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दिल्ली मेरी दिल्ली- दो साल बाद निगम चुनाव में हाशिए पर पहुंची आप

इस चुनाव में भले ही कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल का हुआ।

Author May 1, 2017 3:00 AM
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

आदर्शों की अनदेखी

राजनीति को जानने-समझने वाले किसी भी इंसान ने कभी नहीं सोचा होगा कि कुछ साल पहले वजूद में आई एक पार्टी विधानसभा चुनाव में 70 में 67 सीटें जीत लेगी और वही पार्टी उसके दो साल बाद निगम चुनाव में हाशिए पर पहुंच जाएगी। दिल्ली के मतदाताओं के इस फैसले पर काफी बहस हो रही है और उस बहस में सबसे बड़ी बात यह सामने आई कि इस चुनाव में भले ही कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल का हुआ। चुनाव नतीजों के फौरन बाद गुटबाजी में घिरी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने इस्तीफा दे दिया। इसके कारण केजरीवाल पर भी इस्तीफे का दबाव बढ़ने लगा। इस मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने के लिए केजरीवाल के संगी-साथियों ने दनादन इस्तीफे की पेशकश कर दी। अजूबा यह है कि उसमें वे नेता भी शामिल हैं जिन्होंने महीने भर पहले पंजाब में हुई हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए दिल्ली निगम चुनाव के बाद इस्तीफा दे दिया, लेकिन राजनीति में ऊंचे आदर्श स्थापित करने का दावा करने वाले केजरीवाल ने इस्तीफे की पेशकश तक नहीं कि जबकि अन्य चुनावों की तरह निगम चुनाव भी आप ने केजरीवाल के नाम पर ही लड़ा था।
कामयाबी का श्रेय
दिल्ली नगर निगम चुनाव भाजपा भारी बहुमत से जीत गई, लेकिन उसके वोटों के औसत में पिछले निगम चुनाव के मुकाबले बढ़ोतरी होने के बजाए कमी आई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस और आप को करीब 48 फीसद वोट मिले। नतीजों की विस्तार से जानकारी मिलने से पहले ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी को दिल्ली का अगला मुख्यमंत्री घोषित कर दिया गया। यह पूरी तरह से प्रचारित कर दिया गया कि इस बार भाजपा को पूर्वी वोट बड़ी तादाद में मिले। हालांकि किस जाति ने किस दल को वोट दिया है यह पता करना कठिन है, लेकिन आम धारणा है कि भाजपा को अपने परंपरागत मतदाताओं के अलावा किसी दूसरे वर्ग के ज्यादा वोट नहीं मिले। शायह यही कारण है कि चुनाव नतीजों के दिन जिस तरह का वातावरण भाजपा के कुछ नेताओं ने बना दिया था, वह शाम होते-होते ही बदलने लगा। यह जरूर है कि निगम चुनाव से ठीक पहले बिहार के भोजपुरी कलाकार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाने से आप के पक्ष में पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि) के मतदाताओं का वैसा ध्रुवीकरण नहीं हो पाया जैसा पिछले दो विधानसभा चुनावों में हुआ था और इसका श्रेय तो मनोज तिवारी को मिलना ही चाहिए।
सन्नाटे में सरकार
दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर आप और कांग्रेस के दफ्तरों में नेताओं की आवाजाही निगम चुनाव के नतीजों के बाद कम हो गई है। दिल्ली सरकार के मुख्यालय दिल्ली सचिवालय में एक हफ्ते से सन्नाटा पसरा है। वैसे तो केजरीवाल सरकार के आने के बाद यहां पत्रकारों का प्रवेश तीन बजे के बाद ही हो पाता है, लेकिन बीते बुधवार को निगम चुनाव के नतीजे आने के बाद से सचिवालय में पत्रकारों का जमावड़ा कम होने लगा है। काफी समय बाद सचिवालय के बाहर सन्नाटे जैसा आलम दिख रहा है। आप के नेता तो पहले भी मीडिया में अपने ही खास लोगों से बात करते थे, लेकिन निगम चुनाव के बाद तो वे मीडिया से ऐसे बचते दिख रहे हैं जैसे उधार लेने वाले साहूकार से बचते हैं। सचिवालय में आप के छुटभैये नेता व कार्यकर्ता तो दिख रहे हैं, लेकिन जब बड़े नेताओं की ही हालत खराब हो तो आम कार्यकर्ताओं की क्या बिसात है।
अनहोनी का अंदाजा
कहते हैं सच्चे लोगों अनहोनी का अंदाजा लग जाता है। यह बात बीते निगम चुनाव में मतदान के दिन भी दिखी। दरअसल शाम तक मतदान केंद्रों पर डटे रहने वाले आप कार्यकर्ता कई केंद्रों से दोपहर में ही गायब हो लिए। इसे लेकर गोविंदपुरी इलाके में कई लोगों ने सवाल भी उठाए, लेकिन जवाब नहीं मिला। असली जवाब तो चुनाव के नतीजों ने दिया, जब यहां से आप का सूपड़ा साफ हो गया। किसी ने ठीक ही कहा कि वो सच्चे टोपीधर थे, तभी तो उन्होंने अनहोनी भांप ली और बोरिया-बिस्तर समेटने में ही भलाई समझी।
-बेदिल

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