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पुराने मकानों को नया बताकर बेचना डीडीए को पड़ा महंगा, नहीं मिल रहे खरीददार

फ्लैट के लिए आवेदन जमा करने की आखिरी तारीख 11 अगस्त है और अभी तक बिके कुल 50 हजार फार्म में सिर्फ 5000 फार्म ही अंतिम रूप से जमा कराए गए हैं।

Author नई दिल्ली  | July 31, 2017 12:42 AM
दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) (Representative Image)

आम लोगों को सस्ती कीमत पर छत मुहैया कराने का दावा करने वाला दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) अपने ही जाल में फंसता नजर आ रहा है। पुराने फ्लैटों की नई योजना के खरीदार न मिलने की वजह से डीडीए असमंजस में है। सभी श्रेणियों के करीब 12 हजार फ्लैटों की उसकी योजना में खरीदार बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। फ्लैट के लिए आवेदन जमा करने की आखिरी तारीख 11 अगस्त है और अभी तक बिके कुल 50 हजार फार्म में सिर्फ 5000 फार्म ही अंतिम रूप से जमा कराए गए हैं। मतलब साफ है कि लोग प्राधिकरण के पुराने रिकॉर्ड देखते हुए उसकी चालाकी के फेर में पड़ना नहीं चाहते। ऊपर से बैकों ने भी कर्ज देने के नाम पर हाथ खड़े करने शुरू कर दिए हैं। नाकाम सबित हो रही इस योजना को लेकर डीडीए क्या नई तरकीब निकालता है, यह काबिलेगौर है। डीडीए अपने वादों से मुकरने और चालाकी दिखाकर ग्राहकों को जाल में फंसाने के लिए लंबे समय से जाना जाता है। प्राधिकरण की यह चालाकी तब सामने आई जब साल 2010 के ईडब्लूएस (आर्थिक रूप से कमजोर) फ्लैटों को साल 2014 की आवासीय योजना में एलआइजी बताकर बेच दिया गया था।

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गनीमत यह रही कि कुछ खरीदारों ने फ्लैटों की असलियत जान ली और उनकी गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए करीब 11 हजार फ्लैट वापस कर दिए। इससे चार लाख रुपए के ईडब्लूएस फ्लैट को 14.50 लाख से 27.85 लाख रुपए तक में बेचने की डीडीए की योजना धरी की धरी रह गई। यही नहीं, कई जगह तो जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद ही अभी तक खत्म नहीं हुआ है। दिल्ली से दूर बंजर जगहों पर डीएलएफ के साथ मिलकर बनाए जा रहे 700 जनता फ्लैट का मामला अभी भी अधर में लटका हुआ है। शिवाजी मार्ग-पुराना नजफगढ़ रोड के ये फ्लैट उन आबंटियों को नहीं सौंपे गए, जिन्हें डीएलफ की ओर से डीडीए को बना बनाया दिया जाना था। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बाद भी 36 साल से रोहिणी रेसीडेंशियल स्कीम 1981 को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया गया है। 1.17 लाख प्लॉट देने के लिए निकाली गई इस योजना के कई आबंटियों की मौत हो चुकी है तो कई अधेड़ उम्र में आ गए हैं। इन 36 सालों में डीडीए ने 55 हजार और बाद में 11 हजार लोगों को प्लॉट मुहैया कराया, लेकिन उनमें से कई प्लॉट पूरी तरह से भी विकसित भी नहीं हैं। अब यही मामला डीडीए के गले की फांस बन चुका है और सुप्रीम कोर्ट में उसके खिलाफ अवमानना की सुनवाई होनी है।

2017 की योजना में भी डीडीए पूरी तरह फेल होता दिख रहा है। 2014 की पुरानी योजना के आबांटियों के लौटाए गए फ्लैट को नई योजना में शामिल करना डीडीए के लिए महंगा पड़ सकता है। टूटे प्लास्टर, बदबूदार नालियां, बिखरी पड़ी निर्माण सामग्री और मूलभूत सुविधाओं की कमी के साथ ग्राहकों को लुभाने के लिए लाई गई इस योजना के ग्राहकों की समझ में आ गया है कि किस तरह 2014 में वापस किए गए 11 हजार फ्लैटों को उनके मत्थे मढ़ा जा रहा है। तत्कालीन केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू की मौजूदगी में कई तरह की घोषणाएं कर इस योजना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, ताकि ग्राहक हाथों-हाथ आबंटन करा लें, लेकिन बैंक की ओर से प्रोसेसिंग फीस देने में दिखाई गई बेरुखी और पेचीदगी ने मौजूदा समय में योजना पर लगाम लगा दी है। कर्ज में सबसिडी देने और पुराने फ्लैटों की लंबाई-चौड़ाई बढ़ाने के दावे के बीच डीडीए ने जैसे ही खरीदने के बाद बेचने और आबंंटन के बाद वापस करने के नियम बनाए, वैसे ही ग्राहकों ने भी फ्लैट लौटाना शुरू कर दिया।

 

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