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सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को दरकिनार करते हुए दिल्ली सरकार ने किया विज्ञापनों पर करोड़ों का खर्च

रिर्पोट के मुताबिक, 7 जून 2007 को दिल्ली सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसके तहत विज्ञापन जारी करने का अधिकार उसकी तय दरों के मुताबिक डीआइपी को दिया गया।

Author नई दिल्ली | Updated: March 11, 2017 2:54 AM
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भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिर्पोट के मुताबिक, दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करके करोड़ों रुपए के विज्ञापन जारी किए। इसके साथ ही दिल्ली सरकार ने करोड़ों रुपए के विज्ञापन अन्य राज्यों में खर्च किए हैं। कैग की यह रिर्पोट शुक्रवार को दिल्ली विधानसभा में पेश की गई। इस रिर्पोट में दिल्ली सरकार के कई विभागों के कामकाज के तरीकों पर सवाल खड़े किए गए हैं। कई विभागोे ने तो नियमों का उल्लंघन करके सरकारी धन का इस्तेमाल किया है। इसी तरह का एक विभाग दिल्ली सरकार का सूचना और प्रचार विभाग (डीआइपी) है, जो सरकार की नीतियों को विभिन्न माध्यमों के जरिए प्रचारित करता है।
रिर्पोट के मुताबिक, 7 जून 2007 को दिल्ली सरकार ने एक अधिसूचना जारी की जिसके तहत विज्ञापन जारी करने का अधिकार उसकी तय दरों के मुताबिक डीआइपी को दिया गया। वाणिज्य रेट पर विज्ञापन जारी करने का अधिकार मुख्यमंत्री को दिया गया। मुख्यमंत्री की ओर से भी किए गए इस तरह के फैसलों में वित्त विभाग की अनुमति आवश्यक रखी गई है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद 30 मार्च 2015 को डीआइपी ने निर्देश जारी कर डिजाइनों को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री को प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया। जून 2015 में दिल्ली सरकार ने ‘शब्दार्थ’ नामक एक सोसायटी की स्थापना की, जो एक विज्ञापन एजंसी बनी और सभी सरकारी विज्ञापनों को उसके माध्यम से ही विज्ञापन जारी करने की जिम्मेदारी दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई 2015 के फैसले में किसी निहित सार्वजनिक हित के बिना विज्ञापन के मनमाने ढंग से उपयोग को रोकने के लिए सरकारी विज्ञापनों के दिशानिर्देश जारी किए। इसके तहत पांच सिद्धांतों को पारित किया गया, जिसके अनुसार विज्ञापन सरकारी दायित्वों से संबंधित होने चाहिए, विज्ञापन सामग्री विषयपरक और साफ होनी चाहिए, विज्ञापन सामग्री सत्तारूढ़ दल के हितों को बढ़ावा देने वाली नहीं हो, विज्ञापन अभियान न्यायोचित होना चाहिए और सरकारी विज्ञापन को कानूनी जरूरतों और वित्तीय नियमनों और प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए। डीआइपी ने अपनी वेबसाइट में सुप्रीम कोर्ट के इन दिशानिर्देशों को अपलोड किया और 3 अप्रैल 2016 को दिल्ली सरकार के सभी विभागों ने एक परिपत्र भी जारी किया है।

कैग ने 1 अप्रैल 2013 से मार्च 2016 की अवधि के दौरान प्रसारित किए गए विज्ञापनों के संबंध में डीआइपी के कागजों की जांच की। सीएजी ने दिल्ली जलबोर्ड और पांच अन्य विभागों की ओर से जारी विज्ञापनों की जांच की। साल 2013 से 15 की अवधि के दौरान डीआइपी ने विज्ञापनों पर व्यय अन्य प्रभार शीर्ष के तहत आबंटित बजट जो कि 2013-14 में 29.66 करोड़ रुपए और 2014-15 में 20.23 करोड़ था, में से पूरा किया गया। वह विज्ञापन और शीर्ष के तहत कोई आवंटन नहीं था। 2015-16 के बजट के लिए डीआइपी ने 26.90 करोड़ के आबंटन का प्रस्ताव रखा, जिसमें अन्य प्रभारों के लिए 20 करोड़ रुपए और शेष वेतन और अन्य आवर्ती व्यय शामिल थे।

जबकि डीआइपी को विज्ञापन और प्रचार के लिए 500 करोड़ रुपए और अन्य प्रभारों शीर्ष के तहत 22 करोड़ रुपए, कुल मिलाकर 522 करोड़ रुपए आबंटित किए गए। बाद में ये संशोधित अनुमानों में घटाकर 100 करोड़ रुपए कर दिया गया है। 2013-16 के दौरान कैग के सामने आया कि डीआइपी की ओर से 81.23 करोड़ के व्यय के अलावा 2015-16 में प्रसारित किए गए विज्ञापनों के लिए 2016-17 में 20.23 करोड़ की राशि का भुगतान किया गया, जो कानून से परे हुए विज्ञापनों पर खर्च2015-16 के प्रकाशित विज्ञापनों के कुल खर्च को 101.46 करोड़ पर ले आया। डीआइपी ने लेखा परीक्षक को सूचित किया कि 2015-16 के दौरान प्रसारित किए गए विज्ञापनों के संबंध में करीब 12.75 करोड़ की देयता भी थी।
डीआइपी ने सीएजी को वचनबद्ध देयता के ब्योरे को उपलब्ध नहीं करवाया जबकि इसके लिए उसे अनुरोध किया गया। कैग ने कहा कि 33.40 करोड़ रुपए के खर्च का 85 फीसद से अधिक हिस्सा दिल्ली के बाहर जारी विज्ञापनों से संबंधित एक विशेष प्रचार अभियान पर खर्च किया गया, जो दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी के बाहर था। अरविंद केजरीवाल सरकार ने 2015-16 के बजट में विज्ञापन और प्रचार पर 522 करोड़ रुपए आबंटित किए थे, जिसे बाद में संशोधित करके 134 करोड़ रुपए किया गया था। अपने पहले साल में आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली के बाहर विज्ञापन जारी करने में 29 करोड़ रुपए खर्च किए, जो उसकी जिम्मेदारी के बाहर था। वहीं 24 करोड़ रुपए का दिल्ली सरकार द्वारा विज्ञापन जारी किया जाना वित्तीय औचित्य और सुप्रीम कोर्ट के नियमनों का उल्लंघन है।
कई मौके पर सरकार के काम को झाड़ू चुनाव निशान और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नाम का इस्तेमाल करके आप की उपलब्धियों के तौर पर पेश किया गया। विज्ञापनों और प्रचार अभियानों पर खर्च किए गए 24.29 करोड़ रुपए वित्तीय औचित्य के आम तौर पर स्वीकार्य सिद्धांतों या सामग्री नियमन पर उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं हैं। 33.40 करोड़ रुपए के खर्च का 85 फीसद से अधिक हिस्सा दिल्ली के बाहर जारी विज्ञापनों से संबंधित एक विशेष प्रचार अभियान पर खर्च किया गया, जो दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी के बाहर था।

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