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‘वैकेंसी’ वाली वैक्सीन

बेरोजगारी का आलम और ऊपर से कोरोनाकाल। इसमें भी सोशल मीडिया की सक्रियता। बेदिल को एक ऐसी बानगी देखने को मिली जिसमें ‘वैक्सीन’ का मतलब ‘वैकेंसी’ समझ लिया गया और देखते ही सूचना देने वाले की शामत आ गई।

Author Updated: February 22, 2021 7:57 AM
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हुआ कुछ यूं कि कोरोना का टीका लगवाने को लेकर एक नर्स यूनियन ने स्वास्थ्यकर्मियों से अपील जारी की कि वैक्सीन सुरक्षित है लिहाजा वैक्सीन के लिए स्वास्थ्यकर्मी आगे आएं। इसे सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया। फिर क्या था ‘वैक्सीन’ क ो सोशल मीडिया में ‘वैकेंसी’ पढ़ा गया और दनादन फोन नंबर पर लोगों की कॉल आने लगी।

लोग इस बारे में जानकारी मांगने लगे कि कहां ‘वैकेंसी’ आई है हमेंभी भरना है। इतने अधिक फोन आने लगे कि नर्स पदाधिकारी परेशान हो गर्इं कि किस फोन को रिसीव करें किसे नहीं। इस पर एक नर्स ने टिप्पणी की कि कोरोनाकाल में लोगों ने इतनी नौकरियां गवाई हैं कि लोगों के जेहन में ‘वैक्सीन’ से ज्यादा ‘वैकेंसी’ घर कर गया है। यह वक्त की नब्ज भी बता रहा है और वक्त की जरूरत भी। कोरोना काल में वैक्सीन के साथ ही वैकेंसी की भी भारी जरूरत है।

मंदिर की सियासत

चांदनी चौक के हनुमान मंदिर को हटाने के बाद अब नया मंदिर क्या बना, वहां आम भक्तों से ज्यादा सियासी भक्तों का जमावड़ा पहले लग गया। और इसके साथ ही दिल्ली की सियासत भी गर्म हो गई। इसमें कोई भी पार्टी पीछे नहीं रहना चाहती है। मंदिर निर्माण के बाद सभी दल जानते हैं कि इसके लिए तय प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए था लेकिन अब नेताओं ने इसे प्रभु इच्छा बता दिया है।

जहां भाजपा ने विधिवत पूजन कर इस मंदिर का श्रेय लेना शुरू कर दिया, वहीं इस दरबार में आप ने भी हाजिरी लगा दी है। कांग्रेस पार्टी के नेता तो मंदिर टूटने के समय पर ही मौके पर पहुंच कर चालीसा कर दोनों पार्टियों को तोड़फोड़ के लिए कोस चुके हैं। मंदिर बनने के बाद भी वे अपना कर्तव्य समझकर वहां पाठ करने बैठ गए। इसे देख कर यही लग रहा है कि पार्टी वोट बैंक बचाने के लिए किसी को नहीं छोड़ने वाली। सबको साध कर चलना है।

हत्याकांड के बाद

रिं कू शर्मा हत्याकांड के बाद से ही दिल्ली भाजपा में एक अजीब की होड़ नजर आई। हत्याकांड के बा पहले ही दिन से भाजपा हमलावर स्थिति में है। पार्टी के शीर्ष नेताओं से लेकर प्रदेश के स्थानीय नेताओं तक पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कहीं भी पार्टी में एकजुटता नजर नहीं आई है। इसे सीधेतौर पर पार्टी में श्रेय लेने की होड़ की तौर पर देखा जा रहा है। अब तक इस पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए बैजयंत पांडे, डॉ अल्का गुर्जर, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी, प्रदेश आदेश गुप्ता, सांसद हंसराज हंस पहुंचे हैं।

पैसा दिलवा दो

पार्टी की ओर से की गई पुरानी घोषणा अब नए अध्यक्ष के गले पड़ रही है। मॉडल बस्ती में हुई एक घटना में भाजपा के नेताओं ने पीड़ितों को मुआवजा व मृतकों के परिजनों को पैसा देने की घोषणा की थी। इस घटना के बाद पार्टी की कमान में ही बदलाव हो गया और कुर्सी पर नए नेता आ गए। इसका असर यह हुआ कि पीड़ित परिवारों की आर्थिक सहायता ही फंस गई। हाल ही में पार्टी कार्यालय में ऐसे पीड़ित परिवार चक्कर लगाते नजर आए। जो पूर्व अध्यक्ष की घोषणा के अनुसार आर्थिक सहायता के लिए इंतजार कर रहे हैं। अब पीड़ितों को कौन समझाए की राजनीतिक दलों की घोषणा और भाषण में ज्यादा अंतर नहीं होता।

नीतियों से नाराजगी

स्वच्छता सर्वेक्षण में शीर्ष पांच में आने की जद्दोजदह में लगे औद्योगिक महानगर में लगातार बदलती नीतियों से कारोबारी पसोपेश में है। करीब दो साल पहले बहुमंजिला बिल्डर सोसायटी, बड़ी फैक्टरियों, कंपनियों, कार्यालयों समेत खाद्य प्रतिष्ठानोें से निकलने वाले जैविक कचरे का निस्तारण उसी परिसर में करने के नियम के तहत प्राधिकरण अधिकारियों ने सैकड़ों की संख्या में नोटिस जारी किए थे। दर्जनों प्रतिष्ठानों पर जुर्माना लगाया गया और उसी परिसर में गीले कचरे को खाद में बदलने वाली मशीन लगाने के कड़े निर्देश जारी किए।

जुर्माने के बाद काफी संख्या में बिल्डर सोसायटी और प्रतिष्ठानों आदि ने अपने यहां आर्गेनिक वेस्ट कंपोस्ट मशीनें भी लगाई। अब प्राधिकरण अधिकारियों ने इस पर भी सवालिया निशान लगा दिया। उनका कहना है कि सामूहिक स्तर पर बॉयोमीथनाइजेशन संयंत्र लगाना ज्यादा अच्छा है। जिसके चलते फौरी तौर पर प्रतिष्ठानों, फैक्टरियों, आॅफिसों आदि की जांच रोक दी गई है। अब कारोबारी माथा पकड़ कर बैठे हैं और फिर से नियम बदलने का इंतजार कर रहे हैं।

सीट का लगाव

‘आम आदमी पार्टी की विकास गाथा से हमें गुरेज नहीं, लेकिन हमें भी तो बैठने की जगह चाहिए’! आइटीओ स्थित एक नहीं बल्कि तीन-तीन बस स्टैंड पर दिल्ली सरकार की ओर से अपनी तरक्की बताने वाले लगे होर्डिंग को देखकर एक बस यात्री यह बात बोल उठा। दरअसल, उसकी पीड़ा भी बिल्कुल आम थी और सीट का लगाव तो होता भी सभी को है।

चाहे राजनीतिक पार्टी हो या सामान्य बस यात्री। अब यहां बस यात्रियों के बैठने के लिए बनी स्टील की बेंचों के ठीक ऊपर दिल्ली सरकार के प्रचार वाले होर्डिंग जिस तरह लगाए गए हैं उससे बैठने की सीट ही घिर गई हैं। जिसकी नजर पड़ती वो कोस बैठता। बेदिल को ठनका! यह बोर्ड दिल्ली सरकार के तरक्की के छह साल वाले हैं, जिनके लगने से बैठने की आधी जगह घिर गई।

अब ज्यादातर यात्री खड़े होकर होर्डिंग को निहारते और आपस में चर्चा करते। कहना न होगा कि दिल्ली सरकार अपनी विकास गाथा वाले विद्युत होर्डिंग यहां लगवाते समय बस स्टैंड के यात्रियों को ही भूल गई! किसी ने ठीक ही कहा यह होर्डिंग थोड़ा आगे-पीछे भी लग सकते थे। सीट घेरने का क्या मतलब भला! कोई
कहता यह ‘बेसुध प्रचार’ कब हटेगा!

डिजिटल मुसीबत

डिजिटल होते जमाने में पता नहीं अब क्या-क्या देखना पड़ेगा। इसका असर दिल्ली पुलिस पर इतना पड़ा कि कैलेंडर और डायरी को भी डिजिटल कर दिया। पहले लोग कैलेंडर और डायरी के पन्ने पलटने में आलस दिखाते थे, अब महीन-बारीक अक्षरों में अगर किसी थाने का नंबर या किसी पुलिस उपायुक्त का संपर्क नंबर ढ़ूंढा जाए तो पता चला कि घंटो समय का बेजा इस्तेमाल हो रहा है।

बेदिल ने जब इसकी तहकीकात की तो पता चला कि कोविडकाल में सरकार ने डिजिटल को बढ़ावा देने का ऐसा फरमान जारी कर दिया कि अब संभव है नए फ्रेम के चश्मे की जरूरत पड़ जाए ताकि कई सौ पृष्ठ में बने इस डायरी से अपने काम का नंबर निकाला जा सके।
-बेदिल

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