पर चोट है। ऐसे में पूरे शव की चीरफाड़ की जरूरत नहीं होगी और न ही क्षतविक्षत शव की चीरफाड़ की मुुश्किल उठानी होगी। एम्स में इस नई तकनीक से लगभग 15 पोस्टमार्टम हो चुके हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लगभग उन 40 फीसद मामलों में आभासी पोस्टमार्टम से काम हो सकता है जिसमें विसरा संरक्षित करने की जरूरत नहीं होती। इस नई तकनीक से पोस्टमार्टम में तेजी भी आएगी। विभाग के मुखिया डॉक्टर सुधीर गुप्ता के मुताबिक यह न केवल देश में पहली ऐसी सेवा है बल्कि एशिया में इस तरह की यह व्यवस्था पहली दफा की गई है। किसी भी आपराधिक गतिविधि का अहम सुराग पोस्टमार्टम रपटों से मिलता है। इसमें देरी होने से न्यायिक प्रक्रिया में भी देरी होती है। इसके साथ ही पीड़ित परिजनों को उनके प्रिय के शव देने में भी विलंब होता है। इतना ही नहीं कई बार मृतक का शव देर से बरामद होता है जिससे उसके सडेÞ-गले अवस्था में होने से उसका पोस्टमार्टम करना मुश्किल होता है। इन तमाम मुश्किलों का आसान हल निकालते हुए एम्स में रेडियोलॉजी विभाग की मदद से पूरे शरीर की डिजिटल एक्सरे की जाएगी। इसमें आभासी यानी पूरे शरीर का चीरफाड़ करने की बजाए डिजिटल एक्सरे तस्वीर से उसकी रिपोर्ट तैयार की जाएगी। डॉक्टरों के मुताबिक, डिजिटल आटोप्सी में ऊपर से शरीर में आई बारीक से बारीक चोट का पता बाकी पेज 8 पर

लगाया जा सकता है। जो चोट ऊपर से देखने पर पता नहीं चलती या जिसे खुली आंखों से देखा नहीं जा सकता है उसे भी उच्च तकनीक की मदद से देखा जा सकेगा। और इस तरह डिजिटल एक्स-रे के जरिए वर्चुअल (आभासी) आटोप्सी की जा सकती है और छोटे से छोटे थक्कों और टूट (फ्रैक्चर) का भी पता लगाया जा सकता है। एशिया में इस तरह का यह पहला प्रयोग है। यह आधुनिक तकनीक समय बचाने वाली भी है और ऐसे मामलों के लिए वरदान साबित हो सकता है जिनमेंं केवल कंकाल ही मिलते हैं।
एम्स के फोरेंसिक विभाग के डॉक्टर गुप्ता ने कहा कि आभासी आटोप्सी में परंपरागत पोस्टमार्टम की तुलना में कम समय लगता है और अंतिम संस्कार के लिए शव देने से पहले शव का विच्छेदन कम से कम करना होता है। यानी केवल विसरा जुटाने भर को ही सर्जिकल काम करना होगा। कई बार परिजन शव के चीरफाड़ को लेकर आहत भी हो जाते हैं। इसमें शव से कम से कम छेड़छाड़ की जाएगी। डॉक्टर गुप्ता कहते हैं कि एक तो यह तकनीक पोस्टमार्टम में तेजी लाएगी दूसरी ओर क्षत-विक्षत या सड़े-गले शव के मामलों में यह तकनीक बहुत लाभदायक है।
साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि रेडियोलॉजिकल परीक्षण से ऐसे फ्रैक्चर और खून के थक्कों का पता चल जाता है जिन्हें सिर्फ खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता। अक्सर ऐसे छिपे हुए फ्रैक्चर और चोट होते हैं जिन्हें ऊपर से पहचानना या शव विच्छेदन के बाद भी सीधे आंख से पहचानना मुश्किल होता है। उन्होंने कहा कि वर्चुअल आटोप्सी की मदद से हड्डियों में हेयरलाइन या छोटे से छोटे फ्रैक्चर और रक्तस्राव का भी पता लगाया जा सकता है। इन्हें साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित रखना भी आसान होगा। एक एक्स-रे फिल्म के रूप में उन्हें रखा जा सकता है। इन एक्स-रे प्लेटों की साक्ष्यों के रूप में पूरी तरह कानूनी अहमियत व मान्यता होती है। इसमें शरीर में चाकू व रस्सी के निशान से लेकर गहरी धंसी गोलियों या छर्रों का भी पता लगाया सकता है। शव को बस एक्सरे मशीन में लेकर उसका परीक्षण करना होगा। कंप्यूटर स्क्रीन पर चोट के हिस्से की गहराई हाई रिजॉल्यूशन में दिखेगी।

 

 

आलोचना करने वालों पर पीएम मोदी बोले- “उन्हें तकलीफ ये है कि उन्हें तैयारी का मौका नहीं मिला”

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दिल्ली: अदालत ने सैयद अहमद बुखारी के तर्क को बताया ‘मजाकिया’,कहा – शाही इमाम होने का लाभ नहीं उठा सकते
2 दिल्ली: मजदूर और छात्रों का शहर से पलायन, बोले – हालात हुए ठीक तो फिर लौटेंगे…
3 केंद्रीय मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने विमुद्रीकरण पर की व्यापारियों से चर्चा
जस्‍ट नाउ
X