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बवाना उपचुनाव: केजरीवाल सरकार के लिए नई परीक्षा, नाराज भाजपा नेता गुग्गन सिंह आप में शामिल

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर वैसे तो सबसे ज्यादा दलित हैं लेकिन बड़ी तादात में जाट और 26 गांवों की दूसरी जाति के लोग हैं।

Author नई दिल्ली | August 3, 2017 02:47 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

प्रचंड बहुमत से दिल्ली पर राज कर रही अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) के लिए 23 अगस्त को होने वाला बवाना (सुरक्षित) विधानसभा उपचुनाव एक और इम्तिहान साबित होने वाला है। बिना नियम बनाए गए आप के 20 विधायकों पर चुनाव रद्द होने की लटकी हुई तलवार के बीच ही यह चुनाव हो रहा है। एक के बाद एक कई चुनाव पराजित होने के बाद अपनों की बगावत और पार्टी की छवि पर होते चौतरफा हमले के बीच इस चुनाव का महत्व ज्यादा बढ़ गया है। भाजपा, आप और कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव मैदान में आ चुके हैं। तीनों दलों के नेता हरियाणा की सीमा से लगे इस गांव और अनधिकृत कॉलोनी बहुल सीट के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंके हुए हैं।
कांग्रेस ने अपने तीन बार के विधायक सुरेंद्र कुमार को फिर से चुनाव मैदान में उतारा है। वे लगातार 1998, 2003 और 2008 में इस सीट से विधायक रहे लेकिन 2013 और 2015 के चुनाव में वे न केवल चुनाव हारे बल्कि तीसरे नंबर पर रहे। 2013 में भाजपा के टिकट पर आप के मनोज कुमार को पराजित करके विधायक बने गुग्गन सिंह इस बार टिकट न मिलने पर भाजपा से बगावत करके आप में शामिल हो गए हैं। 2015 में गुग्गन सिंह को 50,023 वोट से पराजित करने वाले आप के वेद प्रकाश काफी समय पहले विधायकी और आप से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए, भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। बसपा से 2008 में इस सीट से चुनाव लड़ने वाले रामचंद्र को आप ने टिकट दिया है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित इस सीट पर वैसे तो सबसे ज्यादा दलित हैं लेकिन बड़ी तादात में जाट और 26 गांवों की दूसरी जाति के लोग हैं।

अनधिकृत कॉलोनी होने के कारण पूर्वांचल के प्रवासी भी इस सीट पर बड़ी तादात में हैं जिनपर पहले असर कांग्रेस का होता था। लेकिन पिछले तीन चुनावों में आप का असर दिखा और निगम चुनाव में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के प्रयास से कुछ भाजपा में भी जाता दिखा। दिल्ली में सरकार बनने के बाद अगर पंजाब भी आप जीत जाती तो वास्तव में यह पार्टी राष्ट्रीय बन जाती लेकिन सरकार बनने के साथ ही उसे झटका लगने लगा। 2015 के दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) छात्र संघ चुनाव आप ने पूरी तैयारी से लड़े लेकिन तीसरे नंबर पर आई। इतना ही नहीं 2016 के निगमों के 13 सीटों के उपचुनाव में भी कांग्रेस ने वापसी की। पंजाब चुनाव में पार्टी के लिए गलत संकेत ना जाए इस कोशिश में आप ने 2016 के डीयू छात्र संघ चुनाव ना लड़ना तय किया। अतिविश्वास से ही राजौरी गार्डन सीट से विधायक बने जनरैल सिंह को इस्तीफा दिलवाकर पंजाब से चुनाव लड़वाया गया। वे पंजाब से हारे और 13 अप्रैल को राजौरी गार्डन सीट के उपचुनाव में ना केवल आप पराजित हुई बल्कि उसके उम्मीदवार को दस हजार वोट मिले और उसकी जमानत तक जब्त हो गई। उपचुनाव में पूर्व विधायक दयानंद चंदीला की पुत्रवधू मीनाक्षी चंदीला के प्रत्याशी रहते कांग्रेस के मत के औसत में 21 फीसद उछाल के साथ यह 33 फीसद पर पहुंच गया। कांग्रेस के लिए निगम चुनाव में बड़ा सहारा मिला। माना जा रहा है कि अगर निगम चुनाव में कांग्रेस में बगावत नहीं होती तो कांग्रेस इससे बेहतर नतीजे लाती।

वोट का औसत बढ़े बिना भाजपा तीसरी बार निगम चुनाव जीती। उसे 36 फीसद वोट मिले। आप को निगम चुनाव में 2015 को विधानसभा चुनाव के करीब आधा 26 फीसद और कांग्रेस को 22 फीसद वोट मिले। माहौल अभी भी भाजपा के अनुकूल है ,वैसे उनके पुराने उम्मीदवार रहे गुग्गन सिंह के आप में जाने का भाजपा को कुछ नुकसान तो होगा ही। वैसे तो चुनाव प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी की अगुआई में लड़ा जा रहा है लेकिन रणनीति के तहत भाजपा ने पश्चिमी दिल्ली के सांसद और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह के पुत्र प्रवेश वर्मा को चुनाव का प्रभारी बनाया है। कांग्रेस की ओर से कमान खुद प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन के हाथ में हैं लेकिन इलाके में प्रभाव रखने वाले पूर्व सांसद सज्जन कुमार से लेकर दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री योगानंद शास्त्री तक चुनाव में सक्रिय हैं। खुद सुरेंद्र कुमार भी बड़े नेता माने जाते हैं। आप की ओर से भी बागडोर खुद पार्टी का चेहरा माने जाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हाथ में हैं। प्रदेश के संयोजक और दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय पूरी ताकत से चुनाव मैदान में डटे हुए हैं। चुनाव में दिल्ली सरकार और नगर निगमों के कामकाज को मुद्दा बनाया जा रहा है। कहने के लिए यह चुनाव भी राजौरी गार्डन जैसा एक सीट का उपचुनाव है लेकिन इसके नतीजों का असर दिल्ली की राजनीति पर होना तय है।

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