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27 साल बाद खारिज हुआ दहेज प्रताड़ना का केस, इस दौरान दो आरोपी मर गए, दो हो गए अधेड़

यह केस लोअर कोर्ट में भी करीब 20 साल चला। कोर्ट ने 2012 में आरोपियों को दोषी ठहराया और तीन साल जेल की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ आरोपी सत्र न्यायाल पहुंचे थे।

प्रतीकात्मक तस्वीर

देर से मिला न्याय… न्याय नहीं होता। यह बात तो सभी ने सुनी होगी। कोर्ट में भी कई बार बोली जाने की खबरें आ जाती हैं। लेकिन अगर न्याय होने में 27 साल लग जाएं? ऐसे ही एक मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट में फैसला सुनाया गया। आखिरकार इंसाफ मिला लेकिन 27 साल, करीब आधी जिंदगी लग गई। करीब तीन दशक चले केस में न्यायाधीश संजय बंसल को भी कहना पड़ा, व्यक्ति तब निर्दोष साबित हुआ जब वह दुनिया में नहीं है।

मामला दहेज प्रताड़ना का था। गाजियाबाद के रहने वाले राहुल (काल्पनिक नाम) की शादी शाहदरा की रेखा (काल्पनिक नाम) से 1991 में हुई थी। लेकिन शादी की डोर कुछ ही समय में टूटने लगी। एक साल बाद 1992 में ही रेखा ने ससुराल वालों पर दहेज प्रताड़ना और स्त्री धन जब्ती का केस दर्ज कराया। हालांकि यह केस लोअर कोर्ट में भी करीब 20 साल चला। कोर्ट ने 2012 में आरोपियों को दोषी ठहराया और तीन साल जेल की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ आरोपी सत्र न्यायाल पहुंचे थे। जहां अब इस केस को बेबुनियाद ठहराते हुए खारिज कर दिया गया।

सत्र न्यायाल ने मामले पर कहा, शिकायतकर्ता दहेज प्रताड़ना से पीड़ित होने का किसी भी तरीके से वर्णन नहीं कर सकी। कोर्ट ने कहा, पीड़िता ने माना है कि उसके कभी उसके पिता से शादी में मिला सामान ससुरालवालों से वापस ही नहीं मांगा। कोर्ट ने इसी को आधार मानते हुए केस खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट में जज ने कहा कि, यह विडंबना है कि एक इंसान तब दोष मुक्त हुआ, जब वह इस दुनिया में ही नहीं है।

इस दौरान आरोपी परिवार के दो सदस्य की मौत हो गई। शिकायतकर्ता की चाचा सुसर और दादी सास अब दुनिया में नहीं हैं। हालांकि इसी मामले में निचली अदालत ने सास और ससुर को जुर्माने की सजा पर छोड़ दिया था। जबकि उस वक्त दो नाबालिग आरोपी 40 की उम्र पार हो चुके हैं।

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