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रोहित वेमुला की बरसी पर मार्च कवर करने गए पत्रकारों को पुलिस ने पीटा-घसीटा, पढ़िए आपबीती

दिल्ली में मंगलवार (17 जनवरी) को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की बरसी पर मार्च होना था।

दिल्ली में मंगलवार (17 जनवरी) को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की बरसी पर मार्च होना था। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स, एक्टिविस्ट और कुछ अन्य लोग मार्च निकालने वाले थे। लेकिन उन्हें बीच में ही रोक दिया गया। इतना ही नहीं मार्च को बीच में रोककर कुछ छात्रों के साथ-साथ मीडिया वालों को भी पीटा गया। ऐसे में हमारी वेबसाइट inuth.com के दो पत्रकारों के साथ भी मारपीट हुई। पढ़िए उनमें से एक जैनब अहमद की आपबीती –

मैं एक युवा पत्रकार होने के साथ-साथ ऐसी शख्स हूं जिसे रोहित वेमूला के सुसाइड करने से फर्क पड़ा। इसके लिए मैं रोहित वेमूला की बरसी पर निकाले जाने वाली एकजुटता मार्च में हिस्सा लेने के लिए पहुंची। मार्च मंडी हाउस से शुरू होना था। मैं उस इवेंट को कवर करने के लिए गई थी। मैंने सोचा था कि मार्च को शांतिपूर्वक पूरा करने में वहां मौजूद प्रशासन के लोग मदद करेंगे लेकिन सब मेरी सोच से बिल्कुल उलट हुआ।

रैली जो कि दोपहर 2.30 शुरू होनी थी वह 3.30 तक शुरू हुई। तबतक वहां स्टूडेंट्स, एक्टिविस्ट्स और दिल्ली में रहने वाले कई लोग पहुंच चुके थे। मार्च में शामिल लोगों को चारों तरफ से पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों ने घेरा हुआ था। सब लोग शांतिपूर्वक तरीके से प्रदर्शन और नारे लगा रहे थे। रैली में जेएनयू के छात्र उमर खालिद और अर्निबान भट्टाचार्या भी मौजूद थे। जो कि राजद्रोह के आरोप में एक महीने की जेल भी काटकर आ चुके हैं। मैं उस वक्त जेएनयू के कुछ स्टूडेंट्स का इंटरव्यू कर रही थी कि मुझे कुछ लोगों ने चिल्लाने की आवाज सुनाई थी। मैं पीछे मुड़ी तो देखकर हैरान रह गई। मेरे दोस्त सातपर्णो घोष को पीटते हुए पुलिस वैन में घसीटकर ले जाया जा रहा था। पुलिस ने अचानक से वहां लोगों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया था। मेरी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों कर रहे हैं।

मैं भागती हुई उन लोगों के पास गई और मैंने उन्हें बताया कि हम लोग पत्रकार हैं। लेकिन सब व्यर्थ रहा। पुलिस वालों ने उल्टा हमें ही इवेंट कवर करने को लेकर धमकाया और कहा कि हम लोग (मैं और मेरा दोस्त) भी प्रदर्शन में शामिल हैं। वे लगातार मेरे साथी को पीट रहे थे। उन्होंने उसे जबरन बस में डाल दिया। इतना ही काफी नहीं था। उन लोगों ने मुझे भी वैन के अंदर डालने की कोशिश की। लेकिन मैं लगातार चिल्लाती रही और कहती रही कि हम लोग पत्रकार हैं प्रदर्शन कर रहे लोग नहीं। इसपर पुलिस वालों ने मुझे नीचे उतार दिया। लेकिन मेरे दोस्त को नहीं। वे लोग उसे बस में बैठाकर संसद मार्ग वाले पुलिस स्टेशन ले जाने लगे। लेकिन मैं लगातार बस के पीछे भागती रही। लेकिन मैं किसी पागल महिला की तरह चिल्लाती भागती रही कि वह मेरे साथ है। मुझे चिल्लाता और भागता देख पुलिसवालों ने मेरे साथी को बस से नीचे फेंक दिया।

हमारे फोन, सेल्फी स्टिक, माइक सबकुछ टूट-फूट चुका था। यह जानकर भी काफी दुख हुआ कि मामले की मुख्यधारा की मीडिया में कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई। एक साल बाद भी प्रशासन ने वेमूला से जुड़ा छोटा सा मार्च नहीं होने दिया। वह भी उस जगह जहां से वह जगह हजारों मील दूर है जहां वेमूला ने सुसाइड किया। प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ-साथ पत्रकारों को भी पीटा गया। निकल रहे मार्च को जंतर मंतर पहुंचना था। याद रहे, जंतर मंतर वह जगह है जिसे प्रदर्शन करने के लिए आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया है। लेकिन लोग वहां तक पहुंच ही नहीं पाए। उससे पहले ही उन्हें रोककर हिरासत में ले लिया गया। मैं और मेर साथी लगभग लंगड़ाते हुए वापस अपने ऑफिस पहुंचे। हम लोगों को स्टोरी फाइल करनी थी लेकिन मैं तबतक भी दर्दनाक अनुभव को भुला नहीं पाई थी। तब ही सामने चल रहे टीवी पर खबर आई कि हैदराबाद की यूनिवर्सिटी कैंपस से रोहित वेमूला की मां को हिरासत में ले लिया गया है।

उस वक्त मेरे दिमाग में एक बात आई कि क्या हम लोग सचमुच किसी लोकतंत्र में रह रहे हैं ? अगली बार से जब भी मैं ऐसे किसी प्रदर्शन को कवर करने जाउंगी तो बॉडी ऑर्मर पहनकर जाया करूंगी, या फिर ‘भारत माता की जय’ चिल्लाती रहूंगी ताकी मारपीट से बच जाऊं।

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