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अग्निकांड से निपटने में दिल्ली के अस्पताल भी बेहाल

अनाज मंडी की घटना से देश की राजधानी में स्वास्थ्य इंतजामों की एक बार फिर कलई खुली। यहां के गिनती के अस्पतालों में ही जले लोगों के इलाज के इतंजाम हैं।

दिल्ली के अनाज मंडी में लगी आग को बुझाने के लिए आई फायर ब्रिगेड की गाड़ियां (फोटो सोर्स- ANI)

उपहार कांड सहित कितने बम धमाके जैसी आपदा झेल चुकी दिल्ली में जले लोगों के इलाज के इंतजाम अभी भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है जबकि यह देश की राजधानी है। इतना ही नहीं पूरे उत्तर भारत में जले या किसी विस्फोटक घटना के पीड़ितों के इलाज का और कहीं भी कोई इंतजाम नहीं, खासकर सरकारी अस्पतालों में। यहां तक कि अभी तक देश के शीर्ष संस्थान एम्स में बर्न (दग्घ) विभाग नहीं शुरू हो पाया है। जबकि निजी अस्पताल 30 फीसद से अधिक जले मरीजों को कानूनी मामला होने की वजह से लेते ही नहीं। जबकि जलने के मामले में ज्यादातर पीड़ित गरीब ही होते हैं।

अनाज मंडी की घटना से देश की राजधानी में स्वास्थ्य इंतजामों की एक बार फिर कलई खुली। यहां के गिनती के अस्पतालों में ही जले लोगों के इलाज के इतंजाम हैं। जिन अस्पतालों में बर्न विभाग है उनमें मुख्य रूप से सफदरजंग, एलएनजेपी, आरएमएल व जीटीबी अस्पताल हैं। जहां करीब 500 से 600 बिस्तरों की जरूरत हैं वहां महज 150 से 200 बिस्तर ही अभी तक हैं।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण
दूसरे सबसे बड़े इंतजाम वाले इस अस्पताल में कुल करीब 100 बिस्तर है जिनमें से बर्न के लिए 60 बिस्तर हैं। इस अस्पताल में भी दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों के घायलों का बोझ है। हर महीने यहां 150 घायल आते हैं। इस अस्पताल में देश भर से उत्कृष्ट सेवा देने वाले डॉ आर बी आहूजा ने बताया कि वे 20 -30 साल तक लगातार कोशिश करते रहे कि अस्पताल में त्वचा बैंक खुल जाए क्योंकि जले मरीज के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती त्वचा का मिलना है। लेकिन अस्पताल में त्वचा बैंक नहीं शुरू हो पाया। उन्होने बताया कि नकली त्वचा बहुत महंगी होती है। जो गरीब मरीज वहन नहीं कर पाते। हार कर उन्होंने यह अस्पताल छोड़ दिया एक निजी अस्पताल चले गए। यहां से डॉ आशीष राय सहित कई डॉक्टर छोड़ गए।

राममनोहर लोहिया अस्पताल
राम मनोहर लोहिया अस्पताल में पहले केवल बर्न यूनिट भर थी बाद में सफदरजंग के चिकित्सक को यहां लाकर विभाग शुरू किया गया लेकिन अभी तक भी इस अस्पताल में 28 बिस्तरों का वार्ड बन पाया है। बर्न के केवल 20 बिस्तर। यहां विभागाध्यक्ष सहित सात संकाय हैं। यहां के एक चिकित्सक ने बताया कि रोजाना के लिहाज से तो फिर भी हम संभाल लेते हैं लेकिन किसी आपदा की सूरत में इतने बिस्तर खाली पाना बड़ी चुनौती है। गुरु तेग बहाहुर अस्पताल में 22 बिस्तरों व दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल छह बिस्तरों का इंतजाम है। जीटीबी अस्पताल में भी पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बोझ तो है ही अन्य राज्यों के भी घायल लाए जाते है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के इंदौर में जले मरीजों के इलाज का इंतजाम है।

सफदरजंग अस्पताल
सफदरजंग अस्पताल में करीब 70 से 80 बिस्तरों का इंतजाम है जहां दो आइसीयू हैं। यह न केवल दिल्ली का बल्कि एशिया स्तर की गुणवत्ता वाला अस्पताल तो है लेकिन यह पूरे उत्तर भारत का अकेला अस्पताल है जहां बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा झारखंड ,राजस्थान,उत्तरांचल व उत्तरी मध्य प्रदेश तक से घायल आते हैं। यहां औसतन पांच से छह नए घायल रोज आते हैं। एक वरिष्ठ चिकित्सक ने बताया कि कम संसाधन होने की वजह से जिस मरीज को अस्पताल में हम पांच-छह दिन में ही छुट्टी दे देते हैं। फिर ओपीडी में बुला कर उसे आगे का इलाज देते हैं। सफदरजंग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ वीके तिवारी का कहना है कि सफदरजंग के दूसरे वार्डों में जहां एक बिस्तर पर दो से तीन मरीजों का इलाज किया जाता है वहीं बर्न विभाग की मजबूरी है कि एक बिस्तर पर एक ही मरीज को रख सकते हैं।

एम्स
एम्स में अभी तक बर्न विभाग शुरू ही नहीं हो पाया है। हालांकि यहां के ट्रोमा सेंटर में 100 बिस्तरों का बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी विभाग बन रहा है जहां करीब 60 बिस्तर जले मरीजों के लिए होंगे बाकी प्लास्टिक सर्जरी के लिए होंगे। उम्मीद है कि अगले साल मार्च में यह विभाग चालू हो पाएगा। जिसमें तमाम आधुनिक सुविधाएं होंगी।

 

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