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दुखड़ा: ई-रिक्शा: सहूलियत नहीं मुसीबत का सबब

साइकिल रिक्शा चलाने वालों को सहूलियत देने और उनकी मेहनत बचाने के नाम पर शुरू किए गए बैटरी वाले ई-रिक्शा ने इन लोगों की मुश्किलों कम करने के बजाए और बढ़ा दी हैं।

Author नई दिल्ली, 1 सितंबर। | September 2, 2018 4:54 AM
ई-रिक्शा की तादाद बढ़ने के बाद साइकिल रिक्शा चालकों की दिक्कतें बढ़ गई हैं।

निर्भय कुमार पांडेय

साइकिल रिक्शा चलाने वालों को सहूलियत देने और उनकी मेहनत बचाने के नाम पर शुरू किए गए बैटरी वाले ई-रिक्शा ने इन लोगों की मुश्किलों कम करने के बजाए और बढ़ा दी हैं। ई-रिक्शे की शुरुआत के वक्त दावा किया गया था कि इससे साइकिल रिक्शा चलाने वाले गरीब लोगों को फायदा होगा और वे ई-रिक्शा चलाकर पहले की तुलना में ज्यादा पैसे कमा सकेंगे। ई-रिक्शा को बढ़ावा देने के लिए शुरुआत में दिल्ली सरकार की ओर से ऐसे रिक्शा खरीदने वालों को सबसिडी भी दी गई थी, लेकिन आज ई-रिक्शा की तादाद बढ़ने के बाद साइकिल रिक्शा चालकों की दिक्कतें बढ़ गई हैं।

नहीं सुधरा जीवन स्तर

मयूर विहार फेज-1 मेट्रो स्टेशन पर सवारी का इंतजार कर रहे रिक्शा चालक ज्योतिष मंडल ने बताया कि सरकार ने भले ही दावा किया था कि लोग ई-रिक्शा खरीदकर अपना जीवन स्तर सुधार सकेंगे, पर ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। ई-रिक्शा बढ़ने के कारण हमें सवारियों को लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। दिन भर में हम इतने पैसे भी नहीं कमा पाते कि दो वक्त की रोटी खा पाएं। दिन भर में अगर 300 रुपए भी कमाए तो 50 रुपए रिक्शा मालिक को किराया देना पड़ता है। उसके बाद खाने-पीने और रहने का खर्च। कुल मिलाकर 100-150 रुपए ही बचते हैं। इतने पैसे में दिल्ली में परिवार का पालन-पोषण आसान नहीं है।

करना पड़ता है दूसरा काम

उत्तर प्रदेश के रहने वाले नरेंद्र यादव ने बताया कि ई-रिक्शा आने के बाद वे चार सवारी एक साथ बैठाते हैं और प्रति सवारी 10 रुपए लेते हैं। किराया कम होने की वजह से ज्यादातर लोग ई-रिक्शा में जाना पंसद करते हैं। अगर हमें सवारी नहीं मिली तो हमारा घर कैसे चलेगा? नरेंद्र ने कहा कि रिक्शा चलाकर उनका गुजारा नहीं हो पाता, इसलिए वे रात को होटल में काम करते हैं, ताकि परिवार का भरण-पोषण कर सकें।

असहज महसूस करती हैं महिलाएं

ई-रिक्शा केवल साइकिल रिक्शा चालकों के लिए ही मुसीबत नहीं हैं, बल्कि इससे सवारियों को भी दिक्कत होती है। अनुज कुमार नाम के एक युवक ने कहा कि ई-रिक्शा में चार लोगों के लिए बैठने की व्यवस्था ठीक नहीं है। इनमें जगह इतनी कम होती है कि बैठने के बाद लोगों के पैर आपस में छूते रहते हैं। साथ ही ई-रिक्शा चालक तब तक चलने का नाम नहीं लेते, जब तक चार-पांच लोग बैठ नहीं जाते। एक महिला सुनीता ने कहा कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ ई-रिक्शा में बैठने में काफी असहज महसूस करती हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि हम जैसे लोगों को गरीब साइकिल रिक्शा चालकों का भी ध्यान रखना चाहिए

ई-रिक्शा खरीदने की हैसियत नहीं

नोएडा सेक्टर-15 मेट्रो स्टेशन पर सवारी का इंतजार कर रहे ई-रिक्शा चालक महेंद्र कुमार ने बताया कि वे भी ई-रिक्शा खरीदना चाहते हैं ताकि शरीर को आराम मिले। लेकिन ई-रिक्शा की कीमत 80 हजार रुपए से लेकर एक लाख तक है, ऐसे में वे इसे खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकते। यही कारण है कि वे किराए पर लेकर रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने बताया कि मात्र 15-20 फीसद लोग ही ऐसे होंगे जिन्होंने कर्ज लेकर या फिर जैसे-तैसे कर पैसे जोड़कर ई-रिक्शा खरीदा हो, नहीं तो ज्यादातर लोग इसे किराए पर लेकर ही चलाते हैं।

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