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लेफ्टिनेंट गवर्नर बैजल के ‘पिज्जा डाउनलोड नहीं हो सकता’ पर सिसोदिया का पलटवार- इंसान अपलोड नहीं हो सकते

डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने बैजल की 'पिज्जा डाउनलोड नहीं हो सकता' वाली बात पर पलटवार करते हुए ट्वीट किया है और पूछा है कि क्या इंसान को अपलोड किया जा सकता है।

Author December 30, 2017 12:38 PM
लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल और मनीष सिसोदिया (Express Photo)

दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर अनिल बैजल और राज्य की आप सरकार के बीच डोर स्टेप सर्विसेज को लेकर जारी आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने बैजल की ‘पिज्जा डाउनलोड नहीं हो सकता’ वाली बात पर पलटवार करते हुए ट्वीट किया है और पूछा है कि क्या इंसान को अपलोड किया जा सकता है। उन्होंने ट्वीट किया, ‘यह सही है कि ऑनलाइन डिलीवरी से पिज्जा डाउनलोड नहीं हो सकता, लेकिन एक जीते-जागते इंसान को भी ऑनलाइन अपलोड करके सरकारी ऑफिस में नहीं पहुंचाया जा सकता। अब या तो आदमी सरकारी दफ्तर आए या फिर सरकार आदमी के घर जाए। अगर फिजिकल वेरिफिकेशन होगा तो इसमें से एक काम तो करना पड़ेगा।’

इसके अलावा एक अन्य ट्वीट करते हुए सिसोदिया ने कहा, ‘मैंने एलजी साहब से अनुरोध किया है कि वे, मैं और मुख्यमंत्री जी, तीनों कुछ जन-संपर्क वाले सरकारी दफ्तरों में, बिना पूर्व सूचना के एक साथ चलें और वहां लाइन में लगे लोगों से बात करें। उनकी समस्याओं को समझें। तब इस डोर-स्टेप डिलीवरी सिस्टम के प्रस्ताव पर फैसला करेंगे।’

दरअसल, डोर स्टेप सर्विसेज को लेकर सरकार ने एक प्रस्ताव एलजी के सामने रखा था, जिसे बैजल से मंजूरी नहीं मिली थी। इस पर सिसोदिया ने कहा था कि जैसे पिज्जा की घर में जाकर डिलिवरी की जा सकती है तो जनता के जरूरी कागजात घर जाकर क्यों नहीं बनाए जा सकते? इस पर बैजल ने कहा था कि पिज्जा को डाउनलोड किया जा सकता है? वहीं दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल द्वारा राज्य सरकार की सरकारी सेवाओं की होम डिलीवरी संबंधी प्रस्ताव लौटाने के एक दिन बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बुधवार को बैजल के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा था कि दिल्ली के फैसले लेने का अधिकार किसके पास होना चाहिए। अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा था, “उपराज्यपाल कहते हैं कि डिजिटलीकरणहोना चाहिए। दिल्ली की चुनी हुई सरकार कहती है कि होम डिलीवरी के साथ डिजिटलीकरण होना चाहिए। इससे एलजी सहमत नहीं है। इसलिए सवाल यह है कि लोकतंत्र में ऐसी स्थिति में अंतिम फैसला किसका होगा- एलजी का या चुनी हुई सरकार का।”

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