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हार का दंश

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के बेहद लचर प्रदर्शन को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी का चिंतित होना स्वाभाविक है।

सांकेतिक फोटो।

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के बेहद लचर प्रदर्शन को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी का चिंतित होना स्वाभाविक है। ऐसा इसलिए भी कि कांग्रेस लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लगातार अपनी जमीन खो रही है। हालांकि इस वक्त तीन राज्यों पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश में उसकी सरकारें हैं और महाराष्ट्र व झारखंड में वह सहयोगी दल के रूप में सत्ता में है। लेकिन हकीकत यह है कि उसका जनाधार खिसकता जा रहा है।

दिनोंदिन कमजोर पड़ती इस स्थिति को लेकर कांग्रेस में मंथन की बात तो होती रही, लेकिन हुआ कुछ नहीं। बल्कि समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। जिन वरिष्ठ नेताओं के कंधों पर पार्टी को आगे ले जाने का दारोमदार था, वही अब पार्टी की जड़ें कमजोर होने, उसका कायाकल्प करने और मजबूत नेतृत्त्व जैसे सवाल उठा रहे हैं। इन सबका नतीजा विधानसभा चुनावों में सामने आ गया। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया।

पिछली बार जहां पार्टी ने चौवालीस सीटें जीती थीं, इस बार एक भी सीट नहीं मिली। असम में पिछली बार छब्बीस सीटें मिली थीं, इस बार तीन सीटों का इजाफा हो पाया। पुदुचेरी में पंद्रह से दो पर आ गई। तमिलनाडु में नौ सीटें बढ़ीं, वह भी द्रमुक के सहारे। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि देश पर दशकों तक राज करने वाली पार्टी की आखिर ऐसी दुर्गति क्यों हो रही है। यह सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि अगर पार्टी का ग्राफ इसी तरह नीचे जाता रहा तो आने वाले वक्त में कहीं यह देश के राजनीतिक नक्शे से साफ न हो जाए।

कांग्रेस की चुनौतियां कम नहीं हैं। इसे पार्टी अध्यक्ष भी बखूबी समझ रही हैं। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब क्यों रहा, इस पर विचार करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने एक समूह बनाने की बात कही है। उनका यह कहना कि अब चीजों को दुरुस्त करना होगा, इस बात की स्वीकारोक्ति है कि पार्टी की हालत खस्ता है। अब भी ध्यान नहीं दिया तो इसे रसातल में जाने से कोई नहीं बचा पाएगा। 2022 और 2023 में विधानसभा चुनाव 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अगर अब आंखें नहीं खोलीं और संगठन को मजबूत नहीं किया तो इस बार की हार से भी ज्यादा बुरे नतीजे देखने को मिल सकते हैं। इसलिए यह मौका है कि इस बार के नतीजों को सबक के रूप में लिया जाए और भविष्य की तैयारी की जाए।

इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि कांग्रेस अंदरूनी संकटों से जूझ रही है। पार्टी की कमान किस दूरदर्शी नेता को सौंपी जाए, इसे लेकर लंबे समय से ऊहापोह बना हुआ है। पार्टी कार्यकर्ताओं पर तो इसका असर पड़ ही रहा है, साथ ही उन लोगों पर भी जो अभी भी कांग्रेस को सत्ता के नए विकल्प के रूप में देखते हैं। इससे जनता में यह संदेश जा रहा है कि जो पार्टी अपने अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर पा रही, वह सत्ता क्या संभालेंगी। पिछले साल पंद्रह अगस्त को पार्टी के तेईस वरिष्ठ नेताओं ने संगठन चुनाव करवाने और मजबूत व सक्रिय नेतृत्व के लिए कांग्रेस अध्यक्ष को चिट्ठी भी लिखी थी।

लेकिन पार्टी को नया अध्यक्ष नहीं मिल पाया। अब महामारी संकट के कारण पार्टी अध्यक्ष का जून में होने वाला चुनाव फिलहाल टल गया है। और सबसे दुखद तो यह कि पार्टी कैसे चले, कौन अध्यक्ष हो, इसे लेकर वरिष्ठ नेताओं के एक बड़े खेमे की सोच अलग है। जाहिर है, पार्टी का अंदरूनी संकट कहीं ज्यादा गंभीर हैं और नेतृत्व का मुद्दा इसके केंद्र में है। ऐसे में कांग्रेस कैसे पार पाती है, यह देखने के लिए और इंतजार करना होगा।

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