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दिल्ली मेरी दिल्ली: मुख्यमंत्री या मेहमान, तैयारी की होड़

अरविंद केजरीवाल ने अपने पास कोई विभाग नहीं रखा और परंपराओं से परे जाकर मुख्यमंत्री को मिलने वाले काम भी अपने सबसे विश्वसनीय मंत्री मनीष सिसोदिया को सौंप दिए।

Arvind Kejriwal vs Arun jaitley, Arvind Kejriwal Court, Arvind Kejriwal news, Arvind Kejriwal latest News, Delhi High Court Kejriwal, Arun jaitley Financial Recordदिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

-बेदिल

मुख्यमंत्री या मेहमान

दिल्ली के बाद पंजाब और गोवा में पूरी तैयारी से चुनाव लड़ने वाली आप के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल वैसे तो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन वे दिल्ली में मेहमान की तरह ही रहते हैं। लोगों को मीडिया के जरिए खबर मिलती है कि केजरीवाल आज दिल्ली में हैं। उन्होंने शुरू से ही अपने पास कोई विभाग नहीं रखा और परंपराओं से परे जाकर मुख्यमंत्री को मिलने वाले काम भी अपने सबसे विश्वसनीय मंत्री मनीष सिसोदिया को सौंप दिए। अब तो लगता है कि अगर पंजाब या गोवा में उनकी पार्टी जीत गई, तब तो वे सच में दिल्ली के मेहमान ही बन कर रह जाएंगे। दोनों राज्यों के बाद उन्होंने दिल्ली नगर निगम चुनावों के अलावा गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी भी शुरू कर दी है, तो क्या दिल्लीवाले अब यह समझें कि केजरीवाल पराए हो गए हैं।
तैयारी की होड़
नगर निगम चुनाव से पहले दिल्ली भाजपा की कमान लोकप्रिय भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को शायद यह सोचकर सौंपी गई होगी कि भाजपा कार्यालय में लोगों का मेला लग जाएगा और निगम में सत्ता के दावेदार आप और कांग्रेस के नेता परेशान होंगे। मुमकिन है कि विधानसभा चुनावों में व्यस्तता के कारण मनोज तिवारी दिल्ली को पूरा समय न दे पा रहे हों, लेकिन होली के बाद उनका सारा फोकस दिल्ली नगर निगम चुनाव पर होगा। फिलहाल तो मेला दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर कांग्रेस और आप के दफ्तरों में देखने को मिल रहा है और यह मेला निगम चुनाव में टिकट मांगने वालों का है। हर रोज सवेरे से शाम तक दोनों दफ्तरों के सामने गाड़ियों की भीड़ लगी रहती है और ट्रैफिक जाम हो जाता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि दोनों दलों के नेता अपने दल की लोकप्रियता ज्यादा दिखाने के लिए जान-बूझ कर भीड़ इकट्ठा करते हैं। निगम चुनाव की आरक्षित सीटों का मामला अभी हाई कोर्ट में विचाराधीन है। उस पर फैसला आने के बाद सभी दलों में चुनाव की तैयारी की होड़ बढ़ने वाली है।
विवाद का कमाल
जेएनयू प्रशासन जो काम 23 दिन में नहीं कर सका, उसे डीयू के रामजस प्रकरण ने 23 मिनट में कर दिया। जी हां, जो लोग अब तक जेएनयू के प्रशासनिक भवन को घेरे बैठे थे, उन्ही के खेमे में दबी जुबान में यह चर्चा है। बता दें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पिछले 23 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों ने इस विवाद के बाद हड़ताल खत्म कर दी। यूजीसी गजट नोटिफिकेशन के विरोध में जेएनयू छात्र संघ की अगुआई में छात्र यहां आंदोलनरत थे। कुलपति के बार बार अपील करने के बावजूद वे यहां डटे थे, लेकिन जैसे ही रामजस विवाद गरमाया, उन्होंने हड़ताल वापस ले ली। किसी ने ठीक ही कहा है, उन्हें दूसरा मुद्दा मिलता दिखा तो लपक लिया। जेएनयू की ढपली डीयू में बजनी थी सो बज गई!
छपने की दरकार
दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी (आप) के आने से हाशिए पर पहुंची कांग्रेस को पिछले साल के निगम उपचुनाव ने जीवनदान दिया था। लंबे समय से दिल्ली में किसी बड़े चुनाव का इंतजार कर रही कांग्रेस ने अगले महीने होने वाले निगम चुनावों में अभी से पूरी ताकत झोंक दी है। कोई दिन ऐसा नहीं बीत रहा जिस दिन पार्टी कोई न कोई कार्यक्रम न करती हो। अच्छी-खासी तैयारी के साथ प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन की टीम ने 7 मार्च को रामलीला मैदान में कार्यकर्ता सम्मेलन के बहाने निगम चुनाव की घोषणा से पहले शक्ति प्रदर्शन करना तय किया है। उस सम्मेलन में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मुख्य वक्ता रहेंगे। कांग्रेस को भरोसा है कि सम्मेलन की सफलता से दिल्ली में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनेगा। संयोग से 7 मार्च को ही दिल्ली सरकार का बजट भी आने वाला है। यह तय है कि केजरीवाल सरकार का यह बजट निगम चुनावों को देखते हुए लोकलुभावन होगा और मीडिया में इसको खूब कवरेज भी मिलेगी। यानी रैली उस दिन मीडिया की दूसरी प्राथमिकता बन जाएगी और कांग्रेस के रणनीतिकार इससे परेशान हैं। कहा जा रहा है कि रैली तो कई महीने पहले से तय थी और उसकी कवरेज घटाने के लिए ही उसी दिन बजट पेश किया जा रहा है। इस बात में सच्चाई भले न हो, लेकिन कांग्रेसी खेमे में परेशानी जरूर बढ़ गई है।

मलाई से मतलब
हाल ही में दिल्लीवासियों के लिए सरकार ने उपराज्यपाल की मंजूरी से कुछ अहम फैसलों को अमलीजामा पहनाया। अब गेस्ट टीचरों का वेतन लगभग दुगना हो गया है, न्यूनतम मजदूरी में भी सालों बाद अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि सरकार द्वारा पिछले साल किए गए इन फैसलों को नए उपराज्यपाल की ओर से मंजूरी केंद्र की मोदी सरकार के इशारे पर आगामी निगम चुनावों को देखते हुए दी गई है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि जंग के जाने के साथ ही दिल्ली सरकार की उपराज्यपाल के साथ जारी जंग का पटाक्षेप हो चुका है क्योंकि केंद्र नहीं चाहता कि केजरीवाल सरकार उस पर असहयोग का आरोप लगा कर दिल्ली की जनता के लिए शहीद होने का दावा करती रहे। खैर चर्चा जो भी हो, जनता को मलाई खाने से मतलब है, दही चाहे जिसने भी जमाई हो।

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