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चुनाव के मद्देनजर अब भाजपा कर रही है विशेष पहल

मनोज मिश्र नई दिल्ली। अब भाजपा दिल्ली की अनधिकृत कालोनियों के मतदाताओं के बूते दिल्ली का चुनाव जीतने की जुगत में दोबारा मुख्य सचिव बनाए गए दीपक मोहन सपोलिया पर दांव लगाए हुई है। आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनते ही जिन अफसरों को अपने पद से हटाया गया था, उसमें सपोलिया सबसे पहले […]

मनोज मिश्र

नई दिल्ली। अब भाजपा दिल्ली की अनधिकृत कालोनियों के मतदाताओं के बूते दिल्ली का चुनाव जीतने की जुगत में दोबारा मुख्य सचिव बनाए गए दीपक मोहन सपोलिया पर दांव लगाए हुई है। आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार बनते ही जिन अफसरों को अपने पद से हटाया गया था, उसमें सपोलिया सबसे पहले बड़े अधिकारी थे। उन्हें वापस 27 अगस्त को मुख्य सचिव बनाने के पीछे एक मकसद तो आप समर्थक अफसरों को झटका देना था ही, अनधिकृत कालोनी का मुद्दा कांग्रेस और आप से छीनना भी था। तभी तो केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में पिछले दिनों हुई महत्त्वपूर्ण बैठक में में इस मुद्दे को शीर्ष प्राथमिकता देना तय किया गया। करीब महीने भर की कवायद के बाद भी कोई अधिकारी इस बारे यह दावा करने को तैयार नहीं है कि अनधिकृत कालोनी का मुद्दा कांग्रेस सरकार के दिनों से एक कदम आगे भी बढ़ा हो।

वास्तव में तो 1639 कालोनियों से जिन 895 कालोनियों को नियमित करने की विधिवत घोषणा हुई थी, आज तक उसकी भी औपचारिकता पूरी नहीं की जा सकी है। अगर काम के लिहाज से कहा जाए तो आसानी से वोट पाने की उम्मीद में सबसे ज्यादा काम इन्हीं कालोनियों में होता रहा है। समस्या यही है कि इन कालोनियों की बसावट इस तरह की है कि उसमें ज्यादा कुछ करने की संभावना ही नहीं है।

दिल्ली की आबादी का बड़ा हिस्सा अनधिकृत कालोनियों, पुनर्वास बस्तियां, झुग्गी-झोपड़ी बस्ती और दिल्ली के गांवों और गावों की विस्तारित आबादी का है। कायदे में दिल्ली के वैध इलाकों में रहने वालों से इन कालोनियों में रहने वालों की तादाद ज्यादा हो गई है। इतना ही नहीं, इन कालोनियों के लोग अपने मकान और दुकान को वैध बनवाने के नाम पर आसानी से राजनीतिक दलों के प्रभाव में आते रहे हैं। वैधानिक तरीके दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) या कोई सरकारी एजंसी गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिए मकान बना नहीं पाई तो लोगों ने भूमाफिया की शरण लेकर अपने मकान बनाए। निजी खेती की जमीन से लेकर सरकारी जमीन पर तक कालोनियां बसाई गईं। भू-माफिया, पुलिस, सरकारी महकमों के लोग और नेता मिल कर उसको बसाने से लेकर उसको नियमित करवाने का ठेका तक लेते हैं। इतना ही नहीं 2008 के विधान सभा चुनाव से पहले जिन 1218 कालोनियों को नियमित करने का अस्थाई प्रमाण पत्र दिया गया उसमें से अनेक फर्जी पाए गए। उनको उजागर करने वाले रामवीर सिंह बिधूड़ी के आरोप को पहले लोगों ने हल्के में लिया गया। बाद में जांच के बाद चार नहीं फर्जी 43 कालोनी का नाम सूची से हटाया गया। वरिष्ठ अधिकारी विजय देव ने विस्तार से जांच कर तो अरबों के भ्रष्टाचार का खुलासा किया लेकिन उस खुलासे के आधार पर किसी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की गई।
दिल्ली में काफी समय से इस तरह की कालोनियां आबाद होती रहीं। पहली बार 1971 में ऐसी 54 कालोनियों को नियमित किया गया। दोबारा 1977 में 607 कालोनियों की सूची बनी लेकिन वास्तव में 567 कालोनी ही नियमित हो पाई। 1993 में दिल्ली को विधानसभा दिलवाने के आंदोलन में लगे भाजपा नेता मदन लाल खुराना ने पहली बार अनधिकृत कालोनियों को नियमित करवाने का आंदोलन बड़े पैमाने पर चलवाए। उससे पहले कांग्रेस के ही नेता एच के एल भगत, सज्जन कुमार ,जगदीश टाईटलर और चौधरी प्रेम सिंह आदि यह मुद्दा जोर-शोर से उठाते रहे थे। 1993 में दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने पर खुराना ने मार्च 1993 के एरियल सर्वे के आधार पर 1071 कालोनियों को नियमित करने की घोषणा की। नियम-कानून बनते-बनते और कालोनियों का वास्तव में सत्यापन होते-होते पहसे खुराना गए फिर भाजपा की सरकार गई। अलबत्ता खुराना के बाद बने मुख्यमंत्री साहिब सिंह ने अदालत में खुद पेश होकर इन कालोनियों में बुनियादी चीजें उपलब्ध करवाने की मांग की जिसे हाई कोर्ट ने स्वीकार लिया। बाद में कांग्रेस सरकार के शहरी विकास मंत्री अशोक कुमार वालिया ने भी इसे दोहराया।

दावा चाहे जो करे लेकिन जिन कालोनियों को नियमित करने का काम एक तरह से पूरा हुआ उसमें बड़ी भूमिका अशोक वालिया की थी। उसे बाद में शहरी विकास मंत्री बने अरविंदर सिंह और राज कुमार चौहान ने आगे बढ़ाया। 1998 में कांग्रेस सरकार बनते-बनते 1071 की सूची बढ़ने लगी और वह 1639 तक पहुंच गई। सरकार की ओर से मुख्यसचिव ने अदालत में हलफनामा दिया कि 31 मार्च 2003 तक की बनीं उन कालोनियों को नियमित करने के प्रयास किए जाएंगे, जिनमें फरवरी 2007 तक आधे निर्माण हो चुके हैं। इस आधार के बावजूद 2008 के विधानसभा चुनाव के पहले जिन 1218 कालोनियों को अस्थाई प्रमाण पत्र दिए गए, जिनमें कोई निर्माण ही नहीं हुआ था। हंगामा होने के बाद एक-एक कालोनी का सर्वे करवाया गया उसमें पाया गया कि 43 कालोनी का वजूद ही नहीं है। 137 कालोनी में दस फीसद से कम आबादी है और 127 कालोनी 50 फीसद से कम बना हुआ है। केवल 1018 कालोनी विवाद रहित है। 1013 के विधान सभा चुनाव से पहले उनमें से 895 कालोनी को नियमित करने की घोषणा हुई। सरकारी आदेश में कहा गया कि नियमित होने वाली कालोनियों को 200 रुपए प्रति मीटर के हिसाब से विकास शुल्क देना होगा। जो कालोनी सरकारी जमीन पर बनी है वहां के लिए 575 रुपए प्रति वर्ग मीटर जुर्माना देना होगा। इतना ही नहीं निर्माण को वैध करवाने के लिए सर्किल रेट के हिसाब से भुगतान करने पर ही मालिकाना हक दिया जाएगा।

कुछ तो प्रक्रिया शुरू भी हुई । लेकिन 1013 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस पिछड़ गई और कांग्रेस के सहयोग से आप की सरकार बन गई। इतना ही नहीं बिना शुल्क नियमित करने के वायदे पर ज्यादातर अनधिकृत कालोनीवालों ने आप का समर्थन किया। बाकी कालोनियों का कौन कहे जिन्हें नियमित करने की घोषणा हुई थी उन्हीं का काम रुक गया। भाजपा के नेताओं को लगता है कि बिना वोट बैंक बढ़ाए दिल्ली में सरकार बनाने लायक समर्थन मिल ही नहीं सकता है। संयोग से इन कालोनियों में उस वर्ग के लोग भी बड़ी तादाद में रहते हैं जो अपने मूल राज्य में तो भाजपा को वोट करते हैं लेकिन दिल्ली में पहले कांग्रेस को हितैषी मान कर उन्हें वोट दिया फिर पिछले चुनाव में आप को। दिल्ली की नौकरशाही को जानने वालों को पता है कि मुख्य सचिव आसानी से जन उपयोगी फैसले नहीं ले पाते हैं। इस फैसले में तो लेकिन परंतु ही ज्यादा है इसलिए आसानी से राष्ट्रपति शासन में अनधिकृत कालोनियों की गाड़ी बढ़ेगी इसकी उम्मीद कम ही लग रही है।

कालोनियां तो विधिवत तो बसाई नहीं गई हैं। भूमाफिया ने तो प्लाट काटे जिसको जैसे मन हुआ या जिसके लिए जैसे संभव हुआ घर बनाया। न तो सड़क के लिए जगह छूटी और न सीवर आदि के लिए। हालात ऐसे हैं कि आज भी इनमें से आधी कालोनियों में ही पानी की लाइन डल पाई है बाकी में टैंकर से ही पानी की आपूर्ति हो रही है। तमाम अड़चने मौजूद हैं। कोई पक्की बाउंड्री नहीं है न ही सरकारी और निजी जमीन का इन कालोनियों में फासला है। इतना ही नहीं कालोनियों की सूची भी बढ़ने लगी है और उसके साथ कालोनियों में निर्माण भी हेरा-फेरी से होने लगे हैं। इस हालात में वैधानिक तरीके से किसी कालोनी को बिना कोई शुल्क या जुर्माना लिए नियमित करना मुख्य सचिव ही नही किसी भी नौकरशाह के लिए कठिन है। इसी के चलते ही बैठकों का दौर जारी रहने के बावजूद मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है। भले ही दिखाने के लिए पहले की तरह कोई घोषणा फिर हो जाए लेकिन ठोस काम होना कठिन ही लग रहा है।

 

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