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दिल्ली: बैजल से भी होगी पुरानी ‘जंग’!

दिल्ली के अधिकारों की लड़ाई अदालत में पहुंच गई थी और हाई कोर्ट ने चार अगस्त को उपराज्यपाल के पक्ष में फैसला दिया।

Author January 3, 2017 1:48 AM
नए उपराज्यपाल अनिल बैजल और पूर्व एलजी नजीब जंग

शुंगलू समिति और विवाद

साढ़े तीन साल उपराज्यपाल रहने के बाद अचानक 22 दिसंबर को इस्तीफा देने वाले जंग के बारे में कहा जा रहा है कि उनके इस्तीफे का मुख्य कारण दिल्ली सरकार के डेढ़ साल के कामकाज की जांच करने वाली पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से रोकना माना जा रहा है। उन्हें रिपोर्ट 27 नवंबर को मिली थी। उपराज्यपाल 14 अक्तूबर के अपने सार्वजनिक बयान से उलट रिपोर्ट को सीबीआइ को जांच के लिए देने के बजाए केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दी। इतना ही नहीं जांच पूरी होने के बाद 400 में से ज्यादातर फाइलें संबंधित विभागों को लौटा दी गर्इं।

‘अधिकार’ पर आना है फैसला

दिल्ली के अधिकारों की लड़ाई अदालत में पहुंच गई थी और हाई कोर्ट ने चार अगस्त को उपराज्यपाल के पक्ष में फैसला दिया। फैसले में कहा गया कि दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश है इस नाते अधिकारियों के तबादले से लेकर नियुक्तियों के अधिकार उपराज्यपाल के पास हैं। उसे दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। नए साल में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना है। हाई कोर्ट के फैसले के बाद उप राज्यपाल ने पिछले डेढ़ साल की की सरकार के फैसलों की जांच पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की अगुआइ्र में तीन सदस्यों की कमेटी को सौंप दी। उसके बाकी दो सदस्य-पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी और पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त प्रदीप कुमार थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदलाव होने से प्रशासनिक अधिकारों में कुछ बदलाव हो सकते हैं लेकिन जो पहले के फैसले हैं उसमें बदलाव संभव नहीं है। जिन्होंने वे फैसले किए हैं उनके खिलाफ कारवाई करने के लिए केंद्र सरकार और उपराज्यपाल पर दबाव पड़ेगा।

आप को लाभ, दिल्ली को नुकसान

दिल्ली सचिवालय से लेकर महिला आयोग, वक्फ बोर्ड और ज्यादातर विभागों में मनमाने तरीके से नियुक्ति से लेकर अनेक आयोग बनाने आदि के फैसलों पर विवाद चल ही रहे हैं। उनमें से काफी मामले तो पूर्व उपराज्यपाल जंग ने सीबीआइ को सौंप रखे हैं। मनमाने तरीके से फैसले लेने की जिद में ही किसानों के मुआवजा, न्यूनतम मजदूरी और अतिथि शिक्षकों के वेतन बढ़ाने आदि के फैसले उपराज्यपाल से मंजूरी के इंतजार में हैं। इनमें कानूनी अड़चन ज्यादा नहीं है। अगर दिल्ली सरकार केवल उपराज्यपाल को विश्वास में ले कर फैसले ले तो संभव है दिल्ली के हित में हुए कई फैसलों पर उपराज्यपाल यानी केंद्रशासित प्रदेश होने के कारण केंद्र सरकार की मंजूरी मिल सकती है। अगर केजरीवाल सरकार ने अपनी जिद नहीं छोड़ी तो नजीब जंग से भी बुरी लड़ाई अनिल बैजल के साथ हो सकती है। हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि बिना केजरीवाल सरकार के पूरी तरह से समपर्ण के दिल्ली के राजनीतिक हालात सामान्य हो ही नहीं सकते हैं। अभी जो हालात हैं उससे दिल्ली को नुकसान हो रहा है लेकिन केजरीवाल को राजनीतिक लाभ मिल रहा है।

रिपोर्ट सार्वजनिक करने का होगा दबाव

सबसे पहले अनिल बैजल पर शुंगलू समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का दबाव कांग्रेस और अन्य दल बनाएंगे। आरोप है कि पंजाब और गोवा में कांग्रेस और भाजपा में सीधी लड़ाई से बचने के लिए रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने बार-बार आरोप लगाया कि गैरभाजपा मतों का विभाजन करवाने के लिए भाजपा आप को जिंदा रखना चाहती है। इसे अगर राजनीतिक मामला न भी माना जाए तो भी एक उपराज्यपाल की बनाई कमेटी को ठंठे बस्ते में डालने पर हगांमा तो मचेगा ही। अन्य फैसले भी आप सरकार के ऐसे हैं जिसे उपराज्यपाल नियमानुसार स्वीकार ही नहीं सकते हैं। आप सरकार के 49 दिन के पहले कार्यकाल और फरवरी 2015 से दूसरे कार्यकाल का कोई दिन ऐसा न बीता हो जब आप के नेता केजरीवाल न झगड़े हों या गिनती के ही दिल्ली सरकार के ऐसे फैसले हैं जो नियम के हिसाब से होंगे। हर स्तर पर हर फैसले पर उपराज्यपाल से केजरीवाल सरकार का टकराव हुआ। इतना ही नहीं राजनिवास की बार-बार मनाही के बावजूद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में 14 विधेयक गैरकानूनी तरीके से पास करवा दिए जो अभी भी लंबित हैं। इसमें ऐसे बिल हैं जिसका दिल्ली को लाभ मिलेगा लेकिन सवाल यह है कि क्या आप सरकार उसे अपनी जिद छोड़कर नियमों का पालन करते हुए पहले केंद्र सरकार से मंजूरी लेकर विधानसभा से पास करवाएगा।

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