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दिल्ली मेरी दिल्ली- हमदर्दी की चाहत

दिल्ली में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी (आप) अपनों का ही भारी विरोध झेलने के बाद बचाव का रास्ता तलाशने में जुटी है।

Author July 3, 2017 2:13 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

हमदर्दी की चाहत

दिल्ली में प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी (आप) अपनों का ही भारी विरोध झेलने के बाद बचाव का रास्ता तलाशने में जुटी है। पहले जिन प्रवासियों के एकतरफा वोट से उसे रिकार्ड जीत मिली, पार्टी अब उनके बजाय खुद को दिल्लीवालों की पार्टी दिखाने में लग गई है। यह जानते हुए भी कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में आरक्षण लागू करना दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, विधानसभा में दिल्ली सरकार से 95 फीसद अनुदान पाने वाले 28 कॉलेजों में दिल्ली के छात्रों के लिए 85 फीसद आरक्षण करने का प्रस्ताव पास करा दिया। आप को पता है कि ऐसा आरक्षण मुमकिन नहीं है, लेकिन दिल्लीवालों की हमदर्दी बटोरने के लिए उसने जबरन यह फर्जी घोषणा कर दी। वैसे इसमें खतरा यह है कि कहीं नए वोटरों को अपने पक्ष में करने के चक्कर में पुराने वाले ही साथ न छोड़ दें। वैसे 2015 के विधानसभा चुनाव में साथ देने वालों का बड़ा वर्ग तो काफी समय पहले ही उनका साथ छोड़ने का संकेत दे चुका है, वरना वे बाद के सभी चुनाव कैसे हारते।

सरकार की मनमानी
केजरीवाल सरकार ने तय कर लिया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह न तो नियमों से चलेगी और न परंपराओं से। तभी तो वह जब चाहे तब अपनी पार्टी की तरह विधानसभा की बैठक बुला लेती है। नियमों के हिसाब से विधानसभा की बैठक उपराज्यपाल सरकार के अनुरोध पर बुलाते हैं और बैठक खत्म होने पर दिल्ली मंत्रिपरिषद के सुझाव पर सत्रावसान करते हैं, लेकिन आप सरकार ने साल के शुरू में बुलाए गए सत्र का सत्रावसान नहीं कराया और जब मन किया बैठक बुला ली। बैठक के विषय के बारे में भी न तो कार्य मंत्रणा समिति से चर्चा की जाती है और न ही सदस्यों को पहले से उसकी सूचना दी जाती है। इससे विधानसभा के बैठक की गंभीरता खत्म सी होती जा रही है। पहले विधानसभा की बैठक तय समय से बुलाई जाती थी और दिल्ली मंत्रिमंडल की बैठक भी हफ्ते में एक बार तय समय पर होती थी। विशेष परिस्थिति में ही बीच में मंत्रिपरिषद की बैठक होती थी, लेकिन अब तो जब मन हुआ मंत्रिमंडल की बैठक बुला ली गई। शायद यह भी एक कारण है कि दिल्ली के आला अधिकारी इस सरकार को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।

तबादले का प्रचार
पु लिस के आला अधिकारियों का तबादला गृह मंत्रालय की ओर से होता है, लेकिन इसका पता पुलिस मुख्यालय से ही चल जाता है। बीते एक साल में जितने भी तबादले हुए उसकी सूचना पुलिस मुख्यालय से बिना किसी मशक्कत के मिल गई। बेदिल ने जब इसकी तहकीकात की तो पता चला कि गृह मंत्रालय से आदेश निकलने के बाद पुलिस मुख्यालय में जिनके पास पहले सूचना आती है वही अधिकारी वाहवाही बटोरने में इसे प्रचारित कर देते हैं। उन्हें पता होता है कि आदेश उनके लिए नहीं बल्कि दूसरे पुलिस अधिकारियों के लिए है तो क्यों न इसे सार्वजनिक कर दिया जाए?

सुराग की दरकार
सीबीआइ आजकल दिल्ली पुलिस के नक्शेकदम पर चलने लगी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से गायब छात्र नजीब के मामले में अब तक तो कमोबेश ऐसा ही लगता है। बीते दिनों सीबीआइ ने गायब छात्र का सुराग देने वाले को इनाम देने की घोषणा क्या की, विश्वविद्यालय में दबी जुबान यह चर्चा शुरू हो गई। दरअसल दिल्ली पुलिस दो बार नजीब का सुराग देने वालों को इनाम देने की घोषणा कर चुकी है। पहले एक लाख फिर पांच लाख, लेकिन पैसे से नहीं मिला ‘नजीब’। इसके बाद यह मामला सीबीआइ को सौंप दिया गया। बीते कुछ हफ्तों में सीबीआइ कई बार जेएनयू की खाक छान चुकी है। सबको आशा थी कि जल्द कोई अच्छी खबर आएगी, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। थक-हार कर सीबीआइ ने नजीब का सुराग देने वाले को 10 लाख का इनाम देने की घोषणा कर डाली, ताकि इसी तरह उसका कोई सुराग मिल जाए।

तालमेल की कमी
दिल्ली पुलिस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि जिले के उपायुक्तों और आला पुलिस अधिकारियों में तालमेल का अभाव है। किसी भी घटना के बाद संयुक्त आयुक्त सूचना देने के लिए उपलब्ध होते हैं, लेकिन जिले के उपायुक्त कन्नी काटते रहते हैं। ताजा मामले में उपायुक्त के बदले संयुक्त आयुक्त तब सूचना देने सामने आए जब इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में प्रधानमंत्री के एक कार्यक्रम में भगदड़ और हंगामे की सूचना फैली। इसी की सूचना पाने वालों ने जब फोन की घंटी बजानी शुरू की, तो उपायुक्त न तो दिल्ली पुलिस के व्हाट्सऐप पर सामने आए और न ही फोन उठाया। देर रात जब आला अधिकारियों को इसकी भनक लगी तो उन्हें लगा कि अब मामला गंभीर हो गया है, लिहाजा इसकी पुख्ता सूचना देने में ही भलाई है। तब जाकर जोन के संयुक्त आयुक्त ने पूरी घटना सिलसिलेवार बताई और भगदड़ व हंगामे जैसी अफवाहों पर विराम लगाया। इसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दिल्ली पुलिस में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा, वरना ऐसी नौबत ही क्यों आती।
-बेदिल

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