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आम आदमी पार्टी को अब टोपी का सहारा

पार्टी की ओर से अनौपचारिक फरमान जारी हुआ है कि दफ्तर में सभी के सिर पर टोपी दिखनी चाहिए। हालांकि, अभी भी कई कार्यकर्ता और नेतागण के सिर से टोपी गायब है।
Author July 13, 2017 12:46 pm
आम आदमी पार्टी की स्‍थापना से पहले कुमार विश्‍वास और अरि‍विंद केजरीवाल। (Source: Express Archive)

निज मन की व्यथा…

कहते हैं कि घर में बड़े-बूढ़े की जब सुनी नहीं जाती है तो चालाक लोग हर फैसले को अपना मान कर उसे खुले दिल से मानते हैं, जो कम समझ के होते हैं वे जबरन उस पर अपनी राय देते रहते हैं। और जो नासमझ होते हैं वे विपरीत हालात में भी अपनी राय मनवाने की कोशिश करते हैं। यह भी कहा जाता है कि निज अपमान को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की हालत तीसरे श्रेणी की हो गई है। जब से दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनी है, सरकार की अधिकारियों से लड़ाई चल ही रही है। शुरू में तो एक खेमा ऐसा था जो मानकर चल रहा था कि केजरीवाल ज्यादा ताकतवर होंगे, इसलिए उनके साथ था। वरिष्ठ अफसर राजेंद्र कुमार की गिरफ्तारी के बाद तो ज्यादातर अफसर दाएं-बाएं होने लगे। हाई कोर्ट के फैसले और कई चुनाव हारने के बाद तो अधिकारी उनकी सुनने से ही इनकार करने लगे। अक्लमंदी यही थी कि उनसे मिलकर कोई रास्ता निकालें, उसके बजाए वे अपने अपमान के किस्से के अधिकारी हमारी नहीं सुन रहे हैं, यह सुनाकर अपनी बची-खुची ताकत भी गंवाने के संकेत देने लगे हैं। इससे उनकी जगहंसाई ही तो हो रही है।


और बिगाड़ा काम
दिल्ली पर 15 साल राज करने वालीं शीला दीक्षित तो अब राजनीति को अलविदा कहने की हालत में आ गई हैं। लेकिन उनके बेटे संदीप दीक्षित का संकट है कि वे राजनीति में अपनी जगह ही नहीं बना पा रहे हैं। दिल्ली कांग्रेस की गतिविधियों में तो उनकी कोई पूछ ही नहीं है। अलबत्ता उल्टे-सीधे बयान देकर वे चर्चा में बने रहने की तरकीब जरूर खोजे हुए हैं। पहले भी उनके बयान चर्चा में रहे, लेकिन सेना प्रमुख को सड़क का गुंडा कहने के बाद तो ज्यादा ही चर्चा में आ गए। पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी तक को सफाई देनी पड़ी और उनकी मां शीला दीक्षित को उनके बयान के लिए माफी मांगनी पड़ी। दिल्ली कांग्रेस के नेता तो उनसे दूर हो ही चुके हैं। खतरा यह है कि कहीं पार्टी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न कर दे।

पराक्रम की परिक्रमा
राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए दिल्ली पुलिस ने पीसीआर वैन को अत्याधुनिक बनाते हुए ‘पराक्रम वैन’ को मुस्तैद किया है। ‘पराक्रम’ पर एनएसजी से प्रशिक्षित कमांडो तैनात किए गए हैं। अब कई जगह ‘पराक्रम’ को देखा जा रहा है और पीसीआर वैन नदारद है। दिल्ली के लोगों को पीसीआर में ही पराक्रम नजर आ रहा है। बेदिल को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास पीसीआर वैन की तलाश करते एक सज्जन मिले। वे ‘पराक्रम’ को पीसीआर समझकर कोई मामूली शिकायत करने पहुंचे थे। वहां बताया गया कि आप पीसीआर में शिकायत दर्ज कराएं। वे मायूस होकर झल्लाते सुने गए-क्या पीसीआर और क्या पराक्रम। इस तरह की व्यवस्था से पुलिस वाले खुद तो उलझते ही हैं आम आदमी को भी उलझने के लिए विवश कर रहे हैं।

नाम में बहुत कुछ रखा है
नामपट्ट को नहीं हटाना भी कभी-कभी मुश्किल में डाल देता है। दिल्ली नगर निगम का तीन भागों में बंटवारा क्या हुआ, अधिकारियों और पदाधिकारियों की फौज पैदा हो गई है। जिस गली में पैर रखें वहां निगम पार्षदों के अलावा कहीं मेयर, उपमेयर, स्थाई समिति के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और निगम की अन्य समितियों के अध्यक्ष और उपाध्यक्षों के वैनर-पोस्टर और नेमप्लेट से लोग भौचक्के हो जा रहे हैं। यहीं तक नहीं बल्कि अब तो पूर्व पार्षदों और निगम पदाधिकारियों के बोर्ड भी दिल्ली की सड़कों पर सैकड़ों की संख्या में दिखाई दे रहा है। बंटवारे से पहले पूर्वी दिल्ली के एक मेयर रहे सज्जन ने अभी तक अपना बोर्ड नहीं बदला है। वे एक बड़ी हाउसिंग सोसाइटी में रहते हैं। पेशे से डॉक्टर हैं और उनके बेटे-बहू भी डॉक्टर हैं। पिछले दिनों उन्हें मेयर समझ एक व्यक्ति सोसाइटी में पहुंच गए। गार्ड ने कहा कि दस साल हो गए, उनका मेयर पद से हटना। फिर शिकायत कहां और किस बिना पर ली जाएगी। इतना सुनते ही उस व्यक्ति को गुस्सा आ गया। बोला-भाई जब मेयर नहीं रहे, एक दशक हो गए तो फिर नेमप्लेट और बोर्ड को हटाने में कोई दिक्कत है क्या?

नियम बनाम अंधविश्वास
लोग ट्रैफिक सिग्नल पर भले न रुकें लेकिन बिल्ली रास्ता काट दे तो जरूर रुक जाते हैं। कुछ ऐसा ही माजरा दिखा पिछले दिनों कालकाजी की एक लाल बत्ती पर। दरअसल बत्ती हरी थी, लेकिन एक के पीछे कई गाड़ियां रुकी पड़ी थीं। इसे देख सबसे पीछे रुके बस चालक ने उन्हें हड़काया। पता चला कि कोई काली बिल्ली रास्ता काट गई। इसलिए आगे वाले महोदय ने गाड़ी खड़ी कर दी है। शुक्र रहा एक सज्जन का, जिन्होंने अपनी गाड़ी पीछे से आगे लाई और इस मिथक को दरकिनार करते हुए वे आगे निकले। हालांकि इसके बाद रास्ता खुल गया लेकिन बीच सड़क पर इस बाबत चर्चा भी शुरू हो गई। किसी ने चुटकी लेते हुए कहा, लाल बत्ती पर बड़ी गाड़ी वाले रुकते नहीं, काली बिल्ली से जरूर रुक जाते हैं! दूसरे ने बिन मांगे सलाह दे डाली, कहा, ट्रैफिक पुलिस को काली बिल्लियां रखनी चाहिए, तभी महंगी गाड़ियों वाले रईसजादे काबू में आएंगें! उन्हें न तो चालान की फिक्र होती है न वर्दी का डर, लेकिन शुभ-अशुभ की चिंता जरूर होती है।

टोपी का सहारा
पिछले कुछ दिनों से आम आदमी पार्टी के दफ्तर में ‘आम आदमी टोपी’ फिर से खास बन लगभग हर के ऊपर सिरमौर दिख रही है। पार्टी की प्रेसवार्ता के दौरान भी नेतागण अनिवार्य रूप से आम आदमी टोपी पहने दिख रहे हैं। पूछताछ करने पर पता चला कि पार्टी की ओर से अनौपचारिक फरमान जारी हुआ है कि दफ्तर में सभी के सिर पर टोपी दिखनी चाहिए। हालांकि, अभी भी कई कार्यकर्ता और नेतागण के सिर से टोपी गायब है। लेकिन, इतना जरूर है कि आंदोलन से निकली पार्टी के अंदर हाल में जनता से बनी दूरी को लेकर छटपटाहट है और इस दूरी को पाटने के लिए वह टोपी का भी सहारा लेने को तैयार हैं, चाहे वह तिनके का सहारा ही साबित क्यों न हो।
-बेदिल

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