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दिल्ली मेरी दिल्लीः बड़े आयोजन के पेंच

सड़कों पर संघर्ष करके दिल्ली में प्रचंड बहुमत के साथ राज कर रही आम आदमी पार्टी (आप) ने बड़े सार्वजनिक आयोजन करना छोड़ दिया है।

Author नई दिल्ली | March 7, 2016 2:15 AM

सड़कों पर संघर्ष करके दिल्ली में प्रचंड बहुमत के साथ राज कर रही आम आदमी पार्टी (आप) ने बड़े सार्वजनिक आयोजन करना छोड़ दिया है। तभी तो सरकार की पहली सालगिरह साल पर विज्ञापन ही ज्यादा दिखे, समारोह कम हुए। विपक्षी तो आरोप लगाते हैं कि सरकार की लोकप्रियता में कमी आ रही है और यह सार्वजनिक रूप से न दिख जाए इसलिए आप बड़ी सभा से परहेज कर रही है। लोगों का यह भी मानना है कि सत्ता में आने पर इस तरह के सार्वजनिक आयोजनों में कोई न कोई पंगा हो ही जाता है। जंतर-मंतर पर किसानों की सभा की तो एक किसान ने खुदकुशी कर ली, इसकी सफाई आप के नेता अब तक दे रहे हैं। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के सार्वजनिक आयोजन में एक लड़की ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर स्याही फेंक दी। वैसे सत्ता में आने वाली पार्टी से लोगों की उम्मीदें तो बढ़ ही जाती हैं, तभी तो दिल्ली सरकार के मुख्यालय दिल्ली सचिवालय पर बड़ी तादाद में दुखी लोग हर रोज मिल जाते हैं।
भाजपा नेताओं की परीक्षा
विधानसभा चुनाव के बाद से रोजाना ही भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने की चर्चा चल रही है। हफ्ते भर प्रदेश अध्यक्ष के लिए किसी एक व्यक्ति का नाम सुर्खियों में रहता है और फिर किसी दूसरे का। अब कहा जा रहा है कि 19-20 मार्च को भाजपा की कार्यकारिणी बैठक से पहले राष्ट्रीय टीम में बदलाव किया जाएगा और उसी के साथ दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष का नाम भी घोषित हो जाएगा। इस मामले में मौजूदा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ज्यादा कुछ कर नहीं पा रहे हैं। दिल्ली की सरकार की नाकामियों पर भाजपा केवल बयान भर ही जारी कर पाती है। साल भर बाद निगमों के चुनाव हैं और उससे पहले निगमों की 13 सीटों के उपचुनाव होने हैं। अगर यही हाल रहा तो आप की बल्ले-बल्ले होने वाली है।
आप को नहीं भरोसा
चाहे कैसी भी सीडी हो, आम आदमी पार्टी बिना जांच उन पर विश्वास नहीं करती। बशर्ते सीडी में मौजूद व्यक्ति खुद ही प्रमाणिकता की गवाही क्यों नहीं दे रहा हो। मामला आप विधायक अमानतुल्ला खान का है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खान के विवादित बयान के मामले पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता से सवाल पूछा गया तो उनका आॅफ रिकार्ड जवाब था कि सीडी की जांच करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। जब उनसे कहा गया कि खुद अमानतुल्ला खान कबूल कर रहे हैं कि उन्होंने ऐसा कहा है, तो पार्टी नेता का जवाब था कि यह जांच का विषय है। हो सकता है कि पार्टी को खान के विवेक पर भरोसा ही नहीं या फिर शायद इसी को कहते हैं, लकीर का फकीर।
दौलतमंदों का विरोध
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के लोगों को यूपी के बाकी इलाकों से ज्यादा दौलतमंद मानते हुए राज्य सरकार ने यहां की जमीन की रजिस्ट्री को दो फीसद महंगा करने का फैसला लिया है। 3 मार्च को यूपी कैबिनेट ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा में स्टांप ड्यूटी को 5 से बढ़ाकर 7 फीसद करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। कैबिनेट के इस फैसले का दोनों शहरों के तमाम संगठनों समेत निवासियों ने भी विरोध किया है। इसी कड़ी में शहर के उद्यमियों के संगठन नोएडा एंटरपे्रन्योर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र भेजकर 2 फीसदी स्टांप ड्यूटी बढ़ाने के फैसले को पूरी तरह से विकास विरोधी कदम बताया है। उद्यमियों ने मौजूदा मंदी के माहौल में मुख्यमंत्री से फैसले को वापस लेने की मांग की है।
छवि बनाने की कोशिश
दिल्ली पुलिस के नए कप्तान के आने से उनके नीचे के अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है। आयुक्त ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं और वातानुकूलित कमरे में बैठकर अपराध की रोकथाम से लेकर ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त करने तक के निर्देश दे रहे हैं। अधिकारियों को सड़क पर निकलने का फरमान जारी कर दिया गया है। एक अधिकारी के मुताबिक, इससे कई संदेश एक साथ दिए गए हैं। एक तो ऐसे पुलिसवालों पर शिकंजा कसेगा जो खुद सड़क पर न निकलकर मातहतों को निकालते हैं, दूसरे आम लोगों की समस्याओं को अगर आला अधिकारी हल करें तो भ्रष्टाचार नहीं फैल पाएगा। कप्तान आलोक कुमार चूंकि दिल्ली पुलिस में लंबे समय से हैं और उन्हें पुलिस की कार्यप्रणाली पूरी तरह पता है लिहाजा वे अपने 17 महीने के कार्यकाल में ऐसे काम करना चाहते हैं जिससे उनकी छवि अच्छी बनी रहे।
महंगा पड़ा एलान
सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की जुगत कई बार भारी पड़ जाती है। ऐसा ही एक माजरा दिखा बीते दिनों मुनीरका में। दरअसल एक पूर्वांचल सेना नाम का एक संगठन जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गोली मारने पर 11 लाख रुपए का इनाम देने का एलान कर चर्चा में तो आ गया, लेकिन पोस्टर पर नाम और मोबाइल नंबर देना उसे भारी पड़ गया। जब पुलिस पीछे पड़ी तो संस्था का अध्यक्ष फोन स्विच आॅफ कर कहीं दुबक गया। इस तरह मुफ्त में मशहूर होने की योजना पूर्वाचल सेना को महंगी पड़ गई।
मुद्दों की मुहिम
जेएनयू के कन्हैया-प्रकरण को कुछ संगठन थमने नहीं देना चाहते। दरअसल राजनीति में बने रहने के लिए चर्चा तो जरूरी है। वैसे भी बंगाल, केरल और असम के विधानसभा चुनावों तक तो मामले को गर्म रखने की चुनौती भी है। फिर क्या, धरना-प्रदर्शन जारी रखे जाने और तमाम पिछले मुद्दों पर ‘न्याय की मांग’ शुरू करने की तैयारी चल रही है!
-बेदिल

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