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दिल्ली में वृक्षों के काटे जाने पर हाई कोर्ट सख़्त, कहा- पेड़ अगर मतदाता होते तो नहीं काटे जाते

कोर्ट वायु प्रदूषण और इसके कारणों पर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसका एक कारण दिल्ली और आसपास के इलाकों में वन और हरित क्षेत्र में आई कमी है।

Author नई दिल्ली | March 6, 2017 10:26 PM
Delhi High Court Trees, Delhi Forest Area, Delhi Trees, Trees cut Delhiदिल्ली उच्च न्यायालय (फाइल फोटो)

पेड़ अगर मतदाता होते तो वे नहीं काटे जाते। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार (6 मार्च) को यह टिप्पणी करते हुये सुझाव दिया कि राष्ट्रीय राजधानी में अतिक्रमण करने वालों या विभिन्न परियोजनाओं के अधिकार देने से वृक्षों के काटे जाने का कैग से ऑडिट कराया जाए। न्यायमूर्ति बदर दुरेज अहमद और न्यायामूर्ति आशुतोष कुमार की पीठ ने कहा, ‘अगर वृक्षों को मतदाता सूची में वोटर के तौर पर शामिल कर लिया जाए तो उन्हें नहीं काटा जाएगा।’ उन्हें बताया गया कि दिल्ली मेट्रो जैसी परियोजनाओं के लिए स्थानीय अधिकारी बड़ी संख्या में पेड़ काट रहे हैं या असोला अभयारण्य जैसे स्थानों पर अतिक्रमणकारी काट रहे हैं।

अदालत वायु प्रदूषण और इसके कारणों पर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसका एक कारण दिल्ली और आसपास के इलाकों में वन और हरित क्षेत्र में आई कमी है। पीठ का यह भी मानना था कि दिल्ली में काटे गए पेड़ों की संख्या और उससे मिली लकड़ी के उपायोग के बारे में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा ऑडिट कराया जाना चाहिए। पीठ ने कहा, ‘यह तो आमदनी है जिसका लेखा जोखा रखना होगा इसलिए कैग से ऑडिट कराने की आवश्यकता है।’ अदालत ने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार असोला-भाटी अभयारण्य में अतिक्रमण का पता करने और उन्हें हटाने के लिए पहले तय समय सीमा का पालन नहीं कर सकी।

इस मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश वासदेव ने कहा कि सरकार की तरफ से कार्रवाई नहीं होने से वन क्षेत्र में कमी आई है। उनके तर्कों का दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में वन क्षेत्र कम नहीं हुए हैं और दावा किया कि महानगर में हरित क्षेत्र में वृद्धि हुई है। संक्षिप्त सुनवाई के बाद पीठ ने मामले पर अगली सुनवाई की तारीख नौ मार्च तय की।

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