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पानी या पेट्रोल

दिल्ली में निगम चुनाव की आहट से सभी राजनीतिक दल जोश में दिखाई पड़ रहे हैं।

नई दिल्‍ली | Updated: July 19, 2021 9:11 AM
दिल्ली मेरी दिल्ली।

दिल्ली में निगम चुनाव की आहट से सभी राजनीतिक दल जोश में दिखाई पड़ रहे हैं। अब पानी को लेकर जो तकरार शुरू हुई है उसमें दिल्ली सरकार के विपक्ष में खड़ी दोनों पार्टियां जान लगाकर इस मुद्दे को उठा रही हैं। लेकिन पानी के साथ पेट्रोल की सुध लेने वाला कोई नहीं, जबकि जानते हैं कि दिल्ली में पेट्रोल की कीमत भी आसमान पर पहुंच चुकी है। अभी तो फिलहाल एक ही पार्टी कभी पेट्रोल पर प्रदर्शन करती है तो कभी पानी पर। सत्ता पक्ष को तो जैसे पेट्रोल और पानी दोनों से मतलब नहीं है। वहीं, मुख्य विपक्षी पार्टी पानी पर तो खूब गुस्सा दिखा रही है लेकिन पेट्रोल का नाम आते ही वे भी चुप्पी साध कर बगले झांकने लगते हैं।

मिला स्वीमिंग पूल!

दिल्ली में बारिश शुरू होते ही अगर मंटो ब्रिज के पास आधी डूबी बस का फोटो न आए तो बारिश का मजा बिल्कुल वैसा ही फीका होगा जैसे चाय में बिस्किट का न डूबना। राजधानी में मानसून ही बड़ा रोते-रोते आता है और जब आता है तो मुसीबत साथ लाता है। राजधानी को चमकाने का दंभ भरने वाली राजनीतिक पार्टियां इतने वर्षों में भी जलभराव खत्म नहीं कर पाई हैं। अब ऐेसे में बारिश आए और लोग वर्तमान को न कोसें ऐसा कैसे हो सकता है। खासकर विपक्षी पार्टियां, जिन्होंने मुख्यमंत्री के धन्यवाद पोस्टरों की ही नकल बनाकर उसमें जलभराव के फोटो लगा दिए हैं। इन फोटो में बच्चे जलभराव में खेल रहे हैं। पोस्टर में लिखा है ‘दिल्ली के लोगों को बधाई, हमने पूरी दिल्ली को स्वीमिंग पूल बना दिया है जी।’

तबादले की आंधी

दिल्ली से सटे यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाला है और वहां तबादलों से इसकी सुगबुगाहट भी दिखने लगी है। पिछले दिनों विभिन्न सरकारी विभागों में बड़े स्तर पर हुए तबादले चर्चा में रहे। तीन दर्जन से ज्यादा तो नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना प्राधिकरण, औद्योगिक विकास प्राधिकरण समेत यूपीसीडा में हो गए। इसमें भी अधिकारियों का पद वही रखा गया है केवल स्थान बदल दिया गया। अब चर्चा चल रही है कि तबादलों का आधार क्या था और किस नियमावली से किए गए। क्योंकि बेदिल को तो खबर मिल रही है कि कुछ अफसर तो अभी भी एक ही जगह पर बैठे हैं और उनकी कुर्सी इस तबादले की आंधी से हिली तक नहीं। किसी को बेदिल ने कहते सुना, अब चुनाव का मौसम है तो अपने-पराए सभी को दिखते हैं और फिर वही छांटो और उठाओ की नीति चलती है।

भीड़ वाले नेताजी

राजधानी में राजनीतिक पार्टियां आजकल किसी भी मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहती। किसी मुद्दे में जरा सी उम्मीद दिखे बस उसे लपक लेते हैं। अब अतिक्रमण हटाने को लेकर चले अभियान में एक धार्मिक स्थल तोड़ा गया। एक पार्टी ने इस मुद्दे में जान देखते हुए इसे तुरंत उठा लिया और विरोध का तानाबाना बुना गया। इंतजाम भी हो गया और प्रदर्शन का दिन भी आ गया, लेकिन भीड़ नहीं आई। अब पार्टी के वरिष्ठ नेता का गुस्सा सांतवे आसमान पर था। प्रदर्शन करने चले और भीड़ ही नहीं, ऐसे में कैसे लगेगा कि विरोध हुआ। बेदिल को पता चला कि उन्होंने साफ कह दिया, भीड़ नहीं तो वे नहीं। कार्यकर्ता भी मनाने जुटे की आपके पहुंचने पर आसपास के लोग आ जाएंगे तब नेताजी माने। लेकिन फिर भी भीड़ गच्चा दे गई।

यात्रियों की आवाज

कोरोना संक्रमण के कम होते प्रसार के बाद तमाम संगठनों ने अपने यूनियनों के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुंचाई और बंदी से छूट पाई। होटल व्यवसायी, साप्ताहिक बाजार वालों से लेकर बार और जीम व स्वीमिंग पूल तक खुलवाने में सफलता पा ली गई। पूरी दिल्ली पटरी पर चल पड़ी। लेकिन सचमुच में दिल्ली को पटरी पर दौराने वाली डीटीसी अभी भी राहगीरों की सुध नहीं ले रही। अभी भी आधी सवारी की ही यात्रा की अनुमति है। बस स्टैंडों पर लबी कतारें और घंटों इंतजार के बाद भी बसों वाले यात्री घंटों खड़े होने को विवश हैं। बसें आतीं और चालक हाथ उठाकर ‘ना’ कहता निकल जाता। सवाल है, अब राहगीरों की बात सरकार तक पहुंचाए कौन? न संगठन का साथ और ना सरकार की सुध। परिवहन विभाग को कौन बताए कि जब सब कुछ खोल दिया गया तो कम से कम बसों की सेवाएं भी तो सामान्य करें भला। बहरहाल, आंखों देखी स्थिति ऐसी है कि लोगों को केवल वहीं सीट मिलती है जहां से बसें बन कर चल रही हैं। बस स्टॉप पर तो केवल नसीब वालों को ही बस मिल पा रही है। यात्री परेशान और विभाग अनसूना बना पड़ा है ।

कुर्सी की ताकत

जनता से मिले पद की ताकत प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों से ज्यादा यूं ही नहीं है। अब निगम को ही लीजिए। यहां भले ही पार्षद भी जनता के वोट से चुनकर आए हों लेकिन मजाल हो उन्हें निगमों के अधिकारी भाव दे दें। कुछ से मिलने में तो आयुक्त लोग खुद ही कन्नी काट लेते हैं। लेकिन कहावत है ‘घूरे के दिन बहूरते हैं’, वह निगम में चरितार्थ होती दिख जाती है। यहां सामान्य पार्षद को भी बड़ा पद मिल सकता है। पिछले दिनों निगम में कुछ महत्त्वपूर्ण पदों के बैठे लोगों को जहां आयुक्त हल्का समझते थे आजकल उनकी जी-हूजूरी बजा रहे हैं। बेदिल ने किसी को कहते सुना आजकर अधिकारी कुछ लोगों की बात ऐसे गंभीरता से सुनते हैं जिनको पहले अनसुना कर देते थे। यही है कुर्सी की ताकत।

पुलिस और प्रदर्शन

दिल्ली पुलिस और किसानों का प्रदर्शन। यह जैसे इन दिनों पुलिस के लिए आफत बन गया है। तीन आयुक्तों को देख चुका किसान आंदोलन अब एक बार फिर नए आयुक्त के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। इस बार किसान मानसून सत्र के दौरान संसद के पास धरना प्रदर्शन करना चाहते हैं। पुलिस किसी भी सूरत में इजाजत देने पर राजी नहीं है। हालांकि पुलिस किसानों के सामने शर्त भी रख रही है। बेदिल को पता चला है कि पुलिस को साफ तौर पर निर्देश है कि बल को कोई ऐसी चूक नहीं करनी है ताकि यह संदेश जाए कि पुलिस इन्हें जबरन यहां से भगाना चाहती है। क्योंकि जितने किसान प्रदर्शन के लिए आए हैं उतनों को हटाना पुलिस के लिए कोई मुश्किल नहीं है। हालांकि अमूल्य पटनायक, एसएन श्रीवास्तव के बाद अब बालाजी श्रीवास्तव के लिए यह आंदोलन तो एक प्रकार से गले की हड्डी ही है।
-बेदिल

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