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दिल्ली मेरी दिल्ली-आप ने किया समर्थन का एलान

अब कांग्रेस के लिए प्रचार करने पर भाजपा के नेता कहने लगे कि ‘आप’ तो शुरू से ही कांग्रेस की बी टीम रही है और गुजरात में वह इसे साबित भी कर कर रही है।

Delhi High Court, Delhi High Court Refused, AAP Legislators, AAP Legislators case, Interim Relief, Interim Relief to AAP Legislators, AAP Legislators issue, Refused to Give Interim Relief, State newsदिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

शर्त बनी मुसीबत
आखिरकार एनजीटी की सशर्त अनुमति के बहाने दिल्ली सरकार ने सोमवार से शुरू होने वाले पांच दिन की सम-विषम योजना को टाल दिया। एनजीटी ने इस योजना में दोपहिया वाहनों व महिलाओं को छूट नहीं देने को कहा था। इससे एक तो यह साबित हुआ कि केवल सम-विषम प्रदूषण का समाधान नहीं है, दूसरा महज पांच दिनों से क्या होने वाला है? दोपहिया वाहनों को भी सम-विषम के दायरे में लाने से समस्या और बढ़ सकती है, लेकिन सरकार के पास इसका एक भी विकल्प नहीं है। कार वाले तो मेट्रो या टैक्सी से चल लेंगे, लेकिन दोपहिया वालों के लिए कोई सार्वजनिक वाहन है ही नहीं क्योंकि बसों की संख्या सामान्य से भी कम हो गई है। इसलिए एनजीटी की शर्तों को सुनकर दिल्ली सरकार को पसीने आने लगे। यह भी कहा जा रहा है कि एनजीटी की शर्त के साथ सम-विषम लागू करने पर आप के मतदाता ही सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, इसीलिए फिलहाल सम-विषम को टालने का फैसला किया गया।

कुर्सी का सवाल
कांग्रेस मुख्यालय में पिछले दिनों प्रेस कांफ्रेंस थी। इसे दो हिस्सों में बांटा गया था। एक मुद्दे पर पार्टी नेता राजीव शुक्ला को बोलना था तो वहीं कपिल सिब्बल की अगुआई में अन्य नेताओं के दल को व्यापमं के मामले में सीबीआइ और भाजपा सरकार पर हमला बोलना था। मंच पर कुर्सियां लगा दी गई थीं। माइक की व्यवस्था के अनुसार शुक्ला बीच की कुर्सी पर बैठकर अपनी बात रख रहे थे। कुछ देर तक अपनी बात रखने के बाद उन्होंने संबंधित लोगों को इशारा किया कि इंतजार कर रहे नेताओं की दूसरी टीम को बुला लिया जाए। सिब्बल सहित तमाम नेता पहुंच भी गए। अब नजारा कुछ ऐसा था कि इधर शुक्ला बोले जा रहे थे और उनके पीछे तमाम नेता खड़े थे। शुक्ला के अगल-बगल कुर्सियां खाली थीं, लेकिन कोई उन पर बैठ नहीं रहा था। करीब आधा-एक मिनट तक ऐसी ही स्थिति बनी रही। आखिरकार शुक्ला बीच की कुर्सी छोड़कर बायीं ओर खिसके, तब कहीं जाकर बाकी नेता कुर्सियों पर बैठे। चूंकि दूसरे हिस्से में सिब्बल की अगुआई में पार्टी की बात रखी जानी थी, लिहाजा सिब्बल उसी कुर्सी पर बैठे जहां माइक लगा था। उसके बाद ही बात आगे बढ़ पाई।

समर्थन का एलान
आम आदमी पार्टी (आप) दिल्ली समेत उन राज्यों में भी सक्रिय होने लगी है जहां कांग्रेस और भाजपा सीधी लड़ाई में हैं। दिल्ली नगर निगम चुनाव में अगर आप और कांग्रेस में से एक चुनाव मैदान में रहता तो भाजपा की जीत नहीं होती। जैसे ही आप ने गुजरात में चुनाव लड़ने की घोषणा की तो आरोप लगने लगा कि भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए आप वहां चुनाव लड़ने वाली है। हर स्तर पर आरोप लगने के बाद आप ने गिनती की सीटों पर चुनाव लड़ने और बाकी सीटों पर कांग्रेस को समर्थन देने की घोषणा कर दी, जिससे उस पर भाजपा समर्थक होने का आरोप न लगे, लेकिन अब कांग्रेस के लिए प्रचार करने पर भाजपा के नेता कहने लगे कि ‘आप’ तो शुरू से ही कांग्रेस की बी टीम रही है और गुजरात में वह इसे साबित भी कर कर रही है। वैसे आप ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी चुनाव लड़ने की घोषणा की है, उन राज्यों में भी कांग्रेस और भाजपा के अलावा किसी तीसरे दल की मौजूदगी नहीं है।

ट्रांसफर का इंतजार
दिल्ली सरकार के एक आला अधिकारी हैं। सरकार में पहले भी अहम पदों पर रह चुके हैं और अब भी महत्त्वपूर्ण पद पर ही काबिज हैं, लेकिन उनका अंदाज बिल्कुल बदला-बदला सा है। सरकार से उनका लगातार छत्तीस का आंकड़ा बना हुआ है। कानून के अनुसार उन्हें उपराज्यपाल की सुननी पड़ती है जबकि सियासत का तकाजा यह है कि वे मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों की सुनें। ऐसे में स्थिति कई बार बेहद असहज हो जाती है। कांग्रेस सरकार के जमाने में इस अधिकारी का जबरदस्त रुतबा रहा है, लेकिन आजकल विधायक भी इन पर निशाना साधने से नहीं चूकते। इस अधिकारी के कुछ करीबी मित्रों ने हाल ही में उनसे मुलाकात की और उनका हाल जाना। जब उनसे पूछा गया कि सब कैसा चल रहा है तो उन्होंने जबरन मुस्कुराते हुए उल्टा सवाल दागा कि क्या करोगे जानकर। मित्रों ने इसके बावजूद अपना सवाल दोहराया तो उनका कहना था कि बेहद बुरा हाल है जैसे चक्की में आटा पिसता है, वैसे ही दिल्ली के अफसरों का हाल है। न इस करवट चैन है, न उस करवट। अब तो बस ट्रांसफर का इंतजार है।

चुनावी जुमलेबाजी
प्रदूषण से जहां एक तरफ जनता हकलान है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिज्ञों की कोशिश लोगों को इस त्बहस में उलझाना है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? पिछले पूरे हफ्ते दिल्ली का जो हाल रहा उसके लिए राजधानी व केंद्र की सरकार ने क्या कदम उठाए और प्रदूषण पर उसका क्या असर रहेगा यह तो कुछ दिनों में पता चलेगा, लेकिन इसकी आड़ में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति जम कर हुई और नकारात्मक राजनीति रूपी प्रदूषण में एक डिग्री का इजाफा हुआ। बहस अभी भी जोरों पर है, लेकिन उसका रुख इस ओर मुड़ गया है कि किसका शहर सबसे ज्यादा प्रदूषित है- मोदी का या केजरीवाल का। बहरहाल बेबस जनता मास्क लगाए साफ हवा का इंतजार कर रही है। अब डर यह है कि साफ हवा भी सड़क, बिजली और पानी की तरह केवल चुनावी जुमला न बन कर रह जाए।

जान बचाओ या बिजली
बीते दिनों धुंध और प्रदुषण को लेकर दिल्ली विश्व पटल पर छाई रही, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट की चर्चा आम रही। हुआ यूं कि हाल ही दिल्ली में बिजली बचाने के नाम पर सालों से सड़कों पर लगे पीली रोशनी वाले बल्बों को दूधिया रोशनी वाले एलईडी बल्बों से बदल दिया गया, लेकिन ये बल्ब धुंध की चादर और प्रदूषण में हांफने लगे। लोगों में यह चर्चा रही कि पीली रोशनी धुंध और कुहासे वाले समय में ज्यादा कारगर होती हैस लेकिन दूधिया रोशनी वाले एलईडी बल्ब तो मानो धुंध में खो ही गए। किसी ने टिप्पणी की कि दरअसल बिजली बचाने के लिए ये नई स्ट्रीट लाइटें लगाई गई हैं। इस पर दूसरे का जवाब आया- जान बचेगी तभी तो बिजली बचाओगे।
-बेदिल

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