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लापरवाही की आग के बाद बवाना कांड पीड़ितों की आंखों में बेबसी का पानी

दिल्ली का भीमराव आंबेडकर अस्पताल रविवार को बवाना कांड पीड़ितों के बेबस आंसुओं का गवाह बना।

Author नई दिल्ली | January 22, 2018 4:18 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

दिल्ली का भीमराव आंबेडकर अस्पताल रविवार को बवाना कांड पीड़ितों के बेबस आंसुओं का गवाह बना। पटाखा कारखाने में लगी आग में मारे गए मजदूरों के शव वाल्मीकि अस्पताल से पोस्टमार्टम के लिए इस अस्पताल में भेजे गए थे। एक के बाद एक शव लेने पहुंच रहे परिजनों का बुरा हाल था, कौन किसे दिलासा दे, कौन किसे समझाए। दोपहर बाद तक कुल 14 शवों की शिनाख्त हो पाई थी। तीन शवों की पहचान नहीं हो पाई थी।  हादसे में मारे गए लोगों की पहचान रीता (18), मदीना (55), बेबी देवी (40), सोनम (23), रज्जो(55), सूरज (20), रविकांत (18), सुखदा (42), खुसना (47), सोनी (21), रोहित (19), संजीत (19),अजीत रंजन (22) और अफसाना (35) के रूप में हुई है। इन शवों को घर पहुंचाने के लिए दिल्ली सरकार की कैट्स एंबुलेंस की कतारें लगी हुई थीं। हादसे में मारे गए अपनों की तलाश में भटकते परिजन यहां शवों की पहचान के साथ ही रो-रोकर बेसुध हो रहे थे। किसी की बेटी इस आग की भेंट चढ़ी तो किसी के सिर से मां का साया उठ गया और किसी के घर का अकेला कमाने वाला चला गया था। अस्पताल में जमा हुए लोगों ने बताया कि बवाना में काम कर रहे 50 फीसद मजदूर बिहार और 50 फीसद उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। कुछ ही मजदूर यहां परिवारों के साथ रहते थे। बाकी के परिजन बाहर रहते हैं।

किसी-किसी मजदूर के घरवालों को पता भी नहीं था कि उनके परिजन जहां काम करते थे वहां पटाखे का काम होता था। अस्पताल पहुंचे इंडियन फेडरेशन आॅफ ट्रेड यूनियन के राजेश ने बताया कि इलाके में काम कर रहे तमाम मजदूरों ने बताया है कि कम से कम 37 लोगों के आग की चपेट में आने की आश्ांका थी। इसमें कारखाने के मालिक का एक सहयोगी भी शामिल है। वह भी घटना के समय अंदर ही बताया जा रहा था। उसकी गाड़ी घटनास्थल के बाहर ही खड़ी थी। इसके अलावा कारखाने के पास चाय बेचने वाले एक लड़के ने भी बताया कि वह शाम को 35 चाय अंदर देकर आया था। हालांकि इसके बाद वह लड़का दुकान बंद करके वहां से चला गया। उसकी दुकान अब तक बंद है। राजेश ने बताया कि हादसे के बाद कारखाने के मजदूर भाग नहीं पाए क्योंकि इमारत पूरी तरह से बंद थी। दो-तीन खिड़कियां जरूर थीं लेकिन वह कभी नहीं खुलती थीं। लोहे के मुख्य द्वार पर भी ताला लगा था। यही हाल इलाके की ज्यादातर इमारतों का है। यहां जमा लोगों ने बताया कि कारखाने में पहले गत्ते और आटा पैक करने वाले थैले का काम होता था। फि र इसमें एक तारीख से पटाखे व रंगों का काम शुरू हुआ। हादसे वाली इमारत के बगल वाली इमारत एफ-82 में काम करने वाले एक मजदूर ने राजेश को बताया कि उसके यहां भी पटाखे का काम होता है। राजेश ने कहा कि अगर सरकार समय रहते उनकी बातों पर ध्यान देती तो यह हादसा नहीं हुआ होता। उन्होंने बताया कि इलाके में श्रम कानूनों का उल्लंघन व सुरक्षा उपायों की अनदेखी को लेकर उन लोगों ने शामनाथ मार्ग पर प्रदर्शन भी किया था, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। इस लापरवाही के लिए श्रम मंत्री गोपाल राय को इस्तीफा दे देना चाहिए।

 

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