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भारी वित्तीय संकट से गुजर रही कांग्रेस, मदद के लिए कई राज्यों को भेजे SOS संदेश

पार्टी की सबसे बड़ी चिंता पांच राज्यों केरल, असम, बंगाल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी के चुनावों को लेकर है। कांग्रेस के एक सीनियर लीडर का कहना है कि इन राज्यों में चुनाव अच्छे से लड़ना है तो पैसे का इंतजाम तो करना ही होगा।

sonia & rahul gandhiकांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (फोटो सोर्सः ट्विटरः@ManikshaG)

अंग्रेजी शासन के खिलाफ मजबूती से डटी रहने वाली कांग्रेस के पैर आजाद भारत में डगमगाने लगे हैं। दरअसल, पार्टी गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है। अभी के दौर में उन राज्यों से मदद की आस है जहां पार्टी की सरकार चल रही है। इन सभी राज्यों को SOS संदेश भेजे जा चुके हैं। AICC के रणनीतिकार पंजाब, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के मजबूत नेताओं से खुद मुलाकात करके भी मदद को कह रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि पिछले माह AICC में संगठन को मजबूत करने के नाम पर बुलाई गई बैठक में कुछ टॉप लीडर्स को इस तरह की कवायद करते हुए देखा गया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हिदायतों पर वो पंजाब और महाराष्ट्र जैसे सूबे के नेताओं को गंभीर वित्तीय संकट से वाकिफ करा रहे थे। पार्टी की सबसे बड़ी चिंता पांच राज्यों केरल, असम, बंगाल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी के चुनावों को लेकर है। कांग्रेस के एक सीनियर लीडर का कहना है कि इन राज्यों में चुनाव अच्छे से लड़ना है तो पैसे का इंतजाम तो करना ही होगा। उनका कहना है कि फिलहाल फंडिंग सबसे बड़ा मुद्दा है।

सूत्रों का कहना है कि बीजेपी के हाथ 2014 में सत्ता गंवाने के बाद कांग्रेस का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है। यही बड़ी वजह है वित्तीय संकट की। उद्योगपति पार्टी को मदद दे तो रहे हैं, लेकिन बीजेपी की तुलना में काफी कम। राज्यों में भी कांग्रेस की स्थिति ज्यादा ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़, राजस्थान और पंजाब में ही उसकी सरकारें हैं। झारखंड और महाराष्ट्र में वो छोटे भाई की भूमिका में साझीदार है। पुड्डुचेरी का कोई ज्यादा राजनीतिक महत्व नहीं है। सूत्रों का कहना है कि अगर बात नहीं बनी तो पार्टी को अपने चुने हुए एमपी-एमएलए से भी मदद की गुहार करनी पड़ेगी। पार्टी के सामने चुनावी खर्चे तो हैं ही। राजधानी में AICC की नई बिल्डिंग का काम भी चल रहा है।

एक पदाधिकारी ने बताया कि कांग्रेस की ओर से खर्चों को कम करने और मदद के लिए आगे आने की अपील की गई है। नगदी की समस्या से जूझ रही पार्टी को प्रत्याशियों की मदद के लिये अब जनता के चंदे के पैसा का सहारा लेना पड़ सकता है। उनका कहना है कि बड़े बिजनेस घराने अब कांग्रेस से बीजेपी की ओर पलायन कर गए हैं। चुनाव में खर्चे बढ़ते जा रहे है। 2019 को देखते हुये सोशल मीडिया की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता है ऐसे में अब कांग्रेस बदली हुई परिस्थिति में कितना प्रबंधन करती है ये देखने वाली बात होगी।

फंडिंग की स्थिति देखी जाए तो बीजेपी टॉप पर है। उसे कुल 742.15 करोड़ का चंदा मिला, जबकि कांग्रेस को 148.58 करोड़ रुपए ही मिल सके। इसमें उद्योगजगत से मिलने वाली रकम भी शामिल है। एआईटीसी को 44.26, एनसीपी को 12.05 और सीपीएम को 3.03 करोड़ रुपए चंदे के तौर पर मिले हैं। जो बड़े डोनर राजनीतिक दलों को चंदा दे रहे हैं, उनमें प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट सबसे ऊपर है। इसनें पिछले साल के दौरान 455.15 करोड़ रुपए का चंदा दिया। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट की चंदे में भागीदारी 102.25 करोड़ रही है। 2012 से लेकर 2019 तक की स्थिति देखी जाए तो साफ है कि कांग्रेस चंदे के मामले में बीजेपी से बहुत पीछे छूट चुकी है। इस दौरान बीजेपी को औद्योगिक घरानों से 2319.49 करोड़ रुपए मिले, जबकि कांग्रेस को इस दौरान 376.02 करोड़ रुपए की मदद कॉरपोरेट से मिल सकी।

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