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‘अफसरों के वेतन’ पर केंद्र और केजरीवाल सरकार में तकरार के आसार

दिल्ली की आम आदमी पार्टी(आप) की सरकार ने दानिक्स अधिकारियों(केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रादेशिक सेवा के अधिकारी) के वेतनमान में बढ़ोतरी करने का फैसला..

Author August 8, 2015 8:30 PM

दिल्ली की आम आदमी पार्टी(आप) की सरकार ने दानिक्स अधिकारियों(केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रादेशिक सेवा के अधिकारी) के वेतनमान में बढ़ोतरी करने का फैसला लेकर एक एक और विवाद को शुरू कर दिया है। दिल्ली भी विधान सभा होने के बावजूद केन्द्र शासित प्रदेश है और इसका कोई कैडर नहीं है। दिल्ली में काम करने वाले न केवल आईएएस अधिकारी बल्कि दानिक्स या दूसरे अधिकारी भी केन्द्रीय सेवा के कर्मचारी हैं उनका कैडर कंट्रोल केन्द्रीय गृह मंत्रालय से होता है। दिल्ली सरकार उनकी सेवा शर्त्तों में अपने से कोई बदलाव नहीं कर सकती है। वह केवल केन्द्र सरकार या केन्द्रीय वेतन आयोग को सुझाव भर दे सकती है।

जिस तरह से दानिक्स अधिकारियों को खुश करने के लिए शुक्रवार को दिल्ली मंत्रिमंडल की बैठक करके नौकरी के 13वें, 18वें और 21वें साल पर समयवद्ध वेतन मान देने और 21 साल पूरे होने पर चौथा वेतनमान देने का फैसला लिया उसी तरह उत्साह में भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री रहे साहिब सिंह ने वेतन आयोग के दानिक्स के शुरूवाती वेतनमान आईएएस के बराबर करने की सिफारिश को लागू करने की घोषणा कर दी।केन्द्र सरकार को यह इतना नागवार गुजरा कि उसने 24 घंटे में सोहिब सिंह से फैसला वापस करवाया। सरकार ने आयोग की सिफारिशें नहीं मानी।

जिन सवालों के आधार पर दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने फैसला लिया वह गलत नहीं हैं। देश भर में करीब चार सौ दानिक्स अधिकारी हैं उनमें दिल्ली मेंकरीब तीन सौ तैनात हैं। दिल्ली में आईएएस के करीब 70 पद हैं और सौ आईएएस तैनात हैं। दानिक्स सेवा के अधिकारियों की एक बड़ी पीड़ा यह है कि जिन पदों पर जबरन आईएएस तैनात हैं अगर उन्हें कैडर पद घोषित कर दिया जाए तो कई दानिक्य आईएएस बन जाएंगे।

दूसरी बड़ी पीड़ा है कि चौथा वेतनमान न होने पर सालों अधिकारी को एक ही वेतन मान पर काम करना पड़ता है । दिल्ली मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जारी बयान में कई राज्यों का उदाहरण देकर चौथा वेतनमान देने की घोषणा की गई है।वेतन न बढ़ने या कोई अतिरिक्त आर्थिक भत्ता आदि के न मिलने से अधिकारियों में काम के प्रति उत्साह खत्म हो जाता है। जिस तरह दास सेवा के अधिकारियों को लगता है कि दानिक्स सेवा के अधिकारी उनके पदों पर जमे हुए हैं उसी तरह दानिक्स सेवा के अधिकारियों को लगता है कि आईएएस उनके पदों पर बैठे हुए हैं जिससे उनका रास्ता रूका हुआ है।

वैसे दानिक्स को आईएएस बनाते समय नौ साल पहले की वरिष्टता दी जाती है लेकिन यह सत्य है कि 26-27 साल में उनका आईएएस बनने का नंबर आता है। कई अधिकारी तो केवल इसलिए आईएएस नहीं बन पाते कि तब तक उनकी उम्र ज्यादा हो चुकि होती है। यह भी सही है कि कर्नाटक, तमिलनाडु,हरियाणा और पंजाब आदि में प्रादेशिक सेवा के अधिकारी आठ-दस साल में आईएएस बन जाते हैं लेकिन दिल्ली ही नहीं ज्यादातर राज्यों में प्रादेशिक सेवा के अधिकारियों के आईएएस बनने में 20 साल से ज्यादा लगते हैं। औसत अधिकारी 30-32 साल की नौकरी कर पाते हैं। देश भर उनका तबादला केन्द्र शासित प्रदेशों में होता है और जब वे थक जाते हैं तब उनका प्रमोशन आईएएस में होता है।

लेकिन समस्या यह है कि दिल्ली सरकार अपने अधीन काम करने वाले अधिकारियों के वेतन और सेवाशर्त्तों के बारे में कोई भी फासला कर ही नहीं सकती है। दिल्ली सरकार के आबकारी आयुक्त रहे एके सिंह ने कहा कि समस्या यही है कि अधिकारी काम तो दिल्ली सरकार के साथ करते हैं लेकिन उनकी नियुक्ति, तरक्की, तबादला आदि में दिल्ली सरकार की ज्यादा भूमिका नहीं है। वेतनमान और सेवाशर्त्तों तो तो दिल्ली सरकार की कोई भूमिका ही नहीं है। दिल्ली सरकार केवल सिफारिश भर कर सकती है। दिल्ली के जो हालात बन गए हैं उसमें संविधान में दिल्ली का शासक कहे जाने वाले उप राज्यपाल से दिल्ली सरकार के संबंध खराब हैं।

दिल्ली पुलिस से खुलेयाम विवाद है। एक के बाद एक आला अधिकारियों के खिलाफ कारवाई और टिप्पणी करके दिल्ली सरकार ज्यादातर आईएएस या आला अधिकारियों को नाराज कर चुकि है। वैसे सरकार के लपेटे में कई दानिक्स भी आ चुके हैं। कहा जा रहा है कि सारे काम तो दानिक्स करते हैं अगर वे सरकार के साथ हो गए तो आईएएस उनका ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।

दानिक्स ज्यादातर दिल्ली रहते हैं। कई अफसरों ने यह समझाया होगा कि बडी कुर्सी के चक्कर में तो आईएएस केन्द्र सरकार के चक्कर ज्यादा लगाते हैं , ऐसे में अगर दानिक्स खुश हो गए तो सरकार का कोई काम नहीं रूक सकता है। लेकिन सवाल यह है कि सरकार नियम के खिलाफ काम कैसे कर सकती है। जब अधिकारी ही केन्द्र सरकार के अधीन हैं तो राज्य सरकार उनकी सेवाशर्त्तोंऔर वेतनमान का फैसला कैसे कर सकती है।

यही गलती 1986 में दिल्ली के मुख्यमंत्री बने साहिब सिंह ने की थी तो उन्हें अपने फैसले को 24 घंटे में पलटना पड़ा था। उन्होंने तो वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की थी, जिसे केन्द्र सरकार ने नहीं माना। केजरीवाल सरकार तो पूरा ही बदलाव करने का फैसला ले चुकि है। इस मुद्दे पर एक और विवाद शुरू होना तय माना जा रहा है।

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