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दिल्ली मेरी दिल्ली: दिल्ली की चिंता, पंजाब का गणित

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बंगलुरु में स्वास्थ्य लाभ लेकर 22 फरवरी को वापस आ रहे हैं।

Author February 20, 2017 01:59 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (PTI File Photo)

-बेदिल

दिल्ली की चिंता

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बंगलुरु में स्वास्थ्य लाभ लेकर 22 फरवरी को वापस आ रहे हैं। उन्होंने एक वीडियो क्लिप जारी कर यह जानकारी दी और कहा कि वापस आकर सब लोग काम पर लगेंगे। दिल्ली में भी काम करना है और पंजाब, गोवा में आप की सरकार बनेगी, वहां भी काम करना है। अब राजधानी वाले यह समझते रहें कि उनके मुख्यमंत्री दिल्ली वापस आ रहे हैं या आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक, जो अपना थोड़ा सा वक्त दिल्ली को भी देंगे। वैसे भी बंगलुरु में स्वास्थ्य लाभ ले रहे मुख्यमंत्री अपने ट्वीट्स में या तो प्रधानमंत्री मोदी को याद करते रहते हैं या फिर पंजाब के स्ट्रांग रूम में बंद ईवीएम मशीनों की चिंता करते दिखते हैं। मोदी और देश के राजनीतिक परिदृश्य की चिंताओं से थोड़ी फुर्सत मिले तो मुख्यमंत्री कभी-कभी अपनी जनता को भी याद कर ही लेते हैं।

वादे और दावे

केजरीवाल सरकार ने बीते 14 फरवरी को अपनी दूसरी सालगिरह मनाई। वहीं विपक्ष ने सरकार पर दिल्ली वालों को धोखा देने का आरोप लगाकर दावा किया कि आम आदमी पार्टी (आप) ने अपने चुनावी वादे पूरे नहीं किए। हालांकि आप और केजरीवाल का दावा है कि ऐसी काबिल सरकार देश भर में कहीं नहीं है। यह अलग बात है कि सरकार के दो साल के समारोह के मौके पर मुख्यमंत्री अपने इलाज के लिए बंगलुरु में थे। विपक्ष के नेताओं का आरोप है कि वे पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव प्रचार की थकान उतारने गए हैं। विपक्ष भले ही सरकार पर आरोप लगाए, लेकिन सरकार ने भी कुछ चुनिंदा अखबारों में विज्ञापन देकर भरपूर काम करने का दावा किया है, लेकिन जो काम इसमें बताए गए उनमें ज्यादातर ऐसे नहीं थे जो उनके चुनावी घोषणा पत्र के 70 सूत्री एजंडे में थे। इसके अलावा बाकी का काम पूरा न कर पाने का ठीकरा हमेशा की तरह केंद्र सरकार पर फोड़ दिया गया।

पंजाब का गणित

देश के 4 राज्यों के साथ 11 मार्च को पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे भी आने वाले होने हैं। देश की राजनीति के लिए इन पांच राज्यों में सबसे ज्यादा अहमियत उत्तर प्रदेश चुनाव की है, लेकिन दिल्ली की राजनीति के लिए सबसे ज्यादा महत्त्व पंजाब का है। इसका एक कारण तो यह है कि पंजाब के मतदाताओं का गणित भी दिल्ली के जैसा ही है। दूसरा, जितनी तैयारी से आप ने वहां चुनाव लड़ा, वैसी ही तैयारी उसने दिल्ली में भी की थी। पहले माना जा रहा था कि पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली में कई विधानसभा सीटों के उपचुनाव हो सकते हैं और संभावना थी कि इसका असर पंजाब में हो सकता है। हालांकि अब पंजाब चुनाव के नतीजे आने के बाद दिल्ली के तीनों नगर निगमों के चुनाव होने हैं। पंजाब में जिस पार्टी की जीत होगी, उसके लिए दिल्ली के नगर निगम चुनाव आसान खासे आसान हो जाएंगे।

आंकड़ों की बाजीगरी

आंकड़े कंप्यूटर से बनाए जाते हैं जबकि वारदात सड़क पर होती है। बीते साल की सालाना रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस ने आकंड़ों की बाजीगरी दिखा यह साबित करने की कोशिश की कि दिल्ली में साल-दर-साल आपराधिक वारदातों में कमी आ रही है। हालांकि पुलिस के डाटा को गौर से देखा जाए तो पता चलेगा कि कई गंभीर आपराधिक वारदात बढ़ रही हैं और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है। बेदिल ने जब पुलिस अधिकारी से इस बाबत पूछा तो वे भी यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वारदातें बढ़ीं या घटीं। मतलब उनका लब्बोलुआब था यह था कि इसका फैसला तो मीडिया ही कर देगी।

जीत की खातिर

दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनावों को लेकर राजधानी के सिखों में गरमा-गरमी का माहौल है। उम्मीदवार अपने समर्थकों के साथ लंबी-लंबी गाड़ियों में भरकर मतदाताओं के घर जा रहे हैं। मतदाताओं को अपने पाले में करने का खेल भी शुरू हो गया है। आम चुनावों की तरह पार्टियों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। महंगे होटलों में चुन-चुन कर मतदाताओं की दिल खोलकर सेवा की जा रही है। सार्वजनिक तौर पर प्रचार में ज्यादातर उम्मीदवार यह कहते देखे जा सकते हैं कि वे यह सब सिखों को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं और उन्हीं के लिए चुनाव में खड़े हैं। हालांकि चुनाव जीतने के बाद वे अपनी कौम का कितना भला करेंगे, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन उम्मीदवारों की ओर से चुनाव जीतने के लिए मोटी रकम खर्च करना, यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि जीत के बाद कहीं वे लोगों से किए वादे भूल तो नहीं जाएंगे।

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