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दिल्ली मेरी दिल्ली- कलह का किस्सा

दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजे आए काफी दिन हो गए हैं और हर मुद्दे पर बोलने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चुप्पी साधे बैठे हैं।

Author Published on: May 8, 2017 3:41 AM
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजे आए काफी दिन हो गए हैं और हर मुद्दे पर बोलने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल चुप्पी साधे बैठे हैं। इसका एक कारण तो निगम चुनाव के बाद पार्टी में शुरू हुआ कलह है, लेकिन दूसरा कारण केजरीवाल का पार्टी और लोगों में घटता रुतबा है। कलह जिस तरह से शुरू हुई, उसे भी केजरीवाल संभाल नहीं पाए। जिस तरह के घटनाक्रम रोजाना हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि यह घमासान आसानी से खत्म होने वाला नहीं है। कुमार विश्वास पार्टी में बड़ा नाम हैं। उन्होंने कई नेताओं को विधानसभा और लोकसभा तक के टिकट दिलाए। उन पर एक विधायक की टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद बढ़ता ही जा रहा है। यह विवाद पार्टी और केजरीवाल को इसलिए भी परेशान करने वाला है क्योंकि वे चुनाव नतीजों के बाद इस हालत में नहीं रह गए हैं कि पहले की तरह बगावत करने वाले को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा पाएं। इसी के साथ दूसरा संकट उनकी साख घटने का है, वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ऐसा क्या करें जिससे वे पहले जैसी हैसियत में आ पाएं। शनिवार को विधायकों की बैठक और 9 मई को विधानसभा की बैठक भी इसी प्रयास का हिस्सा है, लेकिन लगता नहीं कि केजरीवाल पार्टी में पुराना वाला इकबाल कायम रख पाएंगें।

अफसरों को राहत

आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार को बने दो साल से अधिक हो गए हैं और पहली बार ऐसा हुआ है कि पिछले कई महीनों से कोई अफसर उसके निशाने पर नहीं है और न ही कोई अफसर ऐसा है जिसे अपने साथ बनाए रखने या बचाने के लिए आप के नेता जी-जान लगा रहे हों। एक तो मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव रहे राजेंद्र कुमार केजरीवाल के साथ रहने की कीमत भुगत रहे हैं, उससे कोई भी अफसर उनके साथ खुलकर आने से बच रहा है। दूसरा, केजरीवाल के लोगों को देरी से ही सही, समझ में आ गया है कि कोई अफसर किसी पार्टी का नहीं होता है। जो अधिकारी इनका प्रिय रहा वही कुछ दिन बाद राजनिवास जाकर उपराज्यपाल का प्रिय हो गया। लंबे समय तक उनके साथ रहने वाले अधिकारियों को भी सामान्य तरीके से बेहतर जगह पर नियुक्ति के लिए राजनिवास और केंद्रीय गृह मंत्रालय पर निर्भर रहना पड़ता है। इस बार तो मुख्य सचिव भी लंबे समय तक शीला दीक्षित के प्रमुख सचिव रहे एमएम कुट्टी बनाए गए हैं।

भाजपा की देन
दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी का राजनीतिक कद नगर निगम के चुनाव के बाद काफी बढ़ गया है। लगातार दस साल तक नगर निगमों पर काबिज रही भाजपा में नगर निगमों के बंटवारे के लिए कांग्रेस जैसे ही दो अलग-अलग धाराएं रहीं। शीला दीक्षित लगातार 15 साल मुख्यमंत्री रहीं, वे निगम के नेताओं से बार-बार टकराव होने के बाद निगम के बंटवारे पर आमादा रहीं। उनकी ही पार्टी की केंद्र सरकार निगम को दिल्ली सरकार के अधीन नहीं करा पाई तो उन्होंने भाजपा के नेताओं के साथ कमेटी बनाई। तब तो भाजपा ने साथ नहीं दिया, लेकिन सबसे पहले तो विजय कुमार मल्होत्रा की अगुआई वाली कमेटी ने ही निगम को पांच हिस्सों में बांटने की सिफारिश की थी। शायद देरी से राजनीति में आए मनोज तिवारी को पहले की बातों का पता नहीं है। दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने से लेकर निगम को दिल्ली सरकार के अधीन करवाने का अभियान तो भाजपा के ही कई नेताओं की देन माना जाता रहा है।

बसें हुर्इं बेबस
सरकार गई सरोकार गया! यह बात दिल्ली-नोएडा के बीच चलने वाली पीली बसों की मनमानी पर सटीक बैठती है। बीते दिनों यह चर्चा दिल्ली-नोएडा के बीच चलने वाली पीली बसों में खूब होती दिखी। दरअसल अधिकारियों की मिलीभगत से चालक-परिचालक ने इन बसों को माल ढुलाई वाला ट्रक बना दिया था। बीते दिनों कश्मीरी गेट से नोएडा की ओर जा रही पीली बस (यूपी-16, आइपी 9691) की आंखों देखी हालत ऐसी थी, मानो यात्री बस नहीं ट्रक पर सवार हों। बस में व्यापारियों का इतना सामान लादा गया था कि उसका केवल एक गेट ही खुल पा रहा था, जबकि यह यात्री बस है न कि माल ढोने वाला वाहन। बस की सीटों पर सामान और यात्री परेशान। सीटों के ऊपर-नीचे हर जगह सामान और चालक-परिचालक बेपरवाह। किसी ने ठीक ही कहा, यूपी में सरकार गई तो मानो सरोकार भी चला गया। यही वो बसें थीं जिन्हें मायावती ने चलाया और अखिलेश ने आगे बढ़ाया था, लेकिन अब यह राम भरोसे चल रही हैं।
-बेदिल

 

 

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