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डूटा अध्यक्ष पद हुआ ‘कांग्रेसमुक्त’

इंटेक के अगुआ डॉक्टर अश्विनी शंकर ने कहा कि हम अध्यक्ष पद पर नहीं लड़ रहे हैं। किसे समर्थन करेंगे इसका फैसला बाद में समय आने पर करेंगे।

Author नई दिल्ली | Published on: August 3, 2017 2:39 AM
दिल्ली विश्वविद्यालय।

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) चुनाव में कांग्रेसी धड़े ने लड़ाई से पहले मोर्चा छोड़ दिया है। कांग्रेस के शिक्षक संगठन इंटेक ने डूटा चुनाव में अध्यक्ष पद पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। इंटेक के अगुआ डॉक्टर अश्विनी शंकर ने कहा कि हम अध्यक्ष पद पर नहीं लड़ रहे हैं। किसे समर्थन करेंगे इसका फैसला बाद में समय आने पर करेंगे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने कहा कि इंटेक इस बार केवल डूटा कार्यकारिणी की जीत पर खुद को केंद्रित रखेगा। अब अध्यक्ष पद पर लड़ाई डीटीएफ, एनडीटीएफ, एएडी व यूटीएफ के बीच होनी है।  इस बार अध्यक्ष पद पर वामपंथी शिक्षक के संगठन डीटीएफ से किरोड़ीमल कॉलेज के राजीब रे, भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने वाले शिक्षक संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (एनडीटीएफ) से वीएस नेगी और एक साझा उम्मीदवार (एएडी और युटीएफ के) एसएस राणा अध्यक्ष पद पर मैदान में उतरे हैं। कांग्रेस के शिक्षक संगठन इंटेक की साख रही है। इसके सदस्य विद्वत और अकादमिक परिषदों में चुने जाते रहे हैं। शिक्षक संघ की कार्यकारिणी में भी इंटेक के लोग अहम भूमिका अदा करते रहे हैं। हाल के ईसी (कार्यकारी परिषद)चुनाव में इंटेक के एएम खान ने पहले चरण (सीधे चुनाव) में 800 वोट और दूसरे चरण में 1900 वोट लाकर अपने प्रतद्विंदी को जबरदस्त टक्कर दी। दिल्ली की पूर्व मंत्री किरण वालिया,आरएस दहिया, वीके भसीन, जैसे शिक्षक नेताओं के नाम इंटेक के पाले से हैं। ज्यादातर चुनावों में इंटेक खुद या गठबंधन कर डीटीएफ के उम्मीदवारों को चुनौती देती रही है। ऐसे मौके पर कैंपस की राजनीति को बिना टक्कर दिए अपने धुर-विरोधियों को सौंप देना चौंकाने वाला फैसला है। खासकर ऐसे समय में जब कांग्रेस राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर हार की संभावना को स्वीकार करते हुए भी विरोधी दल के खिलाफ मोर्चा ले रही है। यह समर्पण तब है जब यह चुनाव तदर्थ शिक्षकों के समायोजन, पदोन्नति, पेंशन, 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों, लाइब्रेरियन आदि मुद्दे पर लड़ा जा रहा है।

इंटेक की नेता व दिल्ली की पूर्व मंत्री किरण वालिया ने कहा कि कैंपस में तानाशाही हावी है। यह दौर विश्वविद्यालयों के चरित्र के हनन का है। चाहे स्वायत्ता का मुद्दा हो, या पाठ्यक्रम बनाने व पढ़ाने की प्रक्रिया का मुद्दा हो, शिक्षक व उनके प्रतिनिधियों की आवाज को डुबोने में अफसरशाही हावी है। ऐसे में शिक्षक संगठन (डूटा) भी अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पा रहा है। तदर्थ शिक्षकों की समस्या हो या स्थायी नियुक्ति की। उन्होंने दावा किया कि इंटेक से जुड़े शिक्षक डीयू में सक्रिय हैं। लेकिन अध्यक्ष पद पर जीत के लिए अभी तैयारी की जरूरत है। उन्होंने कहा हमने ईसी लड़ा। डूटा कार्यकारिणी में लड़ेगें। इंटेक ने शिक्षक संघ कार्यकारिणी के लिए डॉ. सुरेंद्र कुमार, डॉ. विश्वराज शर्मा और डॉ. रिजवान अहमद को उम्मीदवार बनाया गया है।

डूटा में 8,710 वोटर हैं। पिछले साल 6084 वोटरों ने वोट किए थे। पिछली बार इंटेक के उम्मीदवार संजय कुमार को 950 वोट मिले थे, वे एएडी के समर्थन से मैदान में थे। इस बार एएडी ने अपने पहले के साथी इंटेक के साथ को छोड़ यूटीएफ के साथ गठजोड़ कर उम्मीदवार कर दिया। इसके बाद इंटेक अकेला पड़ गया। इंटेक के ही एक नेता का कहना है कि प्रदेश कांग्रेस की इस बाबत देरी उनके काडर पर भारी पड़ी। बता दें कि कैंपस और खासकर डूटा के उम्मीदवारों के बारे फैसला प्रदेश कांग्रेस ही लेती है। जबकि अन्य शिक्षक संगठन राष्ट्रीय पार्टी से जुड़े होने के बावजूद कैंपस की राजनीति अपने बूते करते हैं। शिक्षक नेता दबे जुबान से इसके लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इंटेक के कई नेता इससे नाराज हैं।

 

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