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नए पुलिस आयुक्त के नामों की चर्चा शुरू, ये दो नाम है सबसे आगे

दिल्ली के पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा का सीबीआइ निदेशक बनना तो शुक्रवार को तय होगा लेकिन अभी से ही नए पुलिस आयुक्त के नामों की चर्चा शुरू हो गई है।

Author नई दिल्ली | January 18, 2017 3:03 AM
पुलिस आयुक्त आलोक कुमार वर्मा

दिल्ली के पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा का सीबीआइ निदेशक बनना तो शुक्रवार को तय होगा लेकिन अभी से ही नए पुलिस आयुक्त के नामों की चर्चा शुरू हो गई है। दौड़ में शामिल वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गृह मंत्रालय में अपने आकाओं के यहां दस्तक देनी शुरू कर दी है। पुलिस का वार्षिक सम्मेलन भी फिलहाल टाल दिया गया है। जिससे इस बात को बल मिलता है कि अब नए पुलिस आयुक्त ही वार्षिक सम्मेलन से अपने कामकाज की शुरुआत करेंगे।
आला सूत्रों के मुताबिक भारतीय पुलिस सेवा के मौजूदा समय में 1979 बैच के वरिष्ठ अधिकारी आलोक कुमार वर्मा को जब बीते साल फरवरी 2016 में दिल्ली का पुलिस आयुक्त बनाया गया था तभी से यह चर्चा थी कि वे यहीं तक नहीं रहेंगे। अपनी साफ छवि की बदौलत उन्हें आगे दूसरे विभाग में भी भेजा जा सकता है। अब जब सीबीआइ जैसी प्रमुख खुफिया एजंसी के निदेशक का पद खाली हुआ तो फिर वर्मा उस दौड़ में पीछे कहां रहने वाले थे। सो उन्होंने अपनी दावेदारी पेश की तो चयन समिति को भी उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज करना नागवार लगा।

पुलिस आयुक्त से पहले तिहाड़ जेल के महानिदेशक के रूप में वर्मा ने पिछले दस महीने में ही दिल्ली पुलिस की कई भ्रांतियों को तोड़ा और गृह मंत्रालय की नजर में आगे आ गए। बीते 25-30 सालों में प्रोन्नति की बाट जोह रहे जवानों और अन्य अधिकारियों को एक साथ तोहफा देने के अलावा सबसे महत्त्वपूर्ण पुलिस वालों के ट्रांसफर के भी तमाम मिथक तोड़ दिए। उपायुक्त से लेकर सहायक पुलिस आयुक्त और इंसपेक्टर से लेकर कांस्टेबल तक को उन्होंने इस सूची में शामिल किया और नियम के मुताबिक उन्हें इधर से उधर कर दिया। आयुक्त के मौजूदा कार्यकाल में उन्होंने आम आदमी पार्टी की कोशिशों को दरकिनार करते हुए कानूनन गिरफ्तारी और जांच जारी रखी। इससे पहले के आयुक्त भीमसेन बस्सी ने आप के खिलाफ बयानबाजी की जिसकी कीमत उन्हें सूचना आयुक्त की दौड़ से भी बाहर होकर चुकानी पड़ी।बताया जा रहा है कि वर्मा की आधिकारिक घोषणा नहीं होने के बाद भी पुलिस आयुक्त की दौड़ इसलिए शुरू हो गई है क्योंकि दिल्ली के पुलिस आयुक्त का पद अन्य कई राज्यों के पुलिस प्रमुख से थोड़ा अलग होता है। एक तो वे सीधे केंद्र सरकार के अधीन होते हैं दूसरे उनकी जिम्मेवारी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित संसद, केंद्रीय मंत्रालयों और सचिवालयों के साथ विदेशी दूतावासों की सुरक्षा से लेकर उनके आला अधिकारियों से रूबरू होने से जुड़ा होता है। दिल्ली सरकार के पास आयुक्त के लिए कुछ भी नहीं होता है। इसलिए दिल्ली पुलिस में काम करने वाले हर आइपीएस की यह इच्छा रहती है कि अपने सेवाकाल में उन्हें भले की कुछ दिनों के लिए सही अगर पुलिस आयुक्त का पद मिलता है तो यह उनकी उपब्धि होगी।

वरिष्ठों की सूची में दीपक मिश्रा और धर्मेंद्र कुमार

वरिष्ठों की सूची में 1984 बैच के दीपक मिश्रा और धमेंद्र कुमार आयुक्त की दौड़ में हैं। यों जब तीन नाम गृह मंत्रालय के पास जाता है तो उसमें एक नाम अमूल्य पटनायक का भी शामिल हो सकता है। मौजूदा समय में यह उम्मीद कम है कि पटनायक को मिश्रा और कुमार को दरकिनार कर आयुक्त बना दिया जाए। हालांकि पुलिस आयुक्त बनाने के मामले में भी गृह मंत्रालय की अपनी नीति है। इस नीति में दूसरे राज्यों से भी किसी वरिष्ठ आइपीएस को यहां लाकर आयुक्त बनाने का फार्मूला पहले हो चुका है। वीएन सिंह के बाद जब लखनऊ से सीधे अजय राज शर्मा को दिल्ली का पुलिस आयुक्त बनाया गया था तब से वरिष्ठता का मापंदड भी टूटता रहा। तब आरएस गुप्ता, केके पाल के नाम भी सामने आए थे।

लेकिन अजय राज ने जिस प्रकार लखनऊ से सीधे दिल्ली आकर कमान संभाली और उसे मुस्तैदी से पूरा किया। तभी से यह चर्चा भी जारी रही कि अब आयुक्त कहीं से भी थोपे जा सकते हैं। इसी कड़ी में जब केके पाल सेवानिवृत्त हुए तो वाईएस डडवाल से ऊपर किरण बेदी की दावेदारी पुख्ता हुई थी। बेदी भारतीय प्रशासनिक सेवा की देश की पहले महिला अधिकारी के अलावा दिल्ली पुलिस में ट्रैफिक विभाग में रहते कांग्रेसी सरकार के कार्यकाल के दौरान अपने कई अचंभित करने वाले कार्यों से किरण बेदी और फिर तिहाड़ में कैदियों के बीच चलाए जा रहे जनोपयोगी कार्यों से पूरे देश ही नहीं विदेशों तक में चर्चित बनी रही। बावजूद इन तमाम खूबियों और दुस्साहस के उन्हें दरकिनार कर वाईएस डडवाल को दिल्ली का पुलिस आयुक्त बना दिया गया था। तब बेदी ने पुलिस सेवा से सेवानिवृति लेकर अपना विरोध जताया था और फिर वे राजनीति और समाजसेवा में सक्रिय हो गईं।

 

 

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