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दिल्ली मेरी दिल्ली- केजरीवाल के सपने

तीन साल पहले प्रचंड बहुमत से दिल्ली की सत्ता में आई आप का दिल्ली के बाहर का अब तक प्रयोग बहुत सफल नहीं रहा।

Author December 18, 2017 3:32 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो, सोर्स- AP)

केजरीवाल के सपने
तीन साल पहले प्रचंड बहुमत से दिल्ली की सत्ता में आई आप का दिल्ली के बाहर का अब तक प्रयोग बहुत सफल नहीं रहा। इसके बावजूद पार्टी के नेता हार मानने को तैयार नहीं हैं। गुजरात चुनाव की तो उन्होंने ऐसे तैयारी की जैसे वे सत्ता के दावेदार हों, लेकिन बाद में पार्टी ने चुनाव से खुद को अलग कर लिया और केवल सांकेतिक चुनाव लड़ा। इससे पहले भी आप ने पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी। पंजाब में भले ही सत्ता नहीं मिली लेकिन पार्टी मुख्य विपक्षी दल बन गई। वहीं गोवा में पार्टी का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा। अब आप ने राजस्थान समेत अगले साल होने वाले कई राज्यों के चुनाव लड़ने की घोषणा की है। और तो और सूदूर ओडिशा में भी जगह-जगह आप के पोस्टर लगे दिखे। बताया गया कि पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल उन सभी राज्यों में पूरी ताकत से चुनाव लड़ने वाले हैं जहां चुनाव होने वाले हैं जबकि पहले उनका कहना था कि पार्टी वहीं चुनाव लड़ेगी जहां उसे नब्बे फीसद सीटें मिलने की उम्मीद हो। पंजाब में चुनाव न जीत पाने और दिल्ली नगर निगमों का चुनाव हारने के बाद तो अब शायद ही किसी राज्य में ऐसा हो। अब तो दिल्ली में भी पार्टी का राजनीतिक ग्राफ लगातार गिरता ही जा रहा है।

नेताजी का चढ़ा पारा
दिल्ली के एक मजबूत राजनीतिक दल के मुखिया प्रेस कांफ्रेंस करने बैठे थे। उनके दोनों ओर सलाहकारों की फौज तैनात थी। चुन-चुन कर मुख्यमंत्री पर हमले जारी थे। दिल्ली सरकार की बखिया उधेड़ी जा रही थी। नेताजी पूरी लय में थे, लेकिन दिक्कत यह थी कि कभी उनकी बार्इं ओर बैठे सलाहकार उन्हें कागज पर लिखकर कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु सुझा रहे थे तो कभी दार्इं ओर बैठे सलाहकार उचक-उचक कर नेताजी के कान में मुंह डालकर कुछ फुसफुसा रहे थे। अब हो यह रहा था कि नेताजी बोलना कुछ चाह रहे थे जबकि इनपुट उन्हें कुछ और ही मिल रहा था। जाहिर तौर पर उन्हें नए सिरे से अपनी बात रखनी पड़ी। मीडियाकर्मी भी बड़े कौतूहल से इस विहंगम नजारे का आनंद ले रहे थे। दोनों से जारी सलाह की इस ताबड़तोड़ डोज से आखिरकार नेताजी का धैर्य जवाब दे गया। उनकी पेशानी पर बल पड़ गए। उन्होंने एक बार त्योरियां चढ़ार्इं और पलटकर सलाहकारों की ओर हमलावर नजर से देखा। नेताजी का पारा चढ़ता देख सलाहकारों पर चढ़ा बौद्धिकता का पारा झट से नीचे आ गया और वे सरक लिए। उसके बाद नेताजी ने अपनी खास अदा में पूरी बात कह डाली।

राजनीति के प्रयोग
दिल्ली देश की राजधानी तो है ही, राजनीति की प्रयोगशाला भी है। दिल्ली ने अलग-अलग मिजाज के नेता देखे हैं। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी की ख्याति तो भोजपुरी गायक और अभिनेता के रूप में है। राजनीति में आने के बाद उन्होंने अभिनय और गायकी छोड़ दी, लेकिन महीने भर दिल्ली में क्रिकेट प्रतियोगिता करवाने में कौन सी राजनीति हो रही है, यह मनोज तिवारी के सलाहकारों की ही समझ में नहीं आ रहा है। अब तक कोई राजनीतिक दल गाहे-बगाहे क्रिकेट या कोई खेल प्रतियोगिता करवाता था तो समझ में भी आता था, लेकिन राजनीति के दांव-पेच छोड़ कर महीने भर क्रिकेट में जुटना अजीब है, वह भी तब जब देश की राजनीति नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी हो गई हो और दिल्ली आम आदमी पार्टी (आप) के कब्जे से मुक्त होती नहीं दिख रही हो। आप के लंबे शासन से कांग्रेस के वजूद पर तो सवाल उठ ही रहा है, साथ ही भाजपा से भी दिल्ली की सत्ता दूर होती जा रही है।
आदेश की आड़ में  बीते पांच साल से 16 दिसंबर को जहां जंतर-मंतर पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी, वहीं इस बार निर्भया कांड की बरसी पर यहां सन्नाटा पसरा रहा। जी हां, ‘निर्भया’ की इंसाफ की लड़ाई का गवाह बना जंतर-मंतर इस 16 दिसंबर को वीरान नजर आया। हद तो तब हो गई जब आंदोलन की जगह दिल्ली वालों ने सिर्फ बयानबाजी कर बरसी की रस्मअदायगी कर दी। शुक्र है टीवी चैनलों का जिन्होंने मुद्दे को (खबरों के अभाव में ही सही) जिंदा रखा। जंतर-मंतर पर खडेÞ रेहड़ी-पटरी वालों की प्रतिक्रिया इस बाबत सटीक दिखी। उन्होंने कहा कि एनजीटी के आदेश की आड़ में कुछ अधिकारियों की मनमानी भी कम जिम्मेदार नहीं है। तभी तो यहां बने निर्भया स्मृति चौक के पास से र्इंट व फोटो तक उठा ले गए एनडीएमसी के कमेटी वाले।

उपदेश भरे ट्वीट
कभी ट्विटर के जरिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर हमला बोलने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल आजकल कुछ खामोश से हैं और माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर किए गए उनके ट्वीट्स और रीट्वीट्स में उपदेश और दर्शन की झलक ज्यादा मिलती है। एक ऐसे ही रीट्वीट में केजरीवाल उपदेश देते नजर आ रहे हैं कि जीवन में कुछ बनने से पहले अच्छा इंसान बनो। वहीं लियो टॉल्सटॉय नाम से एक अकाउंट के ट्वीट को उन्होंने रीट्वीट किया जिसमें संदेश था कि अगर आप किसी व्यक्ति से बात कर रहे हैं और उसकी आंखों में सीधे झांकें तो आप महसूस करेंगे कि वह आपसे जुड़ा हुआ है और आप उसे लंबे अरसे से जानते हैं। रविवार सुबह के ट्वीट में सुप्रभात कहने के साथ केजरीवाल यह कहना नहीं भूले कि जिंदा होने की खुशी है। इस साल कई चुनावों में शिकस्त खाने वाली पार्टी के मुखिया के ये ट्वीट्स खुद को उत्साहित बनाए रखने के लिए हैं या दूसरों को नसीहत देने के लिए, यह कहना मुश्किल है, लेकिन देर आए दुरुस्त आए की कहावत उन पर चरितार्थ जरूर हो रही है।

आंकड़ों का खेल
दिल्ली पुलिस में आंकड़ों का खेल हमेशा ही चलता रहता है और अधिकारी भी इसी होड़ में लगे रहते हैं कि वो किस तरह इसमें अव्वल आ जाएं। लेकिन कभी-कभी वे खुद इन आंकड़ों के मकड़जाल में फंस जाते हैं। बीते दिनों बेदिल को ट्रैफिक पुलिस का ऐसा ही एक आंकड़ा मिला। पुलिस ने भी इसे बढ़-चढ़कर पेश करने का बीड़ा उठाया। कई दिन तक लगातार मिले इस आंकड़े की जब बेदिल ने तहकीकात की तो कहीं से भी यह पता नहीं चल पाया कि यह आंकड़ा एक दिन का है, एक हफ्ते का है या एक महीने का। अनधिकृत रूप से सड़कों पर गाड़ियां खड़ी करने के खिलाफ चलाए गए इस अभियान में ट्रैफिक पुलिस के अलावा कई सिविक एजंसियां भी शामिल हुर्इं। पुलिस मुख्यालय में इसी तरह के आंकड़ों की बाजीगरी पेश करने वाले संबंधित विभाग से जब पूछा गया तो पता चला कि वे अभी आंकड़े जमा करने में मशगूल हैं। बेदिल ने यूं ही पूछ लिया कि संयुक्त आयुक्त, उपायुक्त, सहायक पुलिस आयुक्त व इंस्पेक्टरों को बताए बिना और आंकड़ों को पुख्ता किए बिना पेश करने के पीछे आखिर क्या मकसद हो सकता है तो संबंधित विभाग के कर्मचारी बगलें झांकने लगे।

ट्विटर से एतराज
राजधानी के एक विश्वविद्यालय के कुलपति इन दिनों ट्विटर पर खूब सक्रिय रहते हैं, लेकिन जब उनके छात्र विश्वविद्यालय की किसी समस्या के बारे में ट्विटर पर लिखते हैं तो विश्वविद्यालय की ओर से छात्रों को नोटिस थमा दिया जाता है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि देश के प्रधानमंत्री से लेकर हर कोई जब आज के युग में ट्विटर का इस्तेमाल कर रहा है तो ऐसे में इस विश्वविद्यालय को ट्विटर के इस्तेमाल पर एतराज क्यों है। हालांकि छात्र भी मानने को तैयार नहीं है। उन्होंने भी कुलपति के खिलाफ ट्विटर पर ही जंग छेड़ दी है।

तंदूर बनाम अलाव
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ रहे वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए एक हफ्ते भर पहले जिला प्रशासन ने नोएडा के सभी तंदूर और कोयले से चलने वाली भट्ठियों पर रोक लगाने को कहा था। वहीं कड़कड़ाती ठंड के बीच रविवार को सूचना विभाग ने शहर की 40 जगहों पर अलाव जलाने की सूचना भी जारी कर दी। दो विरोधाभासी फरमानों के बीच आम जनता उचित या अनुचित की पहचान करने के फेर में फंस गई है। यही नहीं, प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अधिकारियों पर वायु प्रदूषण को लेकर तुगलकी तरीके से जुर्माना लगाए जाने के आरोप भी लगे हैं। लेकिन जुर्माना गलत तरह से लगाया गया है, इसकी सुनवाई कराने का लोगों के पास कोई मंच नहीं है। वहीं कोयले की भट्ठी और तंदूर से निकलने वाले धुएं को प्रदूषणकारी मानते हुए बंद कराने वाले अधिकारी इस बात का जवाब देने को तैयार नहीं हैं कि ठंड से बचाव के लिए 40 जगहों पर लकड़ी का अलाव जलाने से क्या वायु प्रदूषण नहीं फैलेगा?
-बेदिल

 

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