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आप सरकार ने विधानसभा की विशेष बैठक बुलाई

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार उपराज्यपाल से अपने अधिकारों की लड़ाई में आसानी से हार मानती नहीं दिख रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से उपराज्यपाल के अधिकारों से संबंधित अधिसूचना...

Author Published on: May 24, 2015 8:33 AM

मनोज मिश्र

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार उपराज्यपाल से अपने अधिकारों की लड़ाई में आसानी से हार मानती नहीं दिख रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से उपराज्यपाल के अधिकारों से संबंधित अधिसूचना जारी होने के बाद दिल्ली सरकार ने 26-27 मई को विधानसभा की विशेष बैठक बुलाने का फैसला किया है। यह फैसला दिल्ली मंत्रिमंडल की शनिवार शाम हुई बैठक में लिया गया।

दिल्ली सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि बैठक में वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल और देश के पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम की इस विवाद पर दी गई कानूनी सलाह पर चर्चा होगी। बयान के मुताबिक मंत्रिमंडल ने यह भी तय किया है कि विधानसभा की बैठक को जरूरत के हिसाब से बढ़ाया भी जा सकता है।

दिल्ली के कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति के अधिकार पर उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच शुरू हुई अधिकारों की जंग में शुक्रवार शाम केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना ने सारे तबादलों के अधिकार उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में बता कर आग में घी डालने का काम किया। उसके बाद से इस विवाद में मर्यादाएं टूटने लगीं।

अधिसूचना की खबर सार्वजनिक होते ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्र की भाजपा सरकार से लेकर गृह मंत्रालय के अधिकारियों पर तरह-तरह के आरोप लगाए। उनकी बातों से लगा कि वे अधिसूचना को अदालत में चुनौती देंगे क्योंकि इसके बाद उनके पास सड़क पर आने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं। विधानसभा का विशेष सत्र भी उसी की कड़ी है।

साल 1993 में दिल्ली में विधानसभा बनने के बाद ही विधानसभा में दिल्ली को पूर्ण राज्य देने का प्रस्ताव पास किया गया। उसके बाद अनेक बार इसे दोहराया गया। इस प्रस्ताव के आधार पर पूर्ण राज्य मिलना होता तो कब का मिल चुका होता। विधानसभा के इस विशेष सत्र में उसी को फिर से दोहराया जा सकता है। विधानसभा में आप का भारी बहुमत है। वे कोई भी प्रस्ताव पास करवा सकते हैं। यह प्रस्ताव सरकार का अधिकार बढ़ाने की लड़ाई में कितना कारगर होगा यह कहना कठिन है।

सालों चले आंदोलन के बाद 1993 में दिल्ली को विधानसभा मिली लेकिन दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश ही रहा। जमीन और पुलिस को विधानसभा के अधिकार से ही बाहर रखा गया। जो विषय विधानसभा के माध्यम से दिल्ली सरकार को मिले उस पर भी उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार का ही नियंत्रण रहा क्योंकि संविधान की धारा 239 में लिखा हुआ है कि केंद्र शासित प्रदेशों का शासन राष्ट्रपति प्रशासक (उपराज्यपाल) के माध्यम से चलाएंगे। दिल्ली का अपना कैडर नहीं है।

दिल्ली के अधिकारी केंद्र सरकार के अधिकारी होते हैं। इतना ही नहीं दिल्ली के अधिकार बढ़ाने की संवाद से हुई कोशिश सफल रही और जब भी टकराव हुआ दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधिकारों में कटौती हुई। 2002 के बाद यह दूसरा इसका उदाहरण है। गृह मंत्रालय की अधिसूचना के बाद तो दिल्ली सरकार के पास सीमित विकल्प रह गए हैं। इसमें कुछ बदलाव तो राष्ट्रपति के माध्यम से केंद्र सरकार कर सकती है अन्यथा संसद से ही बदलाव हो सकता है, जो आसान नहीं लग रहा है। अदालत भी किस स्तर तक हस्तक्षेप कर सकती है यह मामला अदालत में जाने पर ही साफ हो पाएगा।

दिल्ली सरकार ने बयान में कहा है कि बैठक में वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल और देश के पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम की दी गई कानूनी सलाह पर चर्चा होगी। मंत्रिमंडल ने यह भी तय किया है कि विधानसभा की बैठक जरूरत के हिसाब से बढ़ाई भी जा सकती है।

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