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पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग असंवैधानिक और अवास्तविक

दिल्ली सरकार की पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा ने कहा कि हर राजनीतिक दल का अपना अनुभव और विश्वास है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए

Author नई दिल्ली, 5 जून। | June 6, 2018 4:38 AM
दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे के सबसे बड़े विरोधी भीमराव आंबेडकर थे।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग पर बहस के लिए केजरीवाल सरकार ने बुधवार से विधानसभा का तीन दिनों का विशेष सत्र बुलाया गया है, लेकिन संविधान विशेषज्ञों और दिल्ली से जुड़े पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि पूर्ण राज्य की मांग संविधान के दायरे से बाहर है, अवास्तविक है और दिल्ली की जनता के हित में नहीं है। दिल्ली की समस्या पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल पाना नहीं है, बल्कि अधिकारों के कई केंद्र होना है जिसमें थोड़ा-बहुत फेरबदल कर सहयोगात्मक तरीके से बेहतरीन काम किया जा सकता है।

मांग संवैधानिक दायरे से बाहर

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा व दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा ने कहा कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे के सबसे बड़े विरोधी भीमराव आंबेडकर थे। पूर्ण राज्य बनाने का अर्थ है आंबेडकर के सिद्धांतों को खारिज करना। शर्मा ने कहा, ‘संविधान सभा में कांग्रेस नेता और संविधान सभा के सदस्य पट्टाभि सीतारमैया के नेतृत्व में एक समिति बनाई गई थी। समिति ने दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की अनुशंसा की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद को सौंपी। राजेंद्र प्रसाद ने संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष भीमराव आंबेडकर को रिपोर्ट भेज दी, लेकिन आंबेडकर ने एक सिरे से रिपोर्ट को खारिज करते हुए चार महत्त्वपूर्ण बातें कहीं। पहली, भारत की राजधानी किसी राज्य सरकार के तहत नहीं होगी। दूसरी, दिल्ली के बारे में केवल और केवल संघ सरकार ही कानून बना सकती है, अन्य किसी की कोई भूमिका नहीं होगी। तीसरी, दिल्ली में एक ही सरकार होगी, दो नहीं और वो संघ की सरकार होगी। और चौथी, राष्ट्रपति अगर चाहें तो स्थानीय स्तर पर अलग से विधायिका और प्रशासन बना सकते हैं, लेकिन उसके काम और अधिकार का निर्णय राष्ट्रपति करेंगे। यह स्थानीय व्यवस्था केंद्र सरकार के अधीन काम करेगी’।

केवल संसद कर सकती है बदलाव

दिल्ली सरकार की पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा ने कहा कि हर राजनीतिक दल का अपना अनुभव और विश्वास है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए, लेकिन यह मांग अवास्तविक है। उन्होंने कहा, ‘संविधान में दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश बना है तो इसमें बदलाव केवल संसद कर सकती है, संसद में प्रस्ताव तो केंद्र सरकार ही लाएगी, लेकिन वो ऐसा क्यों करेगी, यह राजधानी तो पूरे देश की है, किसी एक दल की नहीं। दूसरा, पूर्ण राज्य की स्थिति में या तो केंद्र सरकार, संसद व सुप्रीम कोर्ट सभी को विस्थापित करना होगा या उन्हें दिल्ली को विभाजित कर जगह देनी होगी। बहुत बारीकी से कई सालों में देखा गया है कि यह कभी संभव नहीं है। एसके शर्मा ने कहा कि आज दिल्ली को देश की सबसे बेहतरीन प्रशासनिक व्यवस्था हासिल है क्योंकि यह राजधानी है। बिजली, सड़क, सुरक्षा, प्रशासनिक व्यवस्था का एक स्तर है। राजधानी चाहे देश की हो या राज्य की, उनका स्तर राज्यों से ऊपर होता है, ऐसे में पूर्ण राज्य की मांग से जनता को नुकसान होगा। शैलजा चंद्रा ने भी दिल्ली के केंद्र शासित प्रदेश होने को जनता और राज्य सरकार के हित में बताया। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस, यहां के शिक्षकों व अधिकारियों सभी का पेंशन व अन्य खर्च केंद्र उठाता है।

समस्या अधिकारों के कई केंद्र होना है

ओमेश सहगल ने कहा कि समस्या दिल्ली को पूर्ण राज्य मिलना नहीं है, बल्कि समस्या अधिकारों के कई केंद्र (मल्टीप्लीसिटी ऑफ अथॉरिटी) होना है। डीडीए और नगर निगमों पर मुख्यमंत्री का थोड़ा नियंत्रण हो तो शासन बेहतर चल सकता है। शैलजा चंद्रा ने भी कहा कि मुख्यमंत्री को डीडीए का अध्यक्ष बनाने व ट्रैफिक पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करने जैसे बदलाव कर चीजों को आसान किया जा सकता है। दोनों पूर्व अधिकारियों ने कहा कि राज्य सरकार को इच्छाशक्ति, दृष्टिकोण में बदलाव और केंद्र के साथ बेहतर सहयोग से काम करने की जरूरत है।

शैलजा चंद्रा ने कहा कि दिल्ली में 1993 से सरकारें चल रही हैं और मेट्रो, बिजली के निजीकरण जैसे अच्छे काम केवल इसलिए हो पाए हैं क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने केंद्र के साथ सहयोग, विनम्रता और समझदारी से मिलकर काम किया।

तो क्यों उठी पूर्ण दर्जे की मांग

एसके शर्मा ने कहा कि चुने हुए प्रतिनिधियों की यह मांग पुलिस को अपने अधीन कर बल हासिल करने और डीडीए व निगम जैसे महकमों से पैसे हासिल करने के लालच पर आधारित है। यही कारण है कि पूर्ण राज्य की मांग कभी जन आंदोलन नहीं बन पाई। सहगल ने कहा कि यह मांग सिर्फ एक राजनीतिक बहाना है।

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