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दिल्ली मेरी दिल्ली: बदल गए सुर

दिल्ली के पास न तो अपना पानी है और न ही बिजली है जाहिर है यहां की समस्याओं के लिए भी दिल्ली अकेले जिम्मेदार नहीं है इसलिए उसके समाधान के लिए केंद्र सरकार व पड़ोसी राज्यों को मिलजुल कर कोशिश करनी चाहिए।

Author November 20, 2017 4:31 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

घटता दबदबा
भाजपा के पुराने संगठन जनसंघ की स्थापना 1952 में दिल्ली में हुई थी और भाजपा के बनने के बाद भी दिल्ली भाजपा के नेता देश की राजनीति करते थे। सही मायने में दिल्ली को जनसंघ और भाजपा का गढ़ माना जाता था। समय बदला और दिल्ली भाजपा के ज्यादातर दिग्गज नेता सक्रिय राजनीति से दूर होते गए। इससे दिल्ली का दबदबा घटा और दिल्ली भाजपा के नेताओं की भूमिका पार्टी के किसी आयोजन में भीड़ जुटाने से लेकर पार्टी के लिए पैसे जुटाने तक ही सीमित रह गई। इसी को देखते हुए भाजपा नेतृत्व ने दिल्ली में पार्टी के विस्तार के लिए इसकी कमान बिहार मूल के लोकप्रिय भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को सौंप दी। ऐसा हो भी रहा है लेकिन बड़ी बात तो यह है कि पार्टी के परंपरागत समर्थक बिरादरियों से ढंग के नेता आने बंद हो गए। पार्टी दिल्ली में तो सिमट कर रह गई है और उसे अब दिल्ली जीतने के लिए भी हर बार किसी मजबूत तीसरे दल की जरूरत पड़ने लगी है। कई विधानसभा चुनावों में ऐसा न होने के कारण ही पार्टी दिल्ली की सत्ता से सालों से बाहर है।

बदल गए सुर
आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपने में माहिर हैं। एक बार फिर उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है। प्रदूषण की मार झेल रही दिल्ली में लोगों का घरों से निकलना दूभर हो गया। मौसम विभाग का कहना है कि प्रदूषण का संकट अभी टला नहीं है। वहीं केजरीवाल अपने पुराने अंदाज में कभी किसी पड़ोसी राज्य पर तो कभी केंद्र सरकार पर प्रदूषण की जिम्मेदारी थोपने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली के पास न तो अपना पानी है और न ही बिजली है जाहिर है यहां की समस्याओं के लिए भी दिल्ली अकेले जिम्मेदार नहीं है इसलिए उसके समाधान के लिए केंद्र सरकार व पड़ोसी राज्यों को मिलजुल कर कोशिश करनी चाहिए, लेकिन पहल तो दिल्ली को ही करनी होगी, पर कोई ठोस कदम उठाने के बजाय केजरीवाल और उनकी सरकार आरोप-प्रत्यारोप में लगी है। हालांकि प्रदूषण को लेकर एनजीटी, दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार के बाद केजरीवाल के सुर बदले और अब वे सभी के साथ मिलकर समाधान निकालने की बात कर रहे हैं, लेकिन अभी भी वे पहल करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

गुलेल करेगी काम
दिल्ली पुलिस मुख्यालय में बंदरों का आतंक पुलिसवालों के लिए ऐसा सिरदर्द साबित हो रहा है कि अब उन्हें भगाने के लिए मुख्यालय के ऊपर गुलेल के साथ पुलिस को तैनात कर दिया गया है। इससे पहले मदारी और लंगूरों को भी बंदरों को भगाने के काम में लगाया जा चुका है, लेकिन सब बेअसर साबित हुआ। पीडब्लूडी के हाथ खड़ा करने के बाद पुलिस ने खुद ही इस काम को अपने हाथ में ले लिया है क्योंकि बंदरों ने मुख्यालय में तैनात कर्मचारियों को काटने का जो रिकॉर्ड बनाया है उसमें सबसे ज्यादा पुलिसवाले ही हैं। अब बंदरों को भगाने के लिए गुलेल कितनी कारगर होगी यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन दबी जुबान से कहा यह जा रहा है कि जिनके हाथों में बंदूक होनी चाहिए उनके हाथ में गुलेल शोभा नहीं देती।

मफलर की कमी
ठंड आते ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रिय मफलर का जिक्र न हो तो ठंड के आगमन पर शक होता है। रविवार को केजरीवाल अपने विधानसभा क्षेत्र में नई शर्ट और स्वेटर में नजर आए तो ट्विटर से लेकर सड़क की भीड़ तक उनके पहनावे की चर्चा में लगी रही। किसी ने लिखा कि मफलर नहीं दिख रहा तो किसी ने ट्वीट किया कि मफलर पहनकर ठंड शुरू होने की पुष्टि कीजिए। वहीं किसी ने तंज किया कि जितना खर्चा आपने नए कपड़ों पर किया, इतने में तो अलका जी की बहुत सी जरूरतें पूरी हो जातीं। एक अन्य यूजर ने लिखा कि वाह अरविंद बाबू नई शर्ट नया स्वेटर, सीबीआइ रेड पक्की है। केजरीवाल से मिलने वाले लोग भी मफलर सहित उनके पूरे पहनावे की चर्चा करते आए। वैसे लगता है कि पिछले साल की तरह इस साल मफलर निकालकर लोगों को ठंड से बचने की सलाह देकर जाड़े का आगाज करना केजरीवाल भूल गए हैं।

व्यवस्था में सेंध
प्रगति मैदान में चल रहे व्यापार मेले के आयोजकों ने घोषणा की थी कि मेले के टिकट प्रगति मैदान में नहीं मिलेंगे। इसके पीछे की वजह प्रगति मैदान के बाहर भीड़ का जमावड़ा रोकना था। ऐसे में कुछ लोगों ने इस आदेश में भी कमाई का जुगाड़ खोज लिया। प्रगति मैदान के गेट पर लैपटॉप लिए कुछ लोग ‘बुक माई शो’ के जरिए आॅनलाइन टिकट बेच रहे हैं। आगतुंकों को बुला-बुलाकर टिकट की व्यवस्था करने की बात कही जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि टिकट का पैसा नकद नहीं बल्कि कार्ड या पेटीएम से लिया जा रहा है। किसी ने ठीक ही कहा कि तकनीक के सहारे लोग व्यवस्था में सेंध लगाने से भी नहीं चूकते।

कचरे पर कलह
नोएडा में 41 साल बाद कचरा डालने की जगह तय करने में नाकाम प्राधिकरण ने अब इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी निवासियों पर डाल दी है। इसके तहत नोएडा ने ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2016 लागू कर दिया है। इस नियम के तहत ग्रुप हाउसिंग सोसायटी, मार्केट एसोसिएशन, स्कूल- कॉलेज और होटल-रेस्तरां आदि को कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। नियम का उल्लंघन करने पर सात साल की कैद और एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। नोएडा में आरडब्लूए के संगठन फोनरवा समेत सभी संगठनों ने इसे तुगलकी फरमान बताते हुए ठोस कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी प्राधिकरण की बताई है, जबकि प्राधिकरण भेजे जाने वाले नोटिस के प्रारूप की तैयारी में जुटा है।
-बेदिल

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