दिल्ली को अब तक नसीब नहीं हुआ महिला थाना - Jansatta
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दिल्ली को अब तक नसीब नहीं हुआ महिला थाना

राजधानी को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित माना जाता है, इसके बावजूद यहां एक भी महिला थाना नहीं है।

Author नई दिल्ली | March 7, 2016 1:53 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।(File Pic)

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामले में भी दिल्ली सबसे आगे है। दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों की मानें तो 15 फरवरी 2016 तक सिर्फ दो महीने में दिल्ली में बलात्कार के 213 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्य अपराधों का स्पष्ट वर्गीकरण नहीं किया गया है। हालांकि दिल्ली में होने वाली घटनाओं से सबक लेते हुए राजधानी से सटे गुड़गांव में पिछले साल ही महिला थाना खोला गया। हरियाणा के 21 जिलों में भी महिला थाना खोले जाने की घोषणा की गई है।

दिल्ली पुलिस की पीआरओ शाखा की इंस्पेक्टर सुनीता कहती हैं कि दिल्ली एक बड़ा जिला है। किसी एक जगह महिला थाना खोल देने से कुछ हासिल नहीं हो सकता। दक्षिणी हिस्से में थाना खोला जाए तो उत्तरी हिस्से की महिलाएं वहां शिकायत करने कैसे पहुंचेंगी। उनका कहना है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की शिकायतें हाल के दिनों में काफी बढ़ गई हैं। इनमें दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और बलात्कार जैसे मामले ज्यादा हैं। यही कारण है कि दिल्ली के हर थाने में महिला हेल्प डेस्क बनी हुई है। इसकी इंचार्ज महिला इंस्पेक्टर ही होती है, जो पीड़िता की शिकायत दर्ज कराने में मदद करती है। वह बताती हैं कि राजधानी में महिलाओं के लिए नौ स्पेशल वीमेन यूनिट मौजूद हैं, लेकिन ये यूनिट केवल काउंसलिंग का काम देखती हैं।

स्पेशल यूनिट फॉर वीमेन एंड चिल्ड्रन की डीसीपी वर्षा शर्मा बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार वह वैवाहिक विवादों पर काउंसलिंग और मध्यस्थता कराते हैं, जबकि महिला थाने का अधिकार क्षेत्र विस्तृत होता है। वहां न सिर्फ शिकायत लिखी जाती है बल्कि पूछताछ से लेकर जांच तक का जिम्मा महिला पुलिसकर्मियों पर होता है। इसके अलावा वहां महिलाओं के खिलाफ होने वाले तमाम अपराधों की शिकायत दर्ज होती है। पुलिस थाने में ज्यादातर कर्मचारी भी महिलाएं ही होती हैं।

करनाल स्थित पुलिस अकादमी पर शोध करने वालीं प्रसिद्ध साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा महिला थानों की जरूरत पर कहती हैं कि ऐसे थाने खुलने बेहद जरूरी हैं। उनका कहना है कि अगर पुरुष इतने ही संवेदनशील होते तो महिला पुलिसकर्मियों की जरूरत ही क्यों पड़ती? ऐसा माना जाता रहा है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के ज्यादातर मामले सामने ही नहीं आ पाते। ऐसे में महिला पुलिसकर्मी होने से पीड़ित महिलाएं अपने साथ हुए अपराध की शिकायत दर्ज करा सकती हैं।

महिला को देखकर महिलाएं ज्यादा द्रवित होती हैं और सच बताती हैं। महिला पुलिसकर्मियों के ऐसे अनुभव मैत्रेयी ने अपनी किताब फाइटर की डायरी और उसकी अगली कड़ी गुनाह-बेगुनाह में भी बयां किए हैं। पुलिस की कुर्सी पर बैठकर पुरुष जैसा व्यवहार करने वाली महिलाओं के सवाल पर उनका कहना है कि महिलाएं दबाव में ऐसा करती हैं। वह पुरुष पुलिसकर्मियों से बराबरी करने लगती हैं और उनके जैसा बर्ताव करती हैं। महिलाएं पुलिस में केवल पुलिस होती हैं पुरुष नहीं। सभी महिला पुलिसकर्मियों को यही सोचकर काम करना चाहिए।

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