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‘बाला सरस्वती का नृत्य साहित्य और जीवन का समन्वय’

शताब्दी समारोह के अगले चरण में नृत्यांगना नंदिनी रमणी और साथी नृत्यांगनाओं ने नृत्य रचनाओं को पेश किया, जिसे टी बाला सरस्वती अपनी प्रस्तुतियों में पेश किया करती थीं। इसे उन्होंने पद मंजरी नाम दिया।

Author Published on: May 16, 2019 2:52 AM
नृत्यांगना नंदिनी रमणी

शशिप्रभा तिवारी

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से दो दिवसीय संस्कृति संवाद शृंखला का आयोजन किया गया। भरतनाट्यम की प्रतिष्ठित नृत्यांगना टी बाला सरस्वती के जन्म शताब्दी के अवसर पर यह समारोह आयोजित हुआ। इस समारोह में उनकी शिष्या नंदिनी रमणी और साथी नृत्यांगनाओं ने नृत्य पेश किया, जबकि संस्कृति संवाद शृंखला परिचर्चा में वरिष्ठ कलाकारों ने बाला सरस्वती से जुड़ीं अपनी स्मृतियों को साझा किया।

परिचर्चा सत्र में डॉ सोनल मानसिंह, डॉ सरोजा वैद्यनाथन, पंडित बिरजू महाराज, डॉ पद्मा सुब्रमण्यम, केंद्र के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय और सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने भाग लिया। इस सत्र का संचालन डॉ सच्चिदानंद जोशी ने किया। उन्होंने कहा कि केंद्र राय साहब की प्रेरणा से देश के उन सांस्कृतिक मनीषियों पर संस्कृति संवाद शृंखला का आयोजन कर रही है, जिनका भारत की सांस्कृतिक विरासत में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। बाला सरस्वती जी भारतीय कला व संस्कृति की राजदूत थीं।

इस चर्चा की सूत्रधार डॉ सोनल मानसिंह ने कहा कि बाला जी के जैसा न कोई था और न कोई होगा, वो बियॉन्ड द ब्यूटीफुल थीं, वह दुनिया की तीन सबसे प्रसिद्ध नृत्यांगनाओं में से एक थीं। मैंने उन्हें पहली बार 1962 में मुंबई के भारतीय विद्या भवन में नृत्य प्रस्तुत करते हुए देखा था। फिर उनसे दूसरी मुलाकात मद्रास में हुई। उस समारोह में मुझे नृत्य करना था। वह कार्यक्रम से पहले मुझसे मिलने ग्रीन रूम में आर्इं। फिर, मेरा नृत्य देखा और आशीर्वाद दिया। उनका नृत्य अभिनय कला, साहित्य और जीवन का समन्वय था।

डॉ सरोजा वैद्यनाथन ने बाला जी के साथ जुड़ी अपनी यादों को साझा करते हुए कहा कि वह मेरे नृत्य के क्षेत्र में आने की प्रेरणा थीं। मेरा परिवार नृत्य को देखना पसंद करता था, लेकिन वो नहीं चाहते थे कि मैं इस क्षेत्र में जाऊं। जब मैंने बाला जी को नृत्य करते देखा तो मैंने उनके जैसा बनना तय किया। इस अवसर पर डॉ पद्मा सुब्रमण्यम ने कहा कि वो केवल नृत्यांगना नहीं थीं, वो अभिनय और संगीत सरस्वती थीं। वो एक विशाल वट वृक्ष थीं। कथक गुरु पंडित बिरजू महाराज ने बाला जी को अद्भुत कलाकार बताया। उन्होंने कहा कि उनके अंदर एक सच्चाई थी, जो बहुत ही कम कलाकारों में देखने को मिलती है।

शताब्दी समारोह के अगले चरण में नृत्यांगना नंदिनी रमणी और साथी नृत्यांगनाओं ने नृत्य रचनाओं को पेश किया, जिसे टी बाला सरस्वती अपनी प्रस्तुतियों में पेश किया करती थीं। इसे उन्होंने पद मंजरी नाम दिया। इसकी शुरुआत नंदिनी रमणी की प्रस्तुति से हुई। पहली प्रस्तुति पदम ‘येल्ला क्रिड़म करितम’ थी। यह राग तोड़ी और आदि ताल में निबद्ध थी। दूसरी पेशकश जावली पद्मा सुब्रमणयम अयैर की रचना ‘समयमिताम सिंच स्वामी’ थी। नृत्यांगना सुषमा ने धनम कृष्ण अयर की रचना पर भाव को दर्शाया। यह राग पंतुवराली और रूपक ताल में निबद्ध थी। उन्होंने महाराज स्वाति तिरूनाल की पदम ‘अति वेणी इंतु’ में पदमनाभ के प्रति नायिका के भावों को चित्रित किया। यह राग कुरूंजी में निबद्ध थी। नृत्यांगना रोजा कन्नन ने पदम ‘चूड रे अति नडीसे’ पर नायिका के भावों को विवेचित किया। यह पदम राग सहाना में पिरोया गया था।

कार्यक्रम के दूसरे दिन बाला सरस्वती के जीवन पर आधारित फिल्म ‘बाला’ का प्रदर्शन किया गया। इसका निर्देशन सत्यजित रे ने किया था। उनके जीवन पर आधारित यह एक मात्र फिल्म है। बाला सरस्वती पर केंद्रीत समारोह का समापन ‘बाला-द कोंसुम्मेट म्यूजीशियन’ सत्र से हुआ। इसमें दक्षिण भारतीय शैली कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ चारुमति रामचंद्रन ने बताया कि बाला हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सुनना पसंद करती थीं। वह उस्ताद अब्दुल करीम खां, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां और गौहर जान की रिकॉर्डिंग खूब सुनती थीं। उनकी पसंदीदा ठुमरी ‘कौन गली गयो श्याम’ थी, जिसे वह फुर्सत में गुनगुनाती थीं।

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