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दिल्ली मेरी दिल्ली- खत्म होता विरोध

अब वे आसानी से दिल्ली के किसी भी कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं और कहीं से उनके विरोध की कोई खबर नहीं आ रही है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

खत्म होता विरोध

प्रचंड बहुमत से दिल्ली की सत्ता पाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल काफी दिनों के बाद बिना विरोध के कार्यक्रमों में जाने लगे हैं। पहले तो कोई भी कार्यक्रम ऐसा नहीं होता था जहां उनका विरोध न हो। माना जा रहा था कि रिकॉर्ड वोटों से दिल्ली में आप की सरकार बनने के साथ ही लोगों की उम्मीदें आसमान पर पहुंच गई थीं। इसी के चलते कुछ ही दिनों में लोगों का धैर्य जवाब देने लगा और वे केजरीवाल के कार्यक्रमों का विरोध करने लगे। पंजाब समेत दिल्ली नगर निगम चुनावों की हार के बाद पार्टी में ही भारी बगावत हो गई। केजरीवाल के बेहद करीबी कपिल मिश्र ही बगावत करके उनके खिलाफ लगातार अभियान चला रहे हैं। इन सब का नतीजा यह रहा कि लोगों ने केजरीवाल को गंभीरता से लेना बंद कर दिया। अब वे आसानी से दिल्ली के किसी भी कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं और कहीं से उनके विरोध की कोई खबर नहीं आ रही है।

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चिट्ठी वाले अफसर
दिल्ली के मुख्य सचिव एमएम कुट्टी की छवि ईमानदार अधिकारी से अधिक नियम-कानून का सख्ती से पालन करने वाले अधिकारी की रही है। लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार में उनकी छवि चिट्ठी लिखने वाले अधिकारी की बन गई है। पार्टी में बगावत और कई चुनाव हारने के साथ-साथ हाई कोर्ट से प्रतिकूल फैसला आने के बाद कोई भी अधिकारी दिल्ली सरकार की एक नहीं सुन रहा है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया शुरू से ही अफसरों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने के लिए चर्चित रहे हैं। वे इसमें अब भी कोई बदलाव करने को तैयार नहीं हैं, इसलिए अफसर भी उनकी नहीं सुन रहे हैं। ऐसे में केजरीवाल और सिसोदिया मुख्य सचिव को अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखते हैं। मुख्य सचिव भी उस चिट्ठी पर अगली चिट्ठी लिख कर आगे सरका देते हैं और अपना काम पूरा कर देते हैं। यह सिलसिला काफी समय से जारी है।

संबंधों का फायदा
निगम अधिकारियों को नए और पुराने पार्षदों की पहचान करने में बहुत मुश्किल हो रही है। पुराने लोगों से संबंध अच्छे बने हैं तो उनकी बात काटने में परेशानी हो रही है और वहीं नए पार्षदों को निगम अधिकारों की समझ ही नहीं है सो वे बिना वजह अधिकारियों पर रौब दिखा रहे हैं। निगम के एक उपायुक्त स्तर के अधिकारी ने बताया कि दरअसल दिल्ली का संघीय ढांचा कुछ इस तरह से बना हुआ है कि कई चुने हुए प्रतिनिधि और अधिकारियों को यह समझ में ही नहीं आता। इसका फायदा पुराने पार्षद उठा रहे हैं और संबंधों की दुहाई देकर अपना काम निकलवा रहे हैं। वहीं नए पार्षद धौंस दिखा-दिखाकर ही खुश हुए जा रहे हैं।

तारीख पर तारीख
दिल्ली विश्वविद्यालय का यह दाखिला सत्र बदलाव का सत्र भी रहा। हालांकि यह बदलाव व्यवस्था में नहीं बल्कि ‘तय तारीखों’ में हुआ। एक के बाद एक, कई मौके आए जब डीयू ने अपनी तय तारीखें बदल डालीं। चाहे वह मेरिट वाले दाखिले की अंतिम तारीख हो, टेस्ट वाले दाखिले की शुरुआत हो, या पीजी-पीएचडी आवेदन की शुरुआत की तारीख हो, सब में बदलाव हुए। यहां तक कि कटआॅफ की तय तारीख भी चार दिन आगे बढ़ी। किसी ने ठीक ही कहा- डीयू का यह सत्र तो बदलाव को ही समर्पित रहा।
-बेदिल

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