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बवाना में प्लास्टिक कारखाने की आड़ में बन रहे थे पटाखे

कारखाने में काम करने वाले मजदूर विश्वनाथ साहू ने बताया कि कुछ महीने पहले इस इमारत में प्लास्टिक का बोरा बनाया जाता था।

Author नई दिल्ली | January 22, 2018 3:00 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

निर्भय कुमार पांडेय

बवाना औद्योगिक क्षेत्र स्थित एफ-83 में पटाखे के कारखाने में लगी आग की शुरुआती छानबीन में पुलिस को पता चला है कि यह कारखाना अवैध रूप से चलाया जा रहा था। हैरानी की बात यह है कि शनिवार को बवाना औद्योगिक क्षेत्र में साप्ताहिक अवकाश होने के कारण जहां अधिकतर कारखाने बंद थे वहीं इस कारखाने के मुख्य द्वार पर ताला लगा हुआ था और अंदर मजदूरों से काम कराया जा रहा था। आग लगने के समय तकरीबन 35 मजदूर यहां काम कर रहे थे, जिनमें ज्यादातर महिलाएं थीं। कारखाने में काम करने वाले मजदूर विश्वनाथ साहू ने बताया कि कुछ महीने पहले इस इमारत में प्लास्टिक का बोरा बनाया जाता था। शनिवार रात गिरफ्तार हुए कारखाने के मालिक मनोज जैन ने अपने जानकार के जरिए यह इमारत किराए पर ली थी। उसने बताया था कि यहां प्लास्टिक के खिलौने बनाए जाएंगे। किसी को शक न हो, इसलिए उसने बाहर प्लास्टिक का सामान भी रखा हुआ था। कारखाना शुरू होने के बाद पुलिस व लाइसेंस विभाग के अधिकारी जब कारखाने का मुआयना करने पहुंचे तो उन्हें आश्वासन दिया गया था कि यहां प्लास्टिक का सामान ही बनाया जाएगा।

पुलिस व प्रशासन की आंखों में धूल झोंक कर मनोज जैन कारखाने के अंदर पटाखे व बम बनवा रहा था, जिनका इस्तेमाल त्योहारों के दौरान किया जाता है। 26 जनवरी पर भी लोग पटाखों व बम का काफी इस्तेमाल करते हैं। यही कारण है कि मनोज जैन ने कारखाने में पटाखा बनवाने का काम शुरू किया था, ताकि वह कम समय में ज्यादा पैसे कमा सके। उसकी लापरवाही से ही शनिवार को कारखाने में आग लगने से 17 मजदूरों की मौत हो गई, जबकि दो मजदूर अब भी अस्पताल में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बवाना औद्योगिक क्षेत्र में ज्यादातर कारखाने ऐसे हैं, जिनके मुख्य द्वार पर ताला लटका होता है, लेकिन अंदर मजदूर काम कर रहे होते हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसी अनहोनी हो जाती है तो मजदूर ताला लगा होने की वजह से बाहर नहीं निकल पाते। रविवार को भी इस औद्योगिक क्षेत्र में बड़ी तादाद में कारखानों के बाहर ताला लगा हुआ था और अंदर मजदूर काम कर रहे थे। इन कारखानों में सहायक के रूप में ज्यादातर महिलाएं काम पर रखी जाती हैं। महिलाओं को आठ घंटे के हिसाब से सिर्फ छह-सात हजार रुपए महीने ही दिया जाता है। वहीं पुरुष मजदूरों को आठ हजार रुपए दिए जाते हैं। जिस पटाखा कारखाने में आग लगी थी। उसमें भी अधिकतर महिलाएं ही काम करती थीं और उनसे दो शिफ्ट में काम कराया जाता था।

बवाना चेंबर आॅफ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष प्रकाश चंद जैन का कहना है कि बवाना में बने कारखानों के मालिकों को समय-समय पर जागरूक किया जाता है। उन्हें सुरक्षा मानकों की जानकारी दी जाती है। उन्हें कर्मचारियों व मजदूरों की सुविधाओं के बारे में सुझाव भी दिए जाते हैं, लेकिन कुछ ही लोग इन पर अमल करते हैंैं। उन्होंने यह भी बताया कि यहां पर दलालों के जरिए कारखानों को किराए पर दिया जाता है। उसके बाद मालिक की भूमिका न के बराबर रह जाती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पटाखा व अन्य ज्वलनशील पदार्थ का कारखाना चलाने की अनुमति पूरे दिल्ली-एनसीआर में नहीं है तो बवाना में कैसे मिल सकती है। यह कारखाना अवैध रूप से चलाया जा रहा था, जिसकी जानकारी चेंबर के सदस्यों को नहीं थी।

 

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