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समस्याओं से किनारा

कार्याकर्ताओं का मनाना है कि दिल्ली की जनता ने एक-दो बार नहीं, बल्कि तीन बार सत्ता सौंपी है पर गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत की समस्या कम नहीं हो रही।

दिल्ली की सत्ता पर काबिज पार्टी इन दिनों राजधानी की स्थानीय समस्याओं पर ध्यान कम और पार्टी विस्तार को एहमियत ज्यादा दे रही है। इसका असर कार्यकर्ताओं पर दिख रहा है। जमीनी स्तर पर काम करने वाला कार्यकर्ता हैरान है और उससे जवाब देते नहीं बन रहा। इसको लेकर दबी जुबान पार्टी मुख्यालय में आवाज भी उठने लगी है।

कार्याकर्ताओं का मनाना है कि दिल्ली की जनता ने एक-दो बार नहीं, बल्कि तीन बार सत्ता सौंपी है पर गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत की समस्या कम नहीं हो रही। अब दिल्लीवासियों में इसको लेकर पार्टी के प्रति आक्रोश भी दिखने लगा है। वहीं, बिजली की कटौती ने भी मुश्किलें बढ़ाई हैं। बेदिल ने किसी को कहते सुना, अभी दूसरे राज्यों में सियासी गर्मी में दिल्ली का मौसम गुलाबी दिख रहा है लेकिन यहां गर्मी की वजह से दिक्कत क्या-क्या है जब यह पता चले तो सारा मौसम गुम हो जाए।

खुल गई पोल

राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी इन दिनों सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ पोल-खोल अभियान चला रही है। इस अभियान में नेता इलाकों में जाते हैं और सत्ता पक्ष के नेताओं की पोल खोलते हंै। लेकिन यह दांव एक इलाके में उल्टा पड़ गया। दरअसल हुआ यूं कि बुरारी विधानसभा में वार्ड नंबर आठ की पार्षद अपने इलाके में घूम-घूमकर दिल्ली सरकार की पोल खोल रही थीं। जैसे ही नेताजी हनुमानपुरी पहुंचे यहां लोगों ने पोल खोलने आए नेताओं की ही परतें खोलना शुरू कर दी।

बेदिल को पता चला कि लोगों की बातें सुनकर तो साथ गए झंडा उठाने वाले अपना मुंह ही छिपाने लगे। लोगों ने साफ कह दिया कि उनको अपना मकान बनाने के लिए ‘चढ़ावा’ देना पड़ा, लेकिन नेता ने मदद नहीं की। यह सुनकर नेताजी बगले झांकने लगे। किसी ने ठीक ही कहा है अगर पार्टी नेता को पता होता कि इलाके में यूं पोल खुलेगी तो गली से कन्नी काटते देर नहीं लगती। कम से कम जवाब देने का पता होता को इलाके में गरीब जनता से घर बनवाने के नाम पर हो रही वसूली को तो रोक सकती थीं!

लटके काम

दिल्ली से सटे यूपी में नई सरकार के गठन के बाद ही जरूरी कामों को पूरा करने की चेतावनी जारी की गई। इस बीच यहां विकास के कार्यों से जुड़े विभाग के अधिकारियों के तबादले की आशंका भी बन रही है। चेतावनी और तबादलों के बीच सामंजस्य बनाकर कई कामों को पूरा करना अधिकारियों के लिए चुनौती है लेकिन सफाई और बुनियादी कामों के लिए कोई ठेकेदार कंपनी सामने आकर जिम्मा ही संभालना नहीं चाहती।

अब काम जल्दी शुरू करवाना है लेकिन काम की जिम्मेदारी लेने वाले ही नहीं मिल रहे। ऐसे में अधिकारियों की नींद उड़नी तय है। अधिकारी दिन रात इसी सोच में हैं कि या तो काम शुरू हो या फिर उनका तबादला जल्द हो जाए ताकि कम से कम फजीहत तो न हो। बेदिल को तो यहां तक पता चला है कि ठेकेदार कंपनियां भी अधिकारियों के तबादले के कारण नए अधिकारी से अपनी सेटिंग को लेकर आशंकित हैं और काम लेना नहीं चाहतीं। क्या पता कौन अधिकारी गले पड़े और उनकी गले की हड्डी बन जाए।

पूर्व होने का खौफ

पद और सम्मान लोग जीवन भर चाहते हैं। कुछ को ये कर्मों से मिलता है तो कुछ को जी हुजूरी से। जिनको जी हुजूरी से पद मिलता है वे उसे सावधि जमा करके रख लेना चाहते हैं। वे इससे दूर नहीं होना चाहते। अब दिल्ली नगर निगम का ही हाल देखिए। यहां दांव आजमाने के लिए भले ही टिकट कैसे भी मिला हो लेकिन माननीय बनने के लिए जमीन पर मेहनत करते दिख जाते हैं।

इसलिए सदन में कुर्सी पाने वाले इसे इतनी आसानी से जाने देना नहीं चाहते। दिल्ली में तीनों निगमों को मिलाकर एक कर दिया गया है। महापौर और पार्षदों के अधिकार शून्य हो गए हैं और उनसे तमाम सुविधाएं भी धीरे-धीरे वापस ली जा रही हैं। ऐसे में वह पूर्व हो गए इसको लेकर अभी माथापच्ची चल रही है। दरअसल, बेदिल ने किसी माननीय को कहते सुना कि भले ही उनसे लैपटाप ले लिया गया है लेकिन लैपटाप लेने भर से कोई पूर्व नहीं हो जाता। जब तक चुनाव नहीं तब तक वे पूर्व नहीं। अब अधिकार भले न रहें हों लेकिन कम से कम पार्षद में पूर्व लगाकर ठसक तो कम न करिए। यह सुनकर बेदिल ने अपना सिर पीट लिया।
बेदिल

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