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ठंडा पड़ा माहौल

चुनाव आयोग ने संसदीय सचिव मामले में आप विधायकों के दावों को खारिज कर दिल्ली में मध्यावधि चुनाव की संभावना बना दी।

Author July 17, 2017 2:48 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

ठंडा पड़ा माहौल
पंजाब व गोवा के विधानसभा चुनाव और दिल्ली के नगर निगम चुनाव में मिली करारी हार से राजधानी में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की अंदरूनी कलह और सियासत खुल कर बाहर आ गई और इसके नेता एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ने लगे। इसके बाद दिल्ली सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्र और आप नेता कुमार विश्वास प्रकरण से दोबारा दिल्ली की राजनीति में भूचाल आ गया। इसके अलावा चुनाव आयोग ने संसदीय सचिव मामले में आप विधायकों के दावों को खारिज कर दिल्ली में मध्यावधि चुनाव की संभावना बना दी। हालांकि उसके बाद से दिल्ली की राजनीति में सन्नाटा छा गया है। यहां तक कि बवाना विधानसभा उपचुनाव की तारीख घोषित हुए बिना सभी दलों ने अपना उम्मीदवार तय करके चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया है। कांग्रेस और भाजपा तो दिल्ली में किसी भी तरह के चुनाव का इंतजार कर रही हैं, लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी किसी न किसी बहाने चुनाव से बचना चाह रही है। शायद यही वजह है कि आप के नेता केंद्र सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल के खिलाफ आजकल कुछ नहीं बोल रहे हैं। वैसे भी चौमासे में देवता सोए रहते हैं, इसलिए कोई शुभ कार्य नहीं होता है। शायद यही मान कर विभिन्न दलों के नेता आराम से अपनी जमीन तलाशने में लगे हुए हैं।
चुनाव बिना तैयारी
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली के वोट औसत में भाजपा की हिस्सेदारी बढ़ाने की ठान ली है। बिहार मूल के गायक मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना इसी बात का संकेत था क्योंकि दिल्ली बिहारी प्रवासियों की तादाद काफी ज्यादा है। लेकिन अब शाह ने एक कदम आगे बढ़ते हुए दिल्ली के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर वोट औसत को 36-37 फीसद से बढ़ाकर 51 फीसद करने का गुरुमंत्र दे दिया है। वैसे मौजूदा माहौल में यह मुमकिन नहीं लग रहा है, लेकिन असलियत में भाजपा तब तक दिल्ली की सत्ता से बेदखल होती रहेगी जब तक उसका वोट औसत नहीं बढ़ेगा। भाजपा नगर निगम चुनाव में उतने ही वोट औसत से लगातार तीसरी बार इसलिए जीत गई क्योंकि गैर-भाजपा वोट कांग्रेस और आप में बंट गए, लेकिन हर बार ऐसा होना संभव नहीं है। भाजपा के नेता पहले दो मुख्य जातियों पर निर्भर करते थे, अब भी उनका दायरा ज्यादा बढ़ता नहीं दिख रहा है।
नेतागीरी का कमाल
दिल्ली सरकार के नुमाइंदे आंदोलन की राह से सत्ता के गलियारे तक पहुंचे हैं और अब वे आंदोलन को ही धता बताने में लग गए हैं। इसकी एक बानगी बेदिल को भी देखने को मिली। मामला आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के आंदोलन का है। मांगें मानने व उन्हें पूरा करने की बात तो दूर, मंत्री और नेता प्रतिनिधियों से मिलने तक क ो राजी नहीं। आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने के लिए चंद मनपसंद कार्यकर्ताओं को बुला कर फोटो खिंचवाई और मीडिया को जारी कर दिया कि आंदोलन खत्म हो गया है, कार्यकर्ताओं की मांगें मान ली गई हैं। यह देख आंदोलन कर रहे अधिकांश कार्यकर्ता हक्के-बक्के रह गए। बाद में पता चला कि सरकार जिन्हें अपने खेमे में खड़ा बता रही थी, उनमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कम होमगार्ड ज्यादा थे।

-बेदिल

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