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भ्रष्टाचार रोकने वाले भ्रष्टाचार निरोधी और सतर्कता शाखा में तैनात कर्मी भी भ्रष्टाचार में लिप्त

जनवरी 2010 से मई 2017 तक के दिए आंकड़ों में यह साफ जाहिर होता है कि कैसे इंसपेक्टर से लेकर कांस्टेबल तक जेब भरने में शामिल पाए गए हैं।

money, cash, investmentतस्‍वीर का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए किया गया है।

पुलिस विभाग और भ्रष्टाचार का यों तो चोली-दामन का साथ है। लेकिन ताज्जुब तो तब होता है जब भ्रष्टाचार निरोधी शाखा और सतर्कता शाखा में तैनात सरकारी मुलाजिम भी खुद को रिश्वत लेने से नहीं रोक पाते। इन विभागों के पर रिश्वतखोरों और भ्रष्टाचारियों को पकड़ने ने और सजा दिलवाने की जिम्मेदारी है। लेकिन इन पुलिस वालों पर भी कभी सीबीआइ तो कभी निगरानी शाखा और कभी-कभी भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने गाज गिराई है।

दिल्ली पुलिस ने भी खुद ही अपने विभाग के रिश्वतखोरों को बेनकाब किया है। जनवरी 2010 से मई 2017 तक के दिए आंकड़ों में यह साफ जाहिर होता है कि कैसे इंसपेक्टर से लेकर कांस्टेबल तक जेब भरने में शामिल पाए गए हैं। पुलिस की निगरानी शाखा भले ही दूसरे पुलिस वालों के मन में खौफ पैदी करती हो लेकिन जब उनकी खुद की बारी आती है तो वे भी बहती गंगा में हाथ धोने से परहेज नहीं करते। सतर्कता शाखा के अतिरिक्त उपायुक्त ने साफ तौर पर कहा है कि साल 2013 में इस इकाई की स्थापना हुई और तब से अब तक दस पुलिसवाले गिरफ्तार हो चुके हैं। इसी तरह सुरक्षा यूनिट में तैनात दो सब इंसपेक्टर, एक कांस्टेबल, एक हवलदार और एक कांस्टेबल क्रमश: सीबीआइ, विजिलेंस और एसीबी के हत्थे चढ़े। इस मामले में अपराध शाखा और स्पेशल सेल के सिर्फ एक-एक सब इंसपेक्टर और हवलदार को सीबीआइ और एसीबी ने रिश्वतखोरी में गिरफ्तार किया है। साल 2010 से 2017 के आंकड़ों के मुताबिक 33 पुलिस वाले शिकंजे में आ चुके हैं। इनमें साल 2010 को 19 पुलिसवाले, 2011 में एक, 2012 में दो, 2013 में चार, 2014 में छह और साल 2015 में एक पुलिसकर्मी रिश्वतखोरी में पकड़ा गया है।

 

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