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दिल्ली विस चुनाव: तारीख का इंतजार कर रहे मैदान में डटे उम्मीदवार

मनोज मिश्र यह तय माना जा रहा है कि शनिवार को रामलीला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के बाद कभी भी दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित हो जाएगी। चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग को वैसे तो महज 26-27 दिन का समय चाहिए। लेकिन परंपरा रही है कि करीब डेढ़ महीने पहले तारीख […]

Author January 10, 2015 12:21 PM
दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई है, 7 फरवरी को वोट डाले जाएंगे जबकि मतगणना 10 फरवरी को होगी।

मनोज मिश्र

यह तय माना जा रहा है कि शनिवार को रामलीला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के बाद कभी भी दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित हो जाएगी। चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग को वैसे तो महज 26-27 दिन का समय चाहिए। लेकिन परंपरा रही है कि करीब डेढ़ महीने पहले तारीख घोषित की जाती है।

दिल्ली में मतदाताओं के बदले समीकरणों के कारण कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के बोगस वोटरों का मामला हाई कोर्ट में पहुंच गया और पांच जनवरी की तारीख पर आयोग ने अदालत को बताया कि बोगस वोटर हटाने का काम पूरा हो गया है। लेकिन वे इस बारे में संभवत: हलफनामा 13 फरवरी को देने वाले हैं। अदालत ने इसे सीधे चुनाव से नहीं जोड़ा। फिर भी माना जा रहा है कि आयोग के लिए चुनाव टालने का एक कारण यह भी हो सकता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर चार नवंबर को दिल्ली विधानसभा भंग हुई। इसके छह महीने के भीतर चुनाव कराने जरूरी होते हैं।

दिल्ली में आप सरकार के इस्तीफे के बाद 17 फरवरी से साल भर के लिए राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। वह 16 फरवरी को खत्म होगा। इसलिए सामान्य ढंग से माना जा रहा है कि तब तक चुनावी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इन हालात में आयोग के आग्रह पर राष्ट्रपति शासन दो साल के लिए आगे भी बढ़ाया जा सकता है जिसकी मंजूरी संसद के दोनों सदनों से दो महीने के भीतर लेनी पड़ेगी। चूंकि चुनाव दो महीने से ज्यादा किसी भी तरह से टलते नहीं दिख रहे हैं। इसलिए संसद की मंजूरी की केवल औपचारिकता ही करनी पड़ेगी।

जिस तरह के पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे उसमें तो यह लगभग तय ही है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव तिकोने होंगे। इसका लाभ भाजपा को मिलेगा। विधानसभा बनने के बाद 1993 में पांच विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं। पहले चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा जनता दल (जद) मजबूती से चुनाव लड़ रहा था। उसे दिल्ली के अल्पसंख्यकों ने एकतरफा वोट दिया, चार सीटें मिलीं। जद की दिल्ली की आधी सीटों पर अच्छी मौजूदगी के कारण भाजपा चुनाव जीत गई। उसे करीब 43 फीसद वोट मिले। उसके बाद लगातार तीन चुनावों में भाजपा और कांग्रेस में सीधा ही मुकाबला होता रहा और भाजपा का वोट 37 फीसद नहीं पार किया। इतना ही नहीं इस दौरान तीन बार कांग्रेस से सीधी लड़ाई के बजाए मजबूत अन्य उम्मीदवारों के कारण 37 फीसद वोट लाकर ही भाजपा नगर निगम चुनाव जीतती रही।

वोट बंटवारे का लाभ 2013 के विधानसभा चुनाव में दिखा जब भाजपा करीब 34 फीसद वोट लाकर नंबर एक पार्टी बनी। उसे 32 सीटें आर्इं यानी अगर उसे दो-तीन फीसद वोट ही मिल जाते तो उसे 70 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत मिल जाता। उस चुनाव में आप को 29.50 फीसद वोट और 28 सीटें और कांग्रेस को 24.50 फीसद वोट और आठ सीटें मिली थीं।
ये हालात तभी बदल सकते हैं जब भाजपा से आप या कांग्रेस की सीधी लड़ाई हो जाए यानी दोनों में से एक दल दस फीसद से नीचे पहुंच जाए। मई में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के हाशिए पर जाने के कारण अल्पसंख्यक वोट एकतरफा आप को मिले। बावजूद इसके उसके वोट महज तीन फीसद ही बढ़े। कांग्रेस को 15 फीसद वोट मिले। कांग्रेस में शुरू से ही पार्टी से अधिक उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं। सालों सत्ता में रही कांग्रेस में बड़ी तादात में ऐसे नेता हैं जो अपने बूते चुनाव लड़ेंगे। यह अभी से ही दिखने लगा है। कांग्रेस ने अपनी पहली सूची में 24 उम्मीदवार घोषित किए हैं। उनके अलावा करीब दो दर्जन नेता बिना उम्मीदवार घोषित हुए ही पूरी ताकत से चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। आप ने अपने सारे उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। भाजपा के नेता यही दोहराते हैं कि चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद ही भाजपा के उम्मीदवार घोषित होंगे। वैसे भाजपा के 32 विधायकों में से ज्यादातर उम्मीदवार की तरह ही इलाके में काम कर रहे हैं।

पिछले दो चुनावों ने साबित कर दिया कि कांग्रेस और आप के वोटर एक ही हैं। उनका आपस में विभाजन होने का ही लाभ भाजपा को मिला। भाजपा के जो मध्यमवर्ग के वोट विधानसभा चुनाव में गए थे वे लोकसभा में वापस आ गए। भाजपा का वोट तोड़ना किसी भी दल के लिए कठिन है। यह बोगस वोटरों के नाम पर पिछले दिनों से चल रहे हंगामे से भी साबित होता है। पहसे भाजपा के लोग कांग्रेस पर बोगस वोटर बनाने के आरोप लगाते थे। अब ये ही आरोप भाजपा पर लग रहे हैं। दिल्ली में रहने की जगह कम पड़ने पर ही दो दशक में एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) आबाद हुआ। दिल्ली के मध्यमवर्ग का ही बड़ा हिस्सा इन इलाकों में बसा। उत्तर प्रदेश या हरियाणा में दिल्ली जैसी सुविधा न होने पर उसका एक बड़ा वर्ग दिल्ली का मतदाता बना रहा। आरोप है कि बहुत से लोगों ने दिल्ली का वोटर पहचानपत्र समपर्ण नहीं किया।

माना जाता है कि वह वर्ग चुनाव में भाजपा को वोट देता है। उनका दिल्ली में आना-जाना पहले की तरह ही है। इसलिए उनकी पहचान करना कठिन है।

दिल्ली की आबादी करीब दो करोड़ है और मतदाताओं की संख्या एक करोड़ तीस लाख से ज्यादा हो गई है। ऐसे तमाम लोग हैं जो अभी भी मतदाता बनने की लाइन में हैं। यह विवाद पिछले चुनाव में सामने आया था। इस बार कांग्रेस के साथ-साथ आप ने भी इसे मुद्दा बनाया है। आयोग का दावा है कि उसने बोगस वोटरों के नाम हटाने का काम पूरा कर कर लिया है। बावजूद इसके चुनाव का यह भी एक मुद्दा बनने वाला है। वैसे चुनावी मुद्दे तय हो चुके हैं। प्रधानमंत्री की शुक्रवार की रैली से कुछ और मुद्दे तय होने वाले हैं। इसमें बिजली, पानी, गरीबों के घर के अलावा तीनों नगर निगमों को फिर से एक करना भी होने वाला है।

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