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दिल्ली नगर निगम चुनाव: मनोज तिवारी की टीम ने कसी कमर, प्रदेश अध्यक्ष के सामने होगी बड़ी चुनौती

दिल्ली के तीनों निगमों में भाजपा पिछले दस साल से काबिज है।

Author नई दिल्ली | January 17, 2017 2:59 AM
भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी। PTI Photo

डेढ़ महीने पहले दिल्ली भाजपा की कमान संभालने वाले मनोज तिवारी की रविवार को घोषित टीम के लिए दो महीने बाद होने वाले निगम चुनाव में जीत हासिल करना एक बड़ी चुनौती है। दिल्ली के तीनों निगमों में भाजपा पिछले दस साल से काबिज है। 35 पदाधिकारियों की टीम में ज्यादातर नाम दिल्ली भाजपा से जुड़े बड़े नेताओं के करीबियों के हैं। बताया जा रहा है कि नई टीम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेता, दिल्ली भाजपा के प्रभारी श्याम जाजू और केंद्रीय मंत्री विजय गोयल का प्रभाव ज्यादा है। सालों से दिल्ली से जुड़े हर फैसले अपने हिसाब से करवाने वाले केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के ज्यादातर सदस्यों को इस बार टीम में जगह नहीं दी गई है। विभिन्न बिरादरियों से भी वे ही नाम चुने गए हैं जिनका इलाके से ज्यादा नेताओं में प्रभाव है। पार्टी अनुशासन के नाम पर कोई नेता खुलकर नहीं बोल रहा है, लेकिन नई टीम से पार्टी में भारी नाराजगी है। सोमवार को दिन भर पार्टी के प्रदेश कार्यालय में नए पदाधिकारियों का स्वागत होने के अलावा नई टीम पर टीका-टिप्पणी चलती रही।

पार्टी के विधान में प्रदेश अध्यक्ष के अलावा प्रदेश के महामंत्री सबसे ताकतवर होते हैं। संघ की ओर से आए सिद्धार्थन के अलावा तीनों नए महामंत्री बनाए गए हैं। उनमें रविंद्र गुप्ता और राजेश भाटिया एक ही जिले से हैं। गुप्ता उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर भी रहे हैं और शुरू से ही वे विवादास्पद रहे हैं। चौथे महामंत्री कुलदीप सिंह चाहल को प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए डॉ हर्षवर्धन ने पार्टी से निकाला था। बाद में उनकी वापसी हुई थी। वे जाट बिरादरी से हैं। संयोग से वे जिस इलाके में रहते हैं उसमें गिनती के जाट बिरादरी के लोग हैं जबकि बाहरी दिल्ली से तीन बार विधायक रहे कुलवंत राणा और पूर्व विधायक व दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे राजेश गहलोत आदि अनेक जाट नेता पार्टी में हैं जिनका अपने इलाके में भारी असर है। संयोग से जाट बिरादरी की उपाध्यक्ष बनीं कमलजीत सहरावत भी उस इलाके से हैं जहां उनकी बिरादरी की संख्या कम है। इसी तरह दक्षिणी दिल्ली के सांसद रमेश बिधूड़ी को हटाना था तो तीन बार के निगम पार्षद महक सिंह जैसे नेताओं को महामंत्री बनाया जा सकता था। रमेश बिधूड़ी को महामंत्री पद से हटाकर बिना उनकी सलाह के उनके भतीजे विक्रम बिधूड़ी को मंत्री बनाया गया है। कहा जा रहा है कि एक तीर से दो शिकार किया गया है। कहने के लिए रमेश बिधूड़ी के भतीजे को मंत्री बनाया गया, लेकिन असल में उन्हें दरकिनार किया गया है।

विधान के मुताबिक पार्टी में आठ उपाध्यक्ष और आठ मंत्री होते हैं, लेकिन मंत्री नौ बनाए गए हैं और कहा जा रहा है कि एक मंत्री और दो उपाध्यक्ष और बनाए जाएंगे। भाजपा में सिख नेता के नाते आरपी सिंह को लोग जानते हैं, दूसरे कुलदीप सिंह जैसे तो लाइन में ही लगे रह गए और अकाली दल में रहे ट्रांसपोर्टर कुलवंतसिंह कांठ को उपाध्यक्ष बना दिया गया। इसी तरह से भाजपा में सालों से सक्रिय मुसलिम नेताओं को दरकिनार करके आम आदमी पार्टी(आप) से भाजपा में आई शाजिया इल्मी को उपाध्यक्ष बनाया गया है। आतिफ रसीद से लेकर राजी मलिक तक अनेक मुसलिम नेता हैं जो सालों से भाजपा में सक्रिय हैं। उत्तराखंड मूल के मोहन सिंह बिष्ट को तो उपाध्यक्ष बनाया गया है, लेकिन जनाधार वाले कई पूर्व विधायकों को टीम में जगह नहीं मिली है। एक दिलचस्प आंकड़ा है कि टीम में बड़े पैमाने पर हारे हुए विधायकों और निगम पार्षदों को जगह दी गई है। इस बार किसी महिला को महामंत्री नहीं बनाया गया, अलबत्ता पदाधिकारियों में 33 फीसद का महिला कोटा दूसरे पदों पर महिलाओं को नियुक्त करके पूरा कर दिया गया है।

इस टीम के बूते निगम चुनाव जीतना दिल्ली भाजपा के नए अध्यक्ष मनोज तिवारी के लिए एक बड़ी चुनौती तो है ही। साथ ही दिल्ली के राजनीतिक हालात जिस तरह से रोज बदल रहे हैं, उसमें विधानसभा की कई सीटों या पूरी विधान सभा के मध्यावधि चुनाव होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (आप) के संसदीय सचिव बनाए गए 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होने की आशंका के बाद रोगी कल्याण समिति के अध्यक्ष बनाए गए विधायकों की सदस्यता पर भी तलवार लटकी हुई है। मई में निगम की 13 सीटों के उपचुनाव ने दिल्ली की राजनीति में भूचाल ला दिया, जिसमें आप को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कांग्रेस की दिल्ली में वापसी होती दिखी।

 

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