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दिल्ली: 10 साल बाद भी अदालत नहीं दे सकी फैसल, आरोपी कर्मचारी धरने पर था या नहीं!

निगम कहता है कि जिस कर्मचारी को दिल्ली पुलिस ने धरना प्रदर्शन के दौरान जनता को उकसाने के आरोप में नामजद किया है। वे दरअसल उस दिन सुबह साढ़े नौ बजे से छह बजे के बीच दफ्तर में मौजूद थे।

Author नई दिल्ली | March 27, 2017 4:09 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

 

दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम के बीच के फेरे में निगम के एक कर्मचारी बुरी तरह फंस गए हैं। निगम कहता है कि जिस कर्मचारी को दिल्ली पुलिस ने धरना प्रदर्शन के दौरान जनता को उकसाने के आरोप में नामजद किया है। वे दरअसल उस दिन सुबह साढ़े नौ बजे से छह बजे के बीच दफ्तर में मौजूद थे। जबकि पुलिस का कहना है कि घटना के दिन दोपहर पौने 12 बजे से निगम के आरोपी कर्मचारी धरने में नारेबाजी कर रहे थे। मामला दस सालों से कोर्ट में है पर पीड़ित कर्मचारी का कहना है कि कोर्ट के फैसले के इंतजार में बीते दस सालों से वे घुट-घुट कर जीने को मजबूर हैं।  मामला बाहरी दिल्ली के कंझावला थाना के सुखबीरनगर, कराला का है। साल 2007 में 21 फरवरी को डीडीए के तोडफोड़ के खिलाफ उत्सव विहार कराला में लोग धरना प्रदर्शन कर रहे थे। लोग अपना घर बचाने के लिए मुख्यमंत्री तक से गुहार लगा चुके थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि डीडीए उनके घर तोड़ने को आमदा है तो उन लोगों ने डीडीए के खिलाफ रामा विहार चौक पर प्रदर्शन किया। पुलिस ने उन्हें एहतियात रोक लिया और इसी दौरान दोनों तरफ से झड़प हो गई। दोनों तरफ से लोग घायल हुए। कंझावला थाना में दर्ज एफआइआर के मुताबिक इस दौरान कई लोगों ने डीडीए के खिलाफ नारेबाजी की और लोगों को भड़काया। इसी भड़काने में कथित तौर पर अन्य लोगों के साथ लोकेश श्रीवास्तव ने एसएचओ को धक्का मारा और प्रदीप गुप्ता और अनिल भारती ने र्इंट फेंकी जिससे सुशील नाम का एक कांस्टेबल घायल हो गया। हंगामे में कई गाड़ियां टूटीं, फिर पुलिस ने फरार लोगों की धड़पकड़ शुरू की।

पीड़ित प्रदीप गुप्ता ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, गृह सचिव, उपराज्यपाल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखे अपने फरियाद में कहा है कि एफआइआर में नाम दर्ज होने के दूसरे दिन उन्हें दफ्तर जाते समय पुलिस ने पकड़ लिया। कहा गया कि 21 तारीख की वारदात में वे भी शामिल थे उनपर लोगों को उकसाने और नारेबाजी करने का आरोप है।
लेकिन आज दस साल बीत जाने के बाद भी गुप्ता कोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं। गुप्ता कहते हैं कि पुलिस की कार्रवाई का तरीका आजादी के पहले जैसा ही है। घटना के बाद पुलिस ने जिसे चाहा पकड़ा, जिसका नाम सामने आया उसे एफआइआर में दर्ज कर दिया गया। वे सरकारी कर्मचारी हो, निजी काम करने वाले हों या फिर खुद का घर बचाने वाला। इसमें कुछ वैसे पुलिसवाले भी शामिल हो गए जो बिना वर्दी के वहां का दृश्य देख रहे थे। एफआइआर में नाम दर्ज होने के बाद गुप्ता को तीन महीने तक नौकरी से बाहर रखा गया। जब मंत्रालय की टीम ने मौके का मुआयना किया, तमाम साक्ष्य देखे, दफ्तर की हाजिरी बही देखी तो वो घटना वाले दिन सुबह से शाम तक दफ्तर में मौजूद थे। तब उन्हें बाइज्जत नौकरी देने की सिफारिश तब के जीएम केके मनचंदा ने की। जबकि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम के पीआइओ पीएस पवनीकर ने लिखकर दिया कि प्रदीप गुप्ता घटना वाले दिन 21 फरवरी को दफ्तर में सुबह 9.33 से शाम 5.59 तक मौजूद थे। जमनापार के सीजीओ कॉम्पलेक्स स्थित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक वित्त और विकास निगम में बतौर वरिष्ठ प्रशासनिक सहायक प्रदीप गुप्ता कहते हैं कि इस तरह की परेशानी दिल्ली में किसी को तो वह सिवाए दिल्ली छोड़ने के कोई अन्य उपाय पर विचार नहीं करेगा। पर उनके सामने दिल्ली पुलिस ने ऐसी परेशानी पैदा कर दी है कि वे भारत सरकार की नौकरी में रहते हुए दिल्ली तो छोड़ नहीं सकते कोर्ट में मामला बताकर मामले से पल्ला झाड़ लिया जाता है।

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