पूर्वांचलियों पर चलेगी जोर आजमाइश

दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 50 में पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गए हैं। माना जाता है कि इन मतदाताओं के समर्थन से 2015 के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ को 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 67 सीटें मिली थीं।

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल फोटो सोर्स – जनसत्ता

‘अगर दिल्ली में एनआरसी लागू हुआ तो सबसे पहले मनोज तिवारी को दिल्ली से जाना होगा।’ यह जवाब केजरीवाल ने मनोज तिवारी के दिल्ली में भी एनआरसी लागू करने की मांग पर पूछे गए सवाल पर दिया था। इस जवाब के बाद दिल्ली की राजनीति में भूचाल मच गया है। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने इस नुकसान की भरपाई के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश मूल के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह को दिल्ली विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाया है। भाजपा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाकर प्रदर्शनों का सिलसिला जारी रखा है।

दरअसल मनोज तिवारी मूलरूप से बिहार के निवासी हैं और दिल्ली का हर चौथा या पांचवा मतदाता पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि के मूल निवासी) का प्रवासी है। दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 50 में पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गए हैं। माना जाता है कि इन मतदाताओं के समर्थन से 2015 के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ को 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 67 सीटें मिली थीं।

पूर्वांचली लोगों का ज्यादा समर्थन कांग्रेस को मिलता रहा। कांग्रेस ने पूर्वांचल के लोगों को खुश करने के लिए 2000 में दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने छठ के दिन ऐच्छिक अवकाश घोषित किया। शीला दीक्षित सरकार ने बिहार से बाहर पहली बार दिल्ली में मैथिली भोजपुरी अकादमी बनाई। भाजपा को यह राजनीति देर से समझ में आई और लगातार राजनीतिक दबाव के कारण 2014 में राष्ट्रपति शासन में बिहार और झारखंड के बाद दिल्ली तीसरा राज्य बना जहां छठ के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया। इसी दबाव में पहले 2014 में लोक सभा टिकट और 2016 में बिहार मूल के भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। भाजपा को उसका लाभ मिला। दिल्ली में भाजपा 1998 में सरकार से बाहर हुई, तब से वह कभी विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाई। भाजपा 2017 में लगातार तीसरी बार नगर निगमों के चुनाव जीत गई।

तिवारी ने 2017 के निगमों के चुनाव में 32 बिहार मूल के उम्मीदवारों को टिकट दिलवाया जिसमें 20 चुनाव जीत गए। भोजपुरी समाज के प्रमुख अजीत दुबे कहते हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव और 2017 के नगर निगम चुनाव ने साबित कर दिया कि अब दिल्ली में रहने वाले ज्यादातर प्रवासी दिल्ली के मतदाता बन गए हैं। इसी तरह 1997 में निगम पार्षद और 1998 में विधायक बने महाबल मिश्र का लाभ कांग्रेस को मिला। वे 2009 में पश्चिमी दिल्ली से सांसद बने लेकिन कांग्रेस के कमजोर होने का लाभ 2012 बनी ‘आप’ को मिला। 2013 और 2015 के विधानसभा चुनाव में तो पूर्वांचल के लोगों ने एक तरफा ‘आप’ को वोट दिया। ‘आप’ ने अपने वोट पक्के करने के लिए दिल्ली के सरकारी स्कूलों में मैथिली की पढ़ाई शुरू की और भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा और छठ घाटों की संख्या बढ़ाई। कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है।

अभी के हालात में लगता है कि विधानसभा चुनाव में ‘आप’ और भाजपा में मुकाबला होगा। उधर, मनोज तिवारी ने कहा ‘कि केजरीवाल तो पढ़े-लिखे माने जाते हैं उन्हें एनआरसी का मतलब नहीं मालूम है क्या। विदेशी और दूसरे राज्यों के मूल निवासियों को एक ही माना जा सकता है। दिल्ली में तो ज्यादातर लोग बाहर के राज्यों से आए हैं। ऐसा कहकर केजरीवाल ने प्रवासियों का अपमान किया है’। भाजपा के पूर्वांचल मोर्चा और पूर्व विधायक रामवीर सिंह बिधूड़ी ने भी केजरीवाल के खिलाफ प्रदर्शन किया था। रविवार को भी पूर्व विधायक भीष्म शर्मा के नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं ने घोंडा विधानसभा में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का पुतला फूंका गया।

बयान तक लेने पड़े वापस
एक बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते हुए शीला दीक्षित ने एक कार्यक्रम में कह दिया कि दिल्ली की बेहतर सुविधाओं के लालच में बड़ी तादात में लोग दिल्ली चले आते हैं उससे दिल्ली में भीड़ बढ़ती जा रही है। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था, मान लिया गया कि उनका इशारा पूर्वांचल के प्रवासियों की ओर था। बावजूद इसके उनको अपना बयान वापस लेना पड़ा। इसी तरह दिल्ली के उपराज्यपाल रहे तेजेंद्र खन्ना ने एक आयोजन में कह दिया था कि उत्तर भारतीयों को चलना नहीं आता। इस बयान पर ही इतना हंगामा हुआ कि राजनिवास से सफाई दी गई और उसके बाद में राजनिवास में होने वाला सालाना संवाददाता सम्मेलन बंद ही हो गया।

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