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दिल्ली में केजरीवाल नहीं, मायावती से हाथ मिलाने की तैयारी में कांग्रेस

आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी (आप) के बदले मायावती की अगुआई वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से गठबंधन करने की तैयारी में है। इस मुद्दे पर दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं के बीच बातचीत भी जारी है।

Author नई दिल्ली, 1 सितंबर। | September 2, 2018 12:27 PM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

अजय पांडेय

आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी (आप) के बदले मायावती की अगुआई वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से गठबंधन करने की तैयारी में है। इस मुद्दे पर दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओं के बीच बातचीत भी जारी है। तय फॉर्मूले के अनुसार कांग्रेस लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों के लिए बसपा से गठबंधन करेगी। इसके तहत वह लोकसभा की एक सीट और विधानसभा की पांच-छह सीटें मायावती को दे सकती है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के घर पर गुरुवार को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बनाई गई मुख्य समिति की पहली बैठक हुई। इस बैठक में तय किया गया कि हर राज्य में गठबंधन वहां की परिस्थितियों के अनुसार होगा। बैठक में यह भी कहा गया कि गठबंधन किए जा सकने वाले राज्यों के कांग्रेस अध्यक्षों व प्रभारियों की रिपोर्ट के आधार पर ही आखिरी फैसला किया जाएगा। गठबंधन पर अंतिम फैसला निर्णय वरिष्ठ नेता एके एंटनी व अहमद पटेल लेंगे।

दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन पर खूब चर्चा हुई। दोनों दलों के नेताओं ने इस बात को स्वीकार भी किया कि इस तरह की बातचीत हुई है, लेकिन सूबे के कांग्रेसी मुखिया अजय माकन की अगुआई में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित व प्रदेश के तमाम कद्दावर कांग्रेसी नेताओं की बैठक हुई तो उसमें सबने एक सुर में कहा कि आम आदमी पार्टी से गठबंधन करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा। पार्टी की जो हालत उत्तर प्रदेश और बिहार में हुई है, वही दिल्ली में भी हो जाएगी। पार्टी आलाकमान ने भी माकन और अन्य नेताओं की राय पर सहमति की मुहर लगा दी।

सूबे के एक बेहद कद्दावर कांग्रेसी नेता ने कहा कि साफ बात यह है कि दिल्ली में हम किसी के जूनियर पार्टनर बनकर चुनाव नहीं लड़ेंगे। यह नहीं हो सकता कि कांग्रेस दो लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़े और बाकी की पांच सीटों पर गठबंधन करने वाली पार्टी लड़े। इसी तरह कांग्रेस विधानसभा में 20 सीटों पर लड़े और दूसरा दल 50 सीटों पर लड़े, ऐसे किसी गठबंधन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन अगर कांग्रेस छह लोकसभा सीटों पर लड़े और दूसरा दल एक सीट पर लड़े तो बात बन सकती है। इसी तरह विधानसभा में भी गठबंधन वाले दल को कांग्रेस पांच-छह सीटें दे सकती है। उन्होंने कहा कि इस लिहाज से हमारा बसपा से गठबंधन संभव है। वैसे भी बसपा से व्यापक पैमाने पर गठबंधन की बातचीत हो रही है। लिहाजा, ऐसा दिल्ली में भी हो सकता है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माकन ने गठबंधन को लेकर कहा कि दिल्ली में अकेली कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसके 10 पूर्व सांसद हैं और 70 पूर्व विधायक हैं। पार्टी ने 15 साल दिल्ली में सरकार चलाई है और सातों लोकसभा सीट जीतने में भी कामयाबी हासिल की है। ऐसे में वह किसी भी दल का जूनियर पार्टनर कैसे बन सकती है।

बसपा से कांग्रेस का गठबंधन इसलिए कारगर साबित हो सकता है क्योंकि एक तो बसपा सुप्रीमो मायावती खुद भी लंबे समय तक दिल्ली में रहती रही हैं और उनकी पार्टी कांग्रेस व भाजपा के बाद तीसरी ताकतवर पार्टी थी। बसपा ने दो विधानसभाओं में जीत भी दर्ज की और नगर निगम में भी डेढ़ दर्जन सीटों पर कब्जा जमाया। राजधानी की एक दर्जन सीटें आरक्षित श्रेणी में हैं जबकि लोकसभा की एक सीट को सुरक्षित घोषित किया गया है। सूबे के चुनाव में यह देखा गया है कि दलित जिसे वोट देते हैं, अल्पसंख्यक भी कमोबेश उधर ही जाते हैं। ऐसे में कांग्रेस व बसपा का मेल राजधानी की सियासत में एक जोरदार प्रयोग साबित हो सकता है। आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में दलितों की आबादी करीब 17 फीसद व अल्पसंख्यकों की 15 फीसद है।

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