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दिल्ली सीमाओं पर 66 दिन से बैठे किसानों को लंगर तक पहुंचाता रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा के साथ है। लेकिन अब उनकी दुविधा लाल किले पर फहरे निशान साहेब के झंडे को लेकर है।

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समाज की सियासत

26 जनवरी को हुए लाल किला झंडा प्रकरण ने सिख सियासत में परचम लहराने वाले सरदार नेताओं को भी बगल झांकने पर मजबूर कर दिया है। चर्चा तो यह है कि उनकी स्थिति मानो सांप-छुछंदर वाली हो गई है। वों करे तो करें क्या भला! दरअसल ये वो गुट है जो किसान आंदोलनों के पक्ष में खड़ा है। दिल्ली सीमाओं पर 66 दिन से बैठे किसानों को लंगर तक पहुंचाता रहा है।

संयुक्त किसान मोर्चा के साथ है। लेकिन अब उनकी दुविधा लाल किले पर फहरे निशान साहेब के झंडे को लेकर है। मोर्चा आरोपी दीप सिंद्धू का सामाजिक बहिष्कार का एलान कर चुका है। अब वो क्या करें भला। संयुक्त किसान मोर्चा के साथ अगर खुलकर वारदात की निंदा करते हैं तो विरोधी सिख गुट उनपर निशान साहेब के साथ नहीं खड़े होने का प्रचार करने लगेंगे।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का चुनाव सर पर है। एक-एक वोट का वो हिसाब लगा रहे हैं। दबे जुबान से सिख नेताओं की पीड़ा यह है कि धर्म के नाम पर कुछ भी संभव है। विरोधी खेल न बिगाड़ दें! आखिर बात सिख समाज और धर्म से जुड़ा जो है। गलत को भी सही करने के लिए लोग तैयार जो बैठे हैं। फिलहाल चुप्पी के साथ मंथन जारी है। अब वे बीच का रास्ता निकालने में जुट गए है।

नाम पर कालिख

आम आदमी पार्टी में रह चुके एक नेता जो वर्तमान में भाजपा में शामिल हैं, वे आजकल कालिख से परेशान हैं। ये नेता पूर्वी दिल्ली लोकसभा से हैं। इन्होंने आम जनता की सुविधा के लिए अपने नाम और नंबर की जानकारी देने वाले बड़े-बड़े बोर्ड विधानसभा क्षेत्र में लगवाए हैं।

लेकिन आए दिन शरारती तत्व नेता जी के बोर्ड पर कालिख पोत देते हैं और ये साफ करवाते हैं। हालांकि अभी तक यह सामने नहीं आया है कि यह शरारत कौन कर रहा है लेकिन इससे नेता जी को दोगुनी मेहनत करनी पड़ रही है। लगाए गए सारे बोर्ड सरकारी हैं और लोक निर्माण विभाग के सहयोग से लगे हैं। सामाजिक करीबी कोरोना काल में सामाजिक दूरी का पालन करते हुए दिल्ली वाले थक गए हैं।

यही वजह है कि लोग अब धीरे-धीरे फिर सामाजिक होने लगे हैं। राजनीतिक दलों से लेकर सभी जगहों पर लोगों ने मास्क हटा लिए हैं और दो गज की दूरी भी खत्म हो गई है। भाजपा, कांग्रेस व ‘आप’ के कार्यक्रमों में यह नजारा आम है। वहीं किसान आंदोलन में भी राजनीतिक दलों की नजदीकियों में भी कोरोना नियमों का साफ उल्लंघन नजर आ रहा है।

चर्चा में लठ

अबकी बार पूर्वी दिल्ली का गाजीपर चर्चा में है। पर कूड़े के पहाड़ के लिए नहीं बल्कि किसान आंदोलन के लिए। आजकल इस मार्ग पर कोई वाहन चालकों से पूछता है कि गाजीपुर का रास्ता कहां से है। तो चालक भी पूछते है कि वहां क्यों जाना है। वहां तो लठ बज रहे हैं।

आबंटन पर मंथन

नोएडा में जारी हुई नए औद्योगिक भूखंडों की योजना शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। चर्चा की वजह यह है कि चार हजार वर्ग मीटर से बड़े इन भूखंडों का आबंटन साक्षात्कार के जरिए किया जाएगा। जबकि इससे पूर्व में औद्योगिक योजना में भूखंडों का आबंटन साक्षात्कार के बजाए ड्रा के माध्यम से कराया गया था।

तब यह दावा किया गया था कि साक्षात्कार से भूखंडों का आबंटन पारदर्शी नहीं होता है। लिहाजा यदि चार हजार वर्ग मीटर से बड़े भूखंडों के लिए एक से अधिक आवेदन आते हैं, तो आबंटन ड्रा से कराया जाएगा। लेकिन इस बार ऐसे 16 भूखंडों की निकाली गई औद्योगिक योजना का आबंटन साक्षात्कार के जरिए किया जाना इसमें प्रभावशाली लोगों को वरीयता दिलाने वाला साबित हो सकता है। कोरोना काल और उससे पहले से केवल औद्योगिक भूखंडों की खरीद-फरोख्त में तेजी रही है।
-बेदिल

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