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तदर्थ शिक्षकों के लिए शुरू हुई जंग, स्थायी नौकरी होती तो जिंदा रहता मेरा बच्चा…

नियमित और वित्त संवीकृत पद पर चार महीने से ज्यादा काम करने वाला व्यक्ति उस पद पर स्थायी नौकरी पाने का हकदार है।
Author नई दिल्ली | October 9, 2016 04:07 am
दिल्ली विश्वविद्यालय।

दिल्ली विश्वविद्यालय में तदर्थ शिक्षकों के स्थायित्व की लड़ाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। राष्ट्रपति को लिखित व हस्ताक्षरित ज्ञापन दिए जाने के बाद कैंपस के उन तदर्थ लोगों ने, जिन्हें नौकरी जाने का डर सताया करता था, शुक्रवार देर रात तक अपने वरिष्ठों से तर्क कर बेबाकी दर्ज कराई। मातृत्व अवकाश न मिलने के कारण अपने नवजात को खो चुकी एक शिक्षिका हालांकि अपनी बात पूरी करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी, लेकिन उसके ‘कम शब्दों’ को कैंपस के अगुआओं ने शायद ‘पूरा सुना’।

करीब सात घंटे चले तर्क-वितर्क के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) ने लीक से हटकर एक फैसला लिया और यह था, विश्वविद्यालय के तदर्थ शिक्षकों (ऐडहॉक) को उनके कॉलेजों में ही स्थायी कराने का बीड़ा उठाने का फैसला। इसे तदर्थ आंदोलन की जीत इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है। अब तक डूटा केवल ‘रोस्टर और भर्ती’ की मांग किया करता था, लेकिन इस बार उसने साफ कर दिया है कि वह तदर्थ शिक्षकों के सामूहिक स्थायीकरण को लेकर आंदोलन चलाएगा और एक आदेश से पक्का करने का कानूनी उपबंध अपनाएगा। इसकी पुष्टि डूटा अध्यक्ष नंदिता नारायण ने जनसत्ता से की। नंदिता ने कहा, ‘यह फैसला ऐतिहासिक कदम साबित होगा। पानी सिर से ऊपर जा चुका है। हमने तदर्थ शिक्षकों के सामूहिक स्थायीकरण के लिए विश्वविद्यालय से विधिवत निपटान कराने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।’

सूत्रों के मुताबिक, इस पर काम 16 अक्तूबर के बाद शुरू होना है। इस कड़ी में डूटा एक कमेटी गठित कर रहा है, जो इसका प्रारूप तय करेगी कि कैसे सभी को स्थायित्व मिले और रोस्टर का पालन हो। इसके बाद सभी कॉलेजों के स्टाफ एसोसिएशन की राय ली जानी है। फिर डूटा इस बाबत आम सभा बुलाकर इसे पारित करेगा। फिर इसे विद्वत परिषद (ईसी) से पास कराया जाएगा। अगर सब कुछ ठीक रहा तो एक आदेश से डूटा के तय प्रारूप में आने वाले सभी तदर्थ शिक्षक स्थायी हो जाएंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय संसद के विशेष अधिनियम से बनी एक आॅटोनॉमस बॉडी है, जिसकी विद्वत परिषद ऐसे फैसले लेने के लिए अधिकृत है।
विश्वविद्यालय के कानूनी पहलुओं के जानकारों की मानें, तो ऐसा कई बार हो चुका है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही 1977, 1987,1998 और 2003 में विद्वत परिषद ने अपनी अनुशंसा से तब के तदर्थ शिक्षकों को स्थायी किया था। बता दें कि कैंपस में शुक्रवार देर रात हुई बैठक में अदालत के कई फैसले तर्कों में शुमार हुए। मसलन आइआइटी-आइआइएम में तीन साल के बाद कोई तदर्थ नहीं रहता, वहां स्वत: स्थायीकरण का प्रावधान है।

फिर यहां 10-12 साल के पीड़ितों को कतार में क्यों रखा गया है? हरियाणा-चंडीगढ़ हाई कोर्ट के आदेश से चंडीगढ़ केंद्रीय विश्वविद्यालय को ईसी के जरिए विधेयक लाकर तदर्थ को पक्का करना पड़ा था। तो फिर डीयू में क्यों नहीं? दिल्ली हाई कोर्ट ने इस बाबत आए एक फैसले में साफ कहा है कि नियमित और वित्त संवीकृत पद पर चार महीने से ज्यादा काम करने वाला व्यक्ति उस पद पर स्थायी नौकरी पाने का हकदार है। फिर स्टैंड लेने में देरी क्यों? महिला शिक्षकों की आपबीती के आगे कई लोगों के सिर झुक गए। हर गुट व दल के शिक्षक एक मत थे कि इसका स्थायी हल किसी कीमत पर भी निकले। आखिर में डूटा अध्यक्ष ने माइक पकड़ा और कहा, ‘यह तो दासता है। यहां तो यह पारिवारिक हिंसा की ओर भी जा रही है। डूटा इसे पहली प्राथमिकता पर लेने की घोषणा कर रहा है।’

 

 

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