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दिल्ली: पूर्व कानून मंत्री तोमर की डिग्री रद्द करने की प्रक्रिया शुरू

तोमर मामले में विश्वविद्यालय ने प्रतिकुलपति की अध्यक्षता में जांच समिति बनाई थी।
Author दिल्ली | September 22, 2016 03:26 am
दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर ।

दिल्ली के विधायक और पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की कथित एलएलबी की डिग्री रद्द करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बुधवार को भागलपुर विश्वविद्यालय के परीक्षा बोर्ड की तीन घंटे चली बैठक में सर्वसम्मति से यह तय हुआ। साथ ही तोमर मामले में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट भी मंजूर कर ली गई । परीक्षा समिति की बैठक की अध्यक्षता कुलपति डा. रमाशंकर दुबे ने की। बैठक के बाद कुलपति ने बताया कि तोमर की कानून की डिग्री रद्द करने के लिए अनुशासन समिति को मामला सौंपने की सिफारिश परीक्षा समिति ने आज कर दी। साथ ही तोमर से भी जवाब-तलब किया जाएगा। इस बाबत उनको एक पत्र भेजा जाएगा, जिसमें पूछा जाएगा कि तथ्यों का जिक्र करते हुए उनकी कानून की डिग्री क्यों न रद्द कर दी जाए।


कुलपति ने बताया कि आंतरिक जांच रपट परीक्षा समिति ने मान ली गई और इस पर भी कार्रवाई करने के लिए अनुशासन समिति को अनुशंसा की गई। तोमर मामले में विश्वविद्यालय ने प्रतिकुलपति की अध्यक्षता में जांच समिति बनाई थी। जिसमें मुंगेर के विश्वनाथ सिंह इंस्टीट्यूट आफ लीगल स्टडीज के उस समय के प्राचार्य शंभु प्रसाद सिंह, भागलपुर विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक राजेंद्र सिंह, विश्वविद्यालय क परीक्षा विभाग के दिनेश श्रीवास्तव समेत कई अधिकारियों और कर्मचारियों से जवाब-तलब किया था और उन्हें कसूरवार ठहराया था। इन पर भी कार्रवाई करने की सिफारिश अनुशासन समिति से की गई है।कुलपति बताते हैं कि तोमर की डिग्री के बाबत दिल्ली हाई कोर्ट ने विश्वविद्यालय से पूछा था। इस पर विश्वविद्यालय ने हलफनामा दायर कर साफ कहा था कि तोमर की ओर से प्रस्तुत की गई डिग्री विश्वविद्यालय में मौजूद कागजातों और रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती।

यों अनुशासन समिति के मुखिया भी कुलपति ही है। इनके अलावा प्रतिकुलपति, सिंडिकेट के तीन सदस्य, कुलसचिव और प्रॉक्टर इसके सदस्य हैं। अब अनुशासन समिति की बैठकहोनी है। कार्रवाई के मुद्दे पर इस समिति का निर्णय अहमियत रखता है। तब मामला सिंडिकेट और फिर राज्यपाल सह कुलाधिपति के पास अंतिम फैसले के लिए जाएगा।
बहरहाल, विश्वविद्यालय स्तर पर कार्रवाई बुधवार से शुरू हो गई। मगर फरवरी में सौंपी आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट पर सात महीने बाद भी कार्रवाई का निर्णय अपने आप में सवाल खड़ा करता है। कुलपति मामला अदालत के अधीन होने की बात बोल कर कई सवालों को टाल गए।

 

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