नोटबंदी: कांपते बुजुर्ग हाथ और आॅनलाइन का ककहरा

दो बार वे रकम जमा करवाने बैंक भी गए, लेकिन वहां लगी लंबी लाइन के कारण बैंक के भीतर तक नहीं पहुंच पाए।

Demonetization, Demonetization India, Bank Lady Lucknow, Lucknow, India, Demonetization India, Bank Ladyसांकेतिक फोटो।

नोटबंदी को एक महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं। सरकार के इस फैसले से सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों को हो रही है जोकि नई करंसी के लिए परिवार के अन्य लोगों पर आश्रित हैं। सामाजिक सुरक्षा के लिए उन्होंने जो रकम संजोकर रखी थी, वह भी सबकी नजरों में आ गई है। वहीं करंसी के लिए लगी लंबी लाइनों को पार कर बैंक के भीतर पहुंचना भी उनके लिए आसान नहीं है। कई बैंकों में तो बुजुर्गों के लिए अलग लाइनें भी नहीं है।  एटीएम पर लाइन में खड़े लोग तो यहां तक कह देते हैं कि सरकार ने बैंकों के भीतर जाने के लिए बुजुर्गों की अलग लाइन का आदेश दिया है, न कि एटीएम के लिए। ऐसे में कैशलेस लेन-देन की बात ज्यादातर बुजुर्गों की समझ से परे है। वे अभी भी चेकबुक और पासबुक के पुराने बैंकिंग सिस्टम से बंधे हुए हैं। आॉनलाइन बैंकिंग में भी उनका ज्यादा भरोसा नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि कांपते हाथों से अगर कोई गलत बटन दब गया, तो उनका पैसा किसी और के पास पहुंच जाएगा। एक समय में बुजुर्गों के लिए आवाज उठाने वाले दिल्ली के मंत्री विजय गोयल अब राजधानीवासियों को कैशलेस प्रणाली के फायदे समझाने में लगे हैं।

देश की कुल आबादी का 8 फीसद हिस्सा 60 साल से ज्यादा के बुजुर्गों का है। दिल्ली में 8.5 फीसद हिस्सा बुजुर्गों का है। यह आंकड़ा 9.5 लाख का है। एक शोध के मुताबिक, राजधानी में 40 फीसद बुजुर्ग निम्न आय वर्ग की श्रेणी में आते हैं। बीते साल बुजुर्गों के साथ ज्यादातर अपराध उनकी संपत्ति लूटने के चक्कर में हुए हैं। निम्न आय वर्ग के जिन लोगों को सरकार से हर माह 1500 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते थे, वे भी काफी समय से बंद हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की नोटबंदी से सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों को हो रही है। पटपड़गंज में रहने वाले 80 साल के राजकुमार नोटबंदी के बाद काफी परेशान हैं। एक सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपने बड़े बेटे के साथ रह रहे हैं। उनकी पत्नी का करीब 10 साल पहले देहांत हो गया था। राजकुमार ने बताया कि उनकी पत्नी मरने से पहले घर में कई स्थानों पर पैसा छिपाकर रख गई थी। बाद में उन्हें इसका पता चला, तो उन्होंने पत्नी की याद समझकर उन रुपयों को नहीं छेड़ा। राजकुमार ने बताया कि 500-1000 हजार रुपए के नोट बंद होने के बाद उन्होंने घर की अलग-अलग जगहों से वह पैसा जमा किया। वे उस रकम को घर के अन्य सदस्यों से छिपाकर अपने खाते में रखना चाहते थे।

दो बार वे रकम जमा करवाने बैंक भी गए, लेकिन वहां लगी लंबी लाइन के कारण बैंक के भीतर तक नहीं पहुंच पाए। इसका नतीजा यह हुआ कि उस रकम की जानकारी उन्हें मजबूरन परिवार के अन्य सदस्यों को देनी पड़ी। रोहिणी में रहने वाले 78 साल के सुरजीत सिंह के दोनों बेटे विदेश में हैं। यहां पर वे अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। बेटे समय-समय पर उन्हें पैसा भेजते रहते हैं। नोटबंदी से पहले सुरजीत बैंक जाते थे और बैंक पासबुक पर भेजी गई रकम भरवाकर जरूरत का पैसा घर ले आते थे। बुढ़ापे की वजह से उनके हाथ कांपते हैं। बैंक वाले कई बार उनसे डेबिट कार्ड बनवाने के लिए कह चुके हैं, लेकिन उस पर उन्हें भरोसा नहीं है। सुरजीत का कहना है कि पासबुक में जो राशि भरी होती है, वह ठीक होती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो नोटबंदी का फैसला लिया है, उससे क्या होगा, वे उस पर कुछ नहीं कहना चाहते हैं। उनका कहना है कि वे अपने बैंक में इन दिनों पासबुक नहीं भरवा पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि दो चेक तो इसलिए खराब हो गए, क्योंकि बैंक वाले बोले कि उनके चेक पर दस्तख्त नहीं मिल रहें हैं। सुरजीत का कहना है कि बैंकों में भीड़ इतनी ज्यादा है कि चेक पर दस्तखत करते समय उनके हाथ कांप गए होंगे। वे इसे अपनी गलती नहीं मानते और सारा दोष सरकार पर मढ़ रहे हैं, जिसकी वजह से उन्हें अपने ही पैसे निकलवाने के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है।

लक्ष्मी नगर के शिवकुमार समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार जिस प्लास्टिक मनी की बात कर रही है, वह क्या बला है। पेशे से बढ़ई शिवकुमार का कहना है कि वे रोजाना औसतन 800 से 1000 रुपए कमा लेते थे। उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटियां हैं, जो अभी पढ़ रही हैं। उन्हें बैंक में खाता खुलवाने की भी कभी जरूरत महसूस नहीं हुई। शिवकुमार क ा कहना है कि बेटियों की शादी के लिए वे काफी समय से रकम जोड़ रहे थे। अब पुराने नोट बदलवाने के लिए उन्हें बैंक में खाता खुलवाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार अब घर का खर्च नए तरीकों से चलाने के लिए कह रही है, जो उनकी समझ से परे है। पश्चिम विहार के सुरेश कुमार का कहना है कि बैंक वालों ने उनका एक डेबिट कार्ड तो बनाकर दिया है, लेकिन आज तक उन्होंने इसका इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि उन्हें पता ही नहीं कि उस कार्ड को कैसे इस्तेमाल किया जाता है। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि डेबिट कार्ड से पैसा निकालने के लिए एटीएम में एक पिन नंबर डालना पड़ता है, तभी वह रकम निकलवा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में सरकार क्या कदम उठा रही है, इस पचड़े में वे नहीं पड़ना चाहते। वे बस पहले की ही तरह अपनी रकम बैंक से निकाल कर खर्च करना चाहते हैं।

 

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