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दिल्ली- हताश नेता कांग्रेस को कर रहे निराश

कांग्रेस ज्यादातर समय सत्ता में नही है। उसके नेता बगैर सत्ता ज्यादा दिन तक संघर्ष नहीं झेल सकते हैं।

Author नई दिल्ली | November 9, 2017 2:19 AM
दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन। (फोटो-पीटीआई)

दिखाने के लिए कांग्रेस ने पिछले दिनों कांग्रेस से आम आदमी पार्टी (आप) में शामिल हुए कांग्रेस के टिकट पर तिमारपुर से दो बार विधायक बने और अभी कांग्रेस के जिला अध्यक्ष सुरेंद्र पाल सिंह बिट्टू के मामले को ज्यादा गंभीर नहीं बनने दिया। दिल्ली कांग्रेस के नेता दिल्ली में लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बयानों पर भी चुप हैं। जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर हर चुनाव में वोट औसत बढ़ने के दावे पर टिप्पणी की और जिन अफसरों के बूते उन्होंने दिल्ली में काफी काम किए, उनपर आम आदमी पार्टी सरकार के हमले के खिलाफ खुलकर मैदान में आ गई। सालों दिल्ली में नंबर एक पार्टी रही कांग्रेस को ज्यादा चुनौती अपनों से है। जो पार्टी में उपेक्षित हैं या जो लगातार पराजय से हताश हैं। कांग्रेस ज्यादातर समय सत्ता में नही है। उसके नेता बगैर सत्ता ज्यादा दिन तक संघर्ष नहीं झेल सकते हैं। वास्तव में बिट्टू कोई जनाधार वाले नेता भी नहीं थे। वे तो सिख हैं और तिमारपुर के ‘आप’ विधायक पंकज पुष्कर पार्टी के बागी हैं, इसलिए अगले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से टिकट पाने के भरोसे पार्टी में शामिल हुए। मूल रूप से कांग्रेस के ही वोट पर राज कर रही ‘आप’ में काफी दिनों बाद कोई कांग्रेस का पूर्व विधायक भाजपा के बजाए आप में शामिल हुआ। कांग्रेस के कई नेता बिट्टू के विधायक बनने से पहले और बाद के आर्थिक हैसियत का ब्योरा देते हैं। यह सवाल इसलिए ज्यादा अहम नहीं है क्योंकि आप ने तो कांग्रेस और भाजपा से नकारे हुए नेताओं को ही टिकट देकर दिल्ली में नया इतिहास बनाया। पंजाब विधानसभा और दिल्ली नगर निगम चुनाव हारने के बाद ‘आप’ में हुई भारी बगावत ने पार्टी के चेहरा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को चुप रहने के लिए मजबूर कर दिया था। बवाना विधानसभा उपचुनाव की जीत के बाद केजरीवाल का आत्मविश्वास लौटने लगा। उन्हें लग गया है कि पूर्वांचल के प्रवासियों और अल्पसंख्यकों का ठोस समर्थन उन्हें दिल्ली की मुख्य लड़ाई में बनाए रखेगा। इसलिए उन्होंने अपने शुरू के साथी कुमार विश्वास से ज्यादा ओखला के विधायक अमानतुल्ला पर भरोसा दिखाया। विश्वास के न चाहते हुए उनका खुलेयाम विरोध करने वाले अमानतुल्ला की पार्टी में वापसी हुई।

प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन जिस तरह से दिन-रात करके पार्टी को फिर से दिल्ली की मुख्य पार्टी बनाने में लगे हैं उसमें कांग्रेस की गुटबाजी से पलीता लग रहा है। दीक्षित आज खुद अपनी पार्टी में हाशिए पर हैं। हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस के वोटों पर राज कर रही आम आदमी पार्टी (आप) में भारी बगावत और कई चुनावों में पराजय के बावजूद कांग्रेस अपनी जगह वापस नहीं ले पा रही है। कांग्रेस के जितने बड़े नेता पार्टी के कार्यक्रमों में दिखते हैं उससे ज्यादा घर बैठ गए हैं। कई बड़े नेता तो नाराज होकर भाजपा में चले गए। उनमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली, पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष बरखा सिंह, अंबरीश गौतम आदि के नाम प्रमुख हैं। उनसे पहले पूर्व सांसद कृष्णा तीरथ, पूर्व विधायक एससी वत्स आदि भाजपा में शामिल हुए थे। पूर्व मंत्री अशोक कुमार वालिया पार्टी से अलग होते-होते रह गए। सबसे अजूबा तो शीला दीक्षित और उनके सांसद रहे पुत्र संदीप दीक्षित के साथ हुआ। कांग्रेस की सरकार जाने के साथ ही वे दिल्ली की राजनीति से किनारा किए जाने लगे। शीला दीक्षित पूर्वी दिल्ली का लोकसभा चुनाव हारने के बाद प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं। कांग्रेस ने 1998 का विधानसभा चुनाव उनकी अगुआई में लड़ा। चुनाव जीतने और मुख्यमंत्री बनने के काफी दिनों बाद तक उन्हें बाहरी बताकर दिल्ली के कांग्रेस नेता उन्हें हटाने की मुहिम चलाते रहे। उनमें वे नेता भी शामिल थे जिनके प्रयास से वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हुई थीं। हालात ऐसे बन गए कि उन्होंने दिल्ली की राजनीति में हाई कमान के बूते नए नेता खड़े किए। दीक्षित के तीसरे कार्यकाल में दोस्त से ज्यादा दुश्मन बने।

आरोप लगे कि उन्होंने भाजपा के वोट विभाजित करने के लिए अरविंद केजरीवाल की अपने पुत्र के माध्यम से मदद की जो बिजली पानी के मुद्दे पर कांग्रेस के वोट बैंक को ही हड़प गए। 2013 का चुनाव हारने के बाद से कांग्रेस में शीला दीक्षित की भूमिका कम होती गई। उत्तर प्रदेश के चुनाव में जब कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री की उम्मीदवार बनाया तो दिल्ली के नेता उनकी दिल्ली से विदाई पर खुश हुए। 2015 के विधानसभा चुनाव में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। पार्टी नेतृत्व ने सम्मान देने के लिए उन्हें हिमाचल प्रदेश चुनाव के स्टार प्रचारकों में शामिल किया।विडंबना यह है कि कांग्रेस शीला सरकार की उपलब्धियों को तो प्रचारित करती है लेकिन दिल्ली कांग्रेस में उनके लिए कोई जगह नहीं दिखती है। वे तो किसी और पार्टी में नहीं जाने वाली हैं लेकिन कांग्रेस में उपेक्षित या हताश कांग्रेस नेता बिट्टू की तरह अपनी जगह बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। कांग्रेस और भाजपा के तो वोटर अलग-थलग माने जाते हैं लेकिन कांग्रेस के ही ज्यादातर वोटर ‘आप’ के साथ जुड़ गए हैं। कांग्रेस के लिए खतरा इसलिए भी बड़ा है कि उसके वोटरों के बाद नेता भी ‘आप’ के साथ जुड़ते चले गए तो कांग्रेस को फिर से पुरानी हैसियत में लाना कठिन होता जाएगा। कई चुनावों ने तो उसे पहले ही काफी कमजोर बना दिया है।

 

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